Adivasi : Adivasi

Posted on June 6, 2010. Filed under: Hindi | Tags: , , , |

आदिवासी : आदिवासी

पिछले हफ्ते मैं अंतर्राष्ट्रीय समाचार चैनल अल-ज़जीरा इंग्लिश की टीम के साथ दक्षिण बस्तर में था. हम यु.पी.ए. सरकार के छठवें वर्ष के समाप्ति पर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के अपने पहले प्रेस कांफ्रेस के सम्भावित बयानों को ध्यान में रखकर देश के सबसे अधिक नक्सल प्रभावित एवं संवेदनशील क्षेत्र दक्षिण बस्तर से सीधा प्रसारण करने के लिए पहुंचे थे.

प्रधानमंत्री जी मीडिया द्वारा पूछे गये नक्सल सम्बन्धित सवालों के जवाबों को तो टाल गये. लेकिन हम अपने काम को नही.

गाँवों में आदिवासियों से बातचीत के साथ-साथ दोरनापाल कैम्प के स्थानीय पुलिस एवं कोया कमांडॉं द्वारा पेट्रोलिंग और डीमाईनिंग की रोजमर्रा की प्रक्रिया में हम दिनभर के लिए शामिल हुये. 45 डिग्री सेल्सियस की झुलसा देने वाली गर्मी और 15 से 20 किलो की भारी भरकम बुलेटप्रूफ जैकेट और अन्य समानों के साथ जवानों की रोज की कई किमी की प्रेट्रोलिंग थकाऊ और मुश्किल भरा काम है. घनें जंगलों में फैल कर पेट्रोलिंग करने वाले इन जवानों के पास आपसी सम्पर्क और बचाव के लिए नाममात्र के ही वायरलेस सेट और सुविधाये है.

कोया कमांडों के जवान पहले सलवा जुडुम समर्थक थे बाद में एस.पी.ओ. बने. ये कोई और नही स्थानीय आदिवासी ही है. पिछले दिनों मारे गये कोया कमांडों के जवान जिस यात्री बस में सवार थे वे शायद क्षण भर अपनी सशस्त्र पुलिसिया जवाबदारी को भुलाकर उसी भावना के साथ बस में बैठ गये थे जैसे वे कभी बेखौफ यात्रा किया करते थे. अपने आदिवासी भाईयों के इस तरह से मारे जाने की घटना के बाद से अब इन्हे अपने क्षेत्र ही में अकेले या दल के साथ भी 5-10 कि. मी. जाने से डर लगता है कि कही नक्सली उन्हे मार न डाले.

दोनो तरफ से एक दूसरे के प्रति अविश्वास, डर और जनजीवन पहले की तरह ही सामान्य होने की उम्मीद के बीच की असमंजस्य स्थिति बनी हुई है. यही वजह है कि स्थानीय आदिवासी जवान और नक्सली आपस में ही हमलावर और बचाव की स्थिती में है, जो कभी इनके अपने ही थे. इनके चेहरों पर ढेरों प्रश्न पढे जा सकते है. अपनी-अपनी सत्ता और सम्पदा की दोहन और लूट से ऊपजी इस खूनी खेल में अपने ही लोगो और समुदाय से साथ की लम्बी लड़ाई ने उन्हे द्रवित और विचलित कर दिया है जिन्हे मानवीय तौर पर केवल महसूसा जा सकता है.

तेजेन्द्र

साथ में पढियें अल-ज़जीरा इंग्लिश की सम्वाददाता प्रेरणा सूरी की रिपोर्ट:

http://blogs.aljazeera.net/asia/2010/06/03/maoists-heartland

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When the State Declares War on the People

Posted on January 31, 2010. Filed under: Documentary Films in Chhattisgarh | Tags: , , , , , , , |

When the State Declares War on the People

A 15 minute Trailer on the Human Rights Violations in Chhattisgarh resulting from Operation Green Hunt

Director: Gopal Menon

art 1

http://www.youtube.com/watch?v=rygJzzutBOg

part 2

http://www.youtube.com/watch?v=66Kvl3e1MlM

Synopsis

We have been hearing many stories about the human rights violations before and after Operation Green Hunt was announced. Allegations and counter-allegations have been going around. Fact-finding investigations have uncovered the atrocities security forces are committing in these areas, but now those very findings are being questioned.

At such a time it is crucial to present the reality and tear the veils obscuring the truth. When the State Declares War on the People is a 15-minute trailer by Gopal Menon based on his recent coverage of the ground reality in Chhattisgarh. This short film contains exclusive interviews with victims and their testimony including 1 ½ year old Suresh who had three fingers chopped off his left hand, an old man who was electrocuted and whose flesh was ripped off with knives, women raped by Special Police Officers and CRPF. The film also presents the views of Arundhati Roy and Mahesh Bhatt, two eminent citizens who have been closely following developments in Chhattisgarh. The clear intention of the State – to wipe out all resistance through terror in the name of fighting the Maoists – is demonstrated in this film.

About the Director

Gopal Menon is an activist-filmmaker focusing on caste, communalism and nationality. He was arrested twice while trying to go to Lalgarh and beaten with rifle butts and lathis. He was detained in Dantewada too. This is a trailer of a larger film on the Indian State’s war on the people.

Some of Menon’s earlier films are Naga Story: The Other Side of SilenceHey Ram!! Genocide in the Land of GandhiPAPA 2(about disappearances in Kashmir) and Resilient Rhythms (a rainbow overview of the Dalit situation) amongst others.

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Few photographs from 2009

Posted on January 2, 2010. Filed under: Photographs | Tags: , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , |

बीते साल का अधिकांश समय शुटिंग करते और घुमते हुये ही बीता. इस दौरान बहुत से फोटो भी खींचे जिनमें से कुछ यहाँ “नये साल की शुभकामनाओं” के साथ आप सभी के लिये.

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River Pollution By NMDC, Bailadila

Posted on November 16, 2009. Filed under: Photographs | Tags: , , , , , , , , |

NMDC Bailadila mines have polluted the two main rivers Shankini and Dankini of Dantewada district in Chhattisgarh, which flows through the region. Shankini called as “Red River”, more than 100 villages are affected by this river.

To see slide show please click this link: 

http://www.flickr.com/photos/tejendra/sets/72157622662915531/show/

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द्रविणों पर आर्यो का हमला

Posted on November 11, 2008. Filed under: Hindi | Tags: , , , , , , , , , , , , , , , , , , , |

द्रविणों पर आर्यो का हमला

इस बार नवरात्रि बस्तर में ही बीती. पिछले बार की तरह इस बार भी सफ़र बाईक पर ही था लेकिन पहले से बहुत ज्यादा लम्बा दूरी लगभग 1300 कि.मी. बस्तर जाने से पहले मैंने पं. जवाहर लाल नेहरू की “विश्व इतिहास की झलक” पढ़ना शुरू किया था. लगभग 200 पृष्ठ पढ़ लेने के बाद बस्तर चला गया. मोटॆ तौर पर आर्य, द्रविण, जाति, धर्म और सत्ता की लड़ाई, बर्बरता, कबिलाई संघर्ष और कला और संस्कृति के बारे में पढ़ी बहुत सी बांते मेरे दिमाग मे ताजा थी. इस पुस्तक ने मेरे कम सोच और समझ को थोड़ा और बढ़ाने में मदद की. मुझे सहसा विश्वास नही हो रहा था और कभी-कभी तो ऎसा लगता था कि मैं हजारों साल पहले का दृश्य वर्तमान में देख रहा हूँ. मानो, जो मैं पढ़ रहा हूँ, उसे मैं जी भी रहा हूँ, बस्तर में.

जिस दिन मैं भिलाई से निकला वह दिन था, 1 अक्टूबर और अगले दिन 2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती के दिन वनवासी चेतना आश्रम के हिमांशु जी द्वारा न्याय एवं शांति रैली निकाली गई. इसे देखने की इच्छा थी. पिछले साल भी गांधी जयंती के दिन मैं रायगढ़ गया था जहाँ मेधा पाटेकर जी आई थीं. शहीद सत्यभामा जी को श्रद्धांजली देकर अन्य लोगों के साथ तमनार ब्लॉक के “गारे” और “राबो” गाँव पहुंचे थे जहाँ कुछ दिन पहले ही जिन्दल कोल माईंस और राबो बान्ध के खिलाफ की जा रही एक जन सुनवाई के दौरान लाठी चार्ज हुई थी और 105 ग्रामीण घायल हुये थे जिसमें 11 लोग गम्भीर रूप से घायल हुये थे. इस साल भी छत्तीसगढ़ के एक ऎसे क्षेत्र में गांधी जयंती देखने/मनाने गया जहाँ घोर अशांति है. इस बार की दंतेवाड़ा की रैली में लगभग 200-300 आदिवासी शामिल हुये थे. सभी नक्सली और सलवा-जुडुम प्रभावित थे और अपनी मूलभूत जरूरतों की मांग कर रहे थे.

सुबह-सुबह, जगदलपुर से दंतेवाड़ा की ड्राईव बड़ी सुहावनी थी. ठंडी की शुरूआत थी, हल्की सूरज की रोशनी पड़ते ही दूर-दूर तक गहरी धुन्ध फैल गई और 10-20 मीटर से आगे कुछ दिखाई नही दे रहा था. बड़ी सुनहरी और सुहावनी सुबह थी. इस रस्ते पर जिस चीज ने सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित किया वह था नवरात्रि के पद यात्री. इसके बारे में आगे और भी बहुत सी बातें लिखना है लेकिन बस्तर में ऎसा पहली बार हुआ कि लोग डोंगरगढ़ की तरह पैदल दंतेश्वरी माता के दर्शन के लिये जा रहे है. एस्सार ने रास्ते भर ठहरने और खाने-पीने की व्यवस्था की थी.

जहाँ सैकड़ो सालों से रोज या हर हफ्ते यहाँ के आदिवासी कई किलोमीटर भूखे-प्यासे पैदल चल कर बाज़ार या अन्य काम के लिये कस्बे या शहर आते है वहीं शहरी सभ्य समाज के नौजवान लड़के-लड़कियाँ पाँव में पट्टी बांध-बांध कर पद यात्रा कर रहे थे और उनकी यह दशा देखकर साथ चल रहे आदिवासियों को थोड़ा सुख तो जरूर मिला होगा.

खैर, मैं दंतेवाड़ा पहुंचा और सीधे वहाँ गया जहाँ से रैली शुरू होनी थी. धीरे-धीरे लोग इकट्ठे होने शुरू हुये. लोगों को इस तरह इकट्ठे होते देख मुझे लगभग तीन साल पहले सलवा जुडुम पर बनाये जाने वाले एक डॉक्यूमेंटरी फिल्म की याद आ गई, तब सलवा जुडुम को शुरू हुये ज्यादा दिन नहीं हुये थे और हम भैरमगढ़ और पास की कुछ नक्सली प्रभावित गाँवों में रैली के साथ-साथ गये थे.

लेकिन उस शांति रैली और आज के शांति रैली में नि:सन्देह अंतर है. रैली में दोनों तरफ से प्रभावित लोग शामिल थे और अब वे सामान्य जीवन जीने के लिये संघर्ष कर रहे है. शाम होते-होते सभी अपने-अपने घरों को लौट गये. दिन भर की रैली और फिर इस पर शहरी नजरान्दाजगी देखकर मन भारी हुआ कि सैकड़ों की संख्या में लोग दंतेश्वरी माता के दर्शन के लिये लोग दूर-दूर से आ रहे है लेकिन शहर में हो रही इस रैली/गतिविधि के बारे में शहर में कोई चर्चा तक नही है. सारे युवा और सभ्य समाज चुप्प है. क्यों युवा वर्ग अपने आस-पास घट रही इन घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया नही दे रही? आज बस्तर ही नही पूरे प्रदेश में युवा ताकत इसी तरह से निष्क्रिय है और प्रतिरोध नही कर रही है.

इस रैली में एक छोटा सा 5-6 साल का बच्चा भी था जो पूरे समय अपने साथ एक ए.के.47 रायफल (खिलौने का) रखे रहा. उसके पिताजी ने बतलाया कि “मिज़ो फोर्स के लोग इसके हीरो है और यह बहुत दिनों से उन्ही की तरह बन्दूक रखने की ज़िद कर रहा था.”

कुछ महीने पहले मेरी मुलाकात पखान्जूर के मांड क्षेत्र से आये एक परिवार से हुई थी. उनमें से 30-32 साल के एक लड़के ने बतलाया था कि जब वह 5-6 साल का था तब पहली बार नक्सली उसके गाँव आये थे और आज उनका गाँव नक्सली और पुलिस के बीच पिस रहा है.

किस तरह से लोग और बच्चे बन्दूक के साये में पल-बढ़ रहे है इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है. क्या नक्सली, सलवा जुडुम या फोर्स (सरकार) एक पीढ़ी के बाद फिर दूसरी पीढ़ी को यही विकल्प या आदर्श के रूप में पेश कर रहे है?

खैर, दूसरे दिन “नेन्द्रा” जाना हुआ. “नेन्द्रा”, दंतेवाड़ा जिले का एक ऎसा गाँव है जिसे चार बार जलाया है और कई लोगों को मारा गया है. वनवासी चेतना आश्रम के प्रयास से अब कुछ लोग वहाँ रहने आये है, जो भागकर आन्ध्रप्रदेश चले गये थे. वे आश्रम के सहयोग से अस्थाई घर बना कर रह रहे है और आश्रम द्वारा राशन की मदद दी जा रही है. लोग अब अपने घर/गाँव वापस आना चाहते है. खेती करना चाहते है और फिर पहले की तरह जीना चाहते है. यह तो सिर्फ एक गाँव की बात है दंतेवाड़ा में तो ऎसे बहुत से गाँव से है.

घने जंगल में 8 कि. मी. पैदल चलकर हम इस गाँव तक पहुंचे. कितने टूटे, परेशान और निराश दिखे यहाँ के लोग. समझ पाना बहुत मुश्किल है कि कोई कैसे इनके घरों को आग लगा सकता है, कैसे मार सकता है. यहाँ रह रहे लोगों ने जो आप-बीती सुनाई वह किसी भयंकर बुरे सपने से कम नहीं थी. किसी भी स्थिति को समझने और जानने के लिये मुझे लगता है कि वहाँ जाना और लोगों से बात करना बहुत जरूरी है. लोग कैम्पों में कैद है. जगह-जगह चेकिंग पोस्ट है, मिलेट्री है, फोर्स है. यहाँ हर कोई संदिग्ध है और एक-दूसरे के दुश्मन है.

“विश्व इतिहास की झलक” के पृष्ठ 505 में उल्लेख है- फ्रांस की राज्य क्रांति पर लिखने वाले थामस कार्लाइल नामक एक अंग्रेज लेखक ने जनता के हाल जो बयान किया है, वह एक निराली शैली है- “श्रमजीवियों की हालत फिर खराब हो रही है. दुर्भाग्य की बात है! क्योंकि इनकी संख्या दो-ढ़ाई करोड़ है. जिनको हम एक तरह की धुँधली घनी एकता के हैवानी लेकिन धुँधले, बहुत दूर के गँवारू भीड़ जैसे लौंदे में इकट्ठा करके कम्यून, या ज्यादा मनुष्यता से, ‘जनता’ कहते है. सचमुच जनता, लेकिन फिर भी यह अज़ीब बात है कि अगर कल्पना पर जोर डाल कर आप इनके साथ-साथ सारे फ्रांस में इनकी मिट्टी की मड़ैयों में, इनकी कोठरियों और झोपड़ियों में, चलें, तो मालूम होगा कि जनता सिर्फ इकाईयों की बनी हुई है. इसकी हरेक इकाई का अपना अलग-अलग दिल है और रंग है, वह अपनी ही खाल में खड़ा है और अगर तुम उसे नोचोगे तो ख़ून बहने लगेगा.” सोलहवें लुई के राज में फ्रांस की यही हालत थी. यह बयान 1789 ई. के फ्रांस पर ही नही बल्कि 2007 के बस्तर पर कितनी अच्छी तरह फबता है.

और फिर आगे पृष्ठ 662 पर एक कविता है-
“ज़ुल्मियों से मिल गये और हो गये बस शांत कर इकट्ठे दूसरों के ताज और सिद्धांत
और चिथड़े और कुछ टुकड़े मुलम्मेदार पहनकर फिरने लगे सब लाज शर्म बिसार.”

आज इस चुनाव के समय में राजनीतिज्ञों पर इससे अच्छी कविता और क्या हो सकती है?

नगरनार और लोहंड़ीगुड़ा भी गया जहाँ उद्योग लगने है, लोगों को कोई स्पष्ट जानकारी नही है और लोग भविष्य को लेकर भयभीत भी है. अलग-अलग राजनैतिक दल के लोग वहाँ जाते रहते है और सांत्वना देते रहते है. जब मैं नगरनार पहुंचा तब लोग धरना देने की तैयारी में थे. ये वे लोग है जिनका जमीन ले लिया गया है और वायदानुसार आज तक इन्हें नौकरी नहीं मिली है और न ही खेती करने दिया जा रहा है. लोहंड़ीगुड़ा के लोग तो और भी ज्यादा डरे हुये है. ग्रामीण कुछ भी बोलने और बतलाने से भी कतरा रहे है.

आज बस्तर को विकास और सभ्य बनाये जाने के नाम पर जबरदस्ती की जा रही औद्योगिकीकरण और गैर-आदिवासियों की बढ़ती घुसपैठ, राजनैतिक दलों और धार्मिक संगठनों की मिलीभगत से की जा रही लूट और निरीह हत्याओं की असलियत और साजिश सामने आ रही है.

खैर, इन विषयों पर बहुत सी बातें होती रही है और आगे भी होती रहेगी. कुछ और भी मार्के की बातें है जो गम्भीर है.

बस्तर का दशहरा भारत का एक अनोखा दशहरा है, भगवान श्री राम का इससे कोई लेना देना नहीं है. वैसे भी यह दंण्डकारण्य है और दन्तेवाड़ा के उत्तर-पश्चिम में लंका नामक एक जगह भी है और इस अंचल में रावण मारने की भी कोई परम्परा भी नहीं है. बस्तर दशहरा का सरकारीकरण हुआ सो हुआ लेकिन पिछले कुछ सालों में इस उत्सव में गैर आदिवासियों का दखल और दबदबा बढ़ गया है. बस्तर दशहरा के कमेटी में गैर-आदिवासी, बाहरी, व्यापारी, उच्च वर्गों का कब्जा हो रहा है. इनके बीच आदिवासी घुटन महसूस कर रहे है. जय माता दी और जय श्री राम आदि के नारे आदिवासियों को चुभ रहे है. लाऊड स्पीकरों और सरकारी बैंड के शोर में इनका पारंपरिक वादन दब गया है. जिस दिन का इंतजार यहाँ के आदिवासियों को साल भर से रहता है, जिसके लिये वे दिन-रात तैयारी में लगे रहते है, कुछ ही घंटे में निराश, हताश और अपमानित महसूस करते है. इनके पूजा-पाठ के तौर-तरीकों, नाच-गान और देवताओं के साथ झूपने का मजाक उड़ाया जाता है.

दंतेवाड़ा में दंतेश्वरी मन्दिर में कुछ सालों से जसगीत शुरू हुआ. जगदलपुर के दंतेश्वरी मन्दिर में सांई बाबा का चित्र टंगी देख आश्चर्य होता है. मन्दिर के पुजारी बतलाते है कि एक प्रभावशाली स्थानीय कांग्रेसी नेता ने किस चतुराई के साथ सांई बाबा को मन्दिर में एंट्री दिलवाई. जगदलपुर में एक 50-60 फीट की हनुमान की मूर्ति स्थापित की गई है. पिछले कुछ सालों में बजरंग दल, शिव सेना और अन्य हिन्दू धर्म के संघठनों ने बड़ी तेजी से पैर फैलाया है. हजारों साल पहले हुये “द्रविणों पर आर्यो का हमला” आज भी अपने तरिके से जारी है.

बस्तर के दशहरे पर्व में आदिवासी समाजों की अपनी-अपनी विशिष्ट स्थान और जिम्मेदारियाँ है लेकिन गैर आदिवासी, धार्मिक और राजनैतिक दल के पदाधिकारी, व्यापारी और उच्च वर्ग मिलकर इन पर अपना कब्जा कर रखा है. आने वाले कल में दंतेश्वरी माई की छतरी उठाने वाला कोई अन्य राज्य का, कोई सिन्धी, कोई बनिया या यही लोग रथ खींचने भी लगे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी. जब तक उद्योग नहीं लगे हैं तब तक जितना बचा है बचा है, जैसे ही लगेगा सब खत्म.

ये शहरी सभ्य समाज के लोग बड़े गर्व से यह कहते है कि हमने इन आदिवासियों को जीने का तरीका सिखाया है, कपड़े पहनना सिखाया है नहीं तो ये जंगलों में नंगे रहते थे. इन असभ्य लोगों को हमने सभ्य बनाया है. इन सभ्य समाज के ठेकेदारों को यह नही भूलना चाहिये कि इनका धन्धा इन्हीं से चलता है. नेताओं को समझना चाहिये कि वे इन्हीं जनता के द्वारा ही चुने जाते है.

नक्सलियों को बस्तर में पैर जमाये 30 साल हो गये लेकिन इसके बाद भी बस्तर में एक भी ऎसा नेता या आग पैदा नहीं हुआ जो दमन, शोषण और अपमानजनक विचारों का खात्मा करें या इतना डर पैदा करे या इन आदिवासियों में इतना आत्मविश्वास पैदा करें कि ऎसी सोच को कुचला जा सकें. दुर्भाग्य है!

बस्तर में जितने भी प्रकार के आदिवासी हस्तकलाएँ थी, खत्म हो गई. मुझे याद है कुछ साल पहले तक ही बहुत से परिवार थे जो टेराकोटा, बेलमेटल, रॉट आयरन और लकड़ी के खुबसूरत कलाकृतियाँ बनाते थे लेकिन देखते-ही-देखते आज कलाकार या तो यह काम छोड़ दिये है या तो बड़े व्यापारी के यहाँ काम करने को मजबूर हैं, क्योंकि इनके बाजार को पूरी तरह से इन्हीं लोगों ने कब्जा कर रखा है. करोड़ो-अरबों खर्च करने के बाद भी राज्य सरकार इन्हें बचा नहीं पाई.

विकास के नाम पर आदिवासियों की भावनाओं को यहाँ तक कुचला गया कि इनके मृतक स्तम्भों को तोड़-तोड़ कर चमकदार सड़कें बना दी गई. मुझे याद है कि झारखण्ड में कोयलकारो परियोजना को वहाँ के आदिवासियों ने केवल इसलिये नही बनने दिया कि वे अपने गाँव के देवताओं को जलमग्न नहीं होने देना चाहते थे. क्योंकि यही उनकी एक पहचान है. लेकिन छत्तीसगढ में इतना कुछ होने के बाद भी ऎसी स्थिति नही बन पाती है कि कोई बड़ा आन्दोलन खड़ा हो और न ही ऎसे नेतृत्व है जो जनता के लिए लड़े और न ही कोई ऎसा जन संगठन है जो गदर मचा सके.

लेकिन बस्तर सिर्फ समस्या ही नहीं है, और भी बहुत सी अच्छी बातें भी है जिसको जानना और समझना अभी भी बाकी है. देवी-देवताओं और मान्यताओं में यहाँ के आदिवासी अभी भी पूरी तरह से विश्वास रखते है. जंगल, जीवन और लोक कथाओं की बड़ी समझ, अभी भी बाकी है. मेरे जैसे फिल्मकार के लिये बस्तर का दशहरा एक बहुत बड़े अवसर की तरह है क्योंकि यही वह समय होता है जब पूरे बस्तर से विभिन्न क्षेत्र से आदिवासी आते है और बहुत से लोगों से मिलने, बातचीत करने, जानने और समझने का मौका मिलता है. यही के राजमहल के अहाते में मुझे बड़ॆ-डोंगर के पास के गाँव से आये एक बुज़ुर्ग से मुलाकात हुई जो अपनी जवानी में घोटुल जाते थे और उन्होने मुझे दिनभर थके होने के बावजूद रात में लगातार चार घंटे ऎसे-ऎसे गीत सुनाये जो अब गाएँ नहीं जाते.

तेजेन्द्र ताम्रकार

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पूर्वी पाकिस्तान में हुये दंगे की याद अभी तक बुज़ुर्गो के ज़हन में

Posted on November 5, 2008. Filed under: Hindi | Tags: , , , , , , , , , |

पूर्वी पाकिस्तान में हुये दंगे की याद अभी तक बुज़ुर्गो के ज़हन में

परलकोट क्षेत्र अपना एक अलग ही पहचान रखता है. एक तो यहाँ 133 गांव में बांग्लादेशी (पूर्वी पाकिस्तान) के लोगों को भारत सरकार द्वारा बसाया गया है जिसे परलकोट गाँव कहा जाता है और जिन्हे नम्बर से पहचाना जाता है जैसे PV133, दूसरा बंगालियों के कारण यहाँ वाम विचारधारा के लोग भी बहुत है. बाद में प. बंगाल से भी बहुत से लोग यहाँ आकर बसे और व्यवसाय किया और अभी भी कर रहे है. बहुत से ऎसे भी परिवार है जिनका कलकत्ता और पखांजूर दोनो जगह व्यवसाय है.

सन् 1971 में जब भारत और पाकिस्तान का युद्ध हुआ तब बांग्लादेश में हिन्दू-मुसलमान का दंगा हुआ और बहुत मारकाट मचा. तब पूर्वी पाकिस्तान-बांग्लादेश से बहुत से हिन्दू भागकर भारत आये. मुझे लगता है शायद इसीलिये दक्षिण पंथी पार्टीयां मुसलमानों पर आक्रमण करती है. अधिकांश बांग्लादेशी दलित थे और खेतीहर मजदूर थे. बाद में फिर भारत सरकार ने उन्हे कुछ दिनों तक देश के अलग-अलग राज्यों मैं कैम्प बना कर रखा गया और फिर उन्हें व्यव्स्थित रूप से बसाया जैसे कि छत्तीसगढ् में दण्डकारण्य प्रोजेक्ट के नाम से 133 गाँवों को बसाया गया. अविभाजित मध्यप्रदेश में पहले तो इन बांग्लादेशियों को रायपुर के पास माना कैम्प में रखा गया फिर बारी-बारी उन्हें परलकोट स्थानांतरण किया. साथ ही शरणार्थियों को 5-5 एकड़ जमीन और भारतीय नागरिकता भी दी गई. यह प्रोजेक्ट परलकोट क्षेत्र के अंतर्गत शुरू किया गया.

एक बुजुर्ग ने बातचीत के दौरान बतलाया कि-“ पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में मेरी साढ़े तीन एकड़ जमीन थी. हम लोग खेती और मजदूरी दोनो करते थे और पूर्वी पाकिस्तान के पाबना जिले में रहते थे. वहाँ हिन्दू-मुस्लिम दंगा हुआ इसलिये अब यहाँ पर रहने को मजबूर है. फिर से वापस अपने गाँव तो जाने का मन करता है लेकिन जा तो सकते नही ना. जब हम लोग यहाँ आये तब यहाँ खूब जंगल थी. सरकार ने हमारे रहने के लिये जंगल साफ कर घर बनवा कर दिया. साथ ही हमें महीनें या हफ्ते में राशन और पैसे भी मिलते थे जिसे डोल कहते है. माना कैम्प में अभी भी मिलता है लेकिन अब यहाँ लगभग बन्द हो गया.

दंगे, पाबना जिले में नही हुआ था लेकिन पूरे क्षेत्र में मुसलमानों का डर था इसलिये बहुत से लोग डर कर भाग गये, वैसे ही हम भी आये है. वहाँ व्यवस्था ठीक नही थी बहुत से हिन्दू पलायन कर रहे थे.”

जब हम लोग यहाँ आये थे तब यहाँ आदिवासी लोग हमें देख कर डरते थे. आदिवासी और हमारे बीच कभी किसी प्रकार की कोई लड़ाई नही हुई लेकिन अब होता है. महुआ को लेकर, गाय चराने को लेकर या जमीन को लेकर अब लड़ाई होता है. पहले यहाँ बाघ, भालू और हिरण थे लेकिन अब कुछ भी नही बचा है केवल चिड़िया की बचे है.

तेजेन्द्र

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परलकोट:छत्तीसगढ़ का बंगाल

Posted on November 5, 2008. Filed under: Hindi | Tags: , , , , , , , , , , , |

परलकोट: छत्तीसगढ़ का बंगाल

अप्रेल महीनें में किये परलकोट दौरे को एक छोटे यात्रा वृतांत की तरह लिख रहा हूँ. परलकोट जाने का यह मेरा पहला मौका था. कुल 990 कि.मी. की थकान भरी इस दौरे से बहुत कुछ सीखने, समझने और जानने को मिला. साथ संजय पराते जी भी थे जो सी.पी.एम. छत्तीसगढ़, सदस्य है, छत्तीसगढ़ किसान सभा के राज्य संयोजक है और राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना, भुमि समतलीकरण और ऋण माफी जैसे मुद्दों पर काम कर रहे है. संजय जी परलकोट के गाँव-गाँव में घूम-घूम कर लोगों से बातचीत करेंगे, योजनाओं की जानकारी देंगे और अप्रेल 22 तारिख के पखांजूर में एस. डी. एम. कार्यालय के सामने होने वाले धरना प्रदर्शन की जानकारी भी देंगे. परलकोट के बारे में मेरी जानकारी बहुत कम है. बस इतना पता था कि कांकेर जिला में है और महाराष्ट्र सीमा से सटा है. योजना बनी कि बाईक से ही जाया जाए. एक तो गर्मी ऊपर से लम्बी दूरी. शाम होने से पहले हम रायपुर से निकल गये. धमतरी में थोड़ी देर के लिये रूके फिर चरामा से अन्दर मुड़ गये. शार्टकट रास्ते से होते हुए केंवटी पहुंचे. केंवटी, नारायणपुर और भानुप्रतापपुर रास्ते पर है, यही से भानुप्रतापपुर के लिए मुड़ गये. बड़ी दूरी तय करने के बाद केवटी में रूके. फिर दुर्गकोन्दल पहुंचे तब तक रात के 8 बज गये थे. नारायणपुर से भानुप्रतापपुर के बीच सड़क चौड़ीकरण का काम निर्माणाधीन है इसलिए रात में गाड़ी चलाना मुश्किल है.

रात हम दुर्गकोन्दल में शक्ति डे के यहाँ रूके. चान्दनी रात थी. गर्मी बहुत थी, भला कि मच्छर नही थी. शक्ति डे यहाँ 1974 में खड़गपुर से आये और यही एक आदिवासी से शादी करके बस गये. शक्ति डे के ससुर रंजन डे 60 के दशक में यहाँ आये जब प. बंगाल में सी.पी.एम. की सरकार बनी. तभी अविभाजित मध्यप्रदेश में केन्द्र सरकार की बांग्लादेशियों को बसाने के लिये एक दंडकारण्य प्रोजेक्ट की शुरूआत हुई. रंजन डे परलकोट में वामपंथ लाने वाले पहले कुछ लोगो में थे. रंजन डे ने भी स्थानीय आदिवासी महिला से शादी की और यही बस गये थे.

दुर्गकोन्दल में कुछ परिवार बनिया और ब्राम्हण के है बाकि आदिवासी जाति के है, जिसमें गावडे, दुग्गा आदि प्रमुख है. दुर्गकोंदल और पखान्जूर में पुलिस चेकिंग पोस्ट है और शाम के बाद से ही सघन तलाशी शुरू हो जाती है. दुर्गकोन्दल से पखांजूर अब संवेदनशील हो गया है. कुछ वर्ष पहले ही इसी रास्ते में पड़ने वाले एक पुल को नक्सलियों से बम से उड़ा दिया था तभी से स्थानीय लोगों में डर बना हुआ है. इस रास्ते पर एक से दूसरे गाँव की दूरी भी बहुत है. इस रास्ते के दो बड़े गाँव बड़गाँव और कापसी अब संवेदनशील हो गया है. अखबारों से पता चला कि कुछ दिन पहले ही पखांजूर के पास ही के प्रतापपुर ब्लॉक के एक गाँव में नक्सलियों ने जनसूनवाई रखी थी और एक ग्रामीण को सजा भी दिया गया. इसके बाद से यहाँ दहशत फैला हुआ है. इसी तरह, शाम के बाद अब नारायणपुर से अंतागढ़ परिवहन बन्द है.

सुबह दुर्गकोन्दल में शूटिंग की और फिर पखांजूर के लिये निकल पड़ॆ. रास्ते भर नजरें उस सुनसान सड़क पर रही जिसके लिये दहशत रहती है. जैसे-जैसे हम पखांजूर की तरफ बढ़े भुट्टॆ के खेत दिखाई पड़ने लगे. मैंने इतने बड़े पैमाने पर भुट्टे की खेती कभी नही देखी थी. पखांजूर क्षेत्र भुट्टे के उत्पादन के लिये प्रसिद्ध है और बहुत सा भुट्टा नागपुर/महाराष्ट्र के पोल्ट्री फार्मों में निर्यात होता है. यहाँ लोग सम्पन्न है और आधुनिकतम जरूरत के सभी सामान लोगो के पास है. छत्तीसगढ़ के पूरे आदिवासी क्षेत्र में बस्तर का यही एक ऎसा क्षेत्र है जहाँ सम्पन्नता है. भुट्टे के साथ-साथ यहाँ फल और सब्जिय़ों की भी पैदावारी होती है. जिसे भी छत्तीसगढ़ के अन्य जिलों में निर्यात किया जाता है.

पखांजूर कांकेर जिले के अंतर्गत आता है. असल पखांजूर, मार-पखांजूर है जो पखांजूर से लगभग 40 किमी की दूरी पर महाराष्ट्र सीमा पर है. पखांजूर, परलकोट क्षेत्र का एक कस्बाई शहर है जहाँ बंगाली परिवार की अधिकता है और यह प्रमुख व्यवसायिक क्षेत्र है. परलकोट क्षेत्र में स्थानीय आदिवासी गोंड़ी और हल्बी बोलते है और अन्य भाषा में बंगाली है.

दुर्गकोन्दल और आसपास के गाँवों में आन्ध्रप्रदेश से आये कुछ परिवार, स्थाई और अस्थाई रूप से बसकर शल्फी और छिन्द रस का व्यवसाय कर रहे है. ये लोग छिन्द या शल्फी के पेड़ को कुछ सौ रूपये देकर सालभर के लिये ले लेते है और फिर साल भर उस पेड़ से इतना रस निकाला जाता है कि कुछ पेड़ तो साल भर के अन्दर ही सूखकर मर जाते है. शल्फी के पेड़ को सूर भी कहते है. छिन्द का पेड़ छोटा होता है और शल्फी का पेड़ बड़ा होता है. परलकोट में बसे बंगाली परिवार (पूर्वी पाकिस्तान अब बांग्लादेश से आये) इसके रस को निकालने की सही विधि जानते है वही स्थानीय आदिवासी नही जानते. आदिवासी इससे रस तभी निकालते है जब यह पेड़ बड़ा हो जाता है और वह भी सीधे पेड़ के उस स्थान से जहाँ से निकालने पर कुछ ही वर्षो में पेड़ मर जाता है. लेकिन बंगाली किसान शल्फी के लगभग तीन फीट बड़े होने के बाद से ही रस निकालना शुरू कर देते है और निकालने का तरिका भी अलग है. ये पहले एक तरफ से काटते हैं फिर अगले साल दूसरे तरफ से. ऎसे में उन्हे रस भी बहुत मिलता है और पेड़ की आयु भी बनी रहती है. शल्फी के पत्ते को अगर शल्फी में डुबो कर रखे तो कई दिन तक उसे बिना खराब किये रखा जा सकता है. फ्रिज में रखने से ठंडा भी रहता है और कुछ दिन तक खराब भी नही होता.

छिन्द रस से गुड़ बनता है और अगर सरकार चाहे तो इसे एक कुटीर उद्योग का रूप दे सकती है. यहाँ पोईफल की एक सब्जी उगती है जिसे यहाँ बड़े चाव के साथ खाया जाता है, ज्यादातर इसे बंगाली परिवार ही खाते है.

दुर्गकोन्द्ल क्षेत्र में सी.पी.आई और सी.पी.एम का कुछ प्रभाव है. देवीलाल दुग्गा, भारतीय जनता पार्टी से विधायक है और वर्तमान में संसदीय सचिव के पद पर है. इस पूरे आदिवासी अंचल में चुनावी दिक्क्ते भी बहुत है. पैसे और शराब का खुला खेल यहाँ खेला जाता है और आदिवासी भी सभी पार्टीयों से मजे लेती रहती है.

शक्ति डे ने बतलाया कि जब खड़गपुर में दुनिया की सबसे बड़ी रेल्वे स्टेशन बन रही थी तब प. बंगाल में स्थानीय लोगों ने डर के कारण यहाँ नौकरी नहीं की, तब दक्षिण भारतीय और छत्तीसगढ़ के बहुत से लोग वहाँ नौकरी करने आये और अब तो वही स्थाई रूप से बस गये है. रेल्वे में नौकरी को लेकर डर के मामले में वहाँ भी शायद ऎसी ही स्थिती रही होगी जैसे यहाँ भिलाई इस्पात संयंत्र के शुरू होने के समय थी. खड़गपुर में छत्तीसगढ़ी कॉलोनी और मोहल्ले भी हैं.

अप्रेल में अभी शादीयों का मौसम है, जगह-जगह शादी, शादी की तैयारी और सामाजिक उत्सव का माहौल बना हुआ है. जब रात दुर्गकोन्दल रूके थे तब भी किसी के यहाँ शादी हो रही थी लेकिन जिस बात ने दुखी किया वह यह था कि पारम्परिक गीत-गाना-बजाना का न होना. अब यह मात्र औपचारिकता ही रह गई है. मैंने अपने इस 8 दिन के इस दौरे में किसी भी प्रकार का पारम्परिक गीत-संगीत नही सुना. जो बज रहा था वह या तो सी.डी. था या फिर आधुनिक बैंड. खैर, पखांजूर पहुंचे. हम मिहिर राय के यहाँ रूके. फिर एक हफ्ता उन्हीं के घर रहे और परलकोट के बहुत से गाँवों में हमने दौरे किये.

तेजेन्द्र

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Towards Disaster

Posted on July 11, 2008. Filed under: My Films | Tags: , , , , , |

Producer, director, editor and camera/Documentary/30mins/2004

Film shows how man made problem turned the direction of river leading to Inter-state conflict and how Industrial pollution and big dams has increased problems by disturbing basin ecology and violating the reparian rights. Shot in Bastar region and western Rajnandgaon of Chhattisgarh.

By Tejendra Tamrakar

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