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यूँ ही गाँव-खेती से जुड़ा करो …

Posted on July 11, 2020. Filed under: Hindi | Tags: , , , |

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मन्दलोर गाँव                                                                   रावण भाटा

अभनपुर के मन्दलोर गाँव में हमारी खेती है. बचपन में बाबूजी (दादाजी) के साथ आते-जाते रहने के कारण खेती में मेरी दिलचस्पी रही है. स्कूली दिनों में दशहरा-दीपावली के महिने-डेढ़ महिने और फिर शीतकालीन छुट्टीयों में मेरा गाँव जाना होता था. बाबूजी के साथ खेत घुमना और उनकी बातों को सुनना मुझे रोमांचित करता था. बाबूजी ‘कृषि विस्तार अधिकारी’ थे और हमेशा दौरे पर रहते थे, साथ ही वे उन्नत कृषक भी थे. रिटायर होने के बाद पुस्तैनी बंटवारे में मिली अधिकांश जमीनें जो कि भर्री थी, सुधारने में भीड़ गये. सालों के मेहनत से उन्होने जमीन को खेती लायक बनाया. मुझे याद है उस समय उपज भी नही होती थी और सरकारी दरें भी नही के बराबर थी. (आज भी नही के बराबर है) धान बेचने के लिए कई दिन और रात नयापारा (राजिम) मंड़ी में बिताना पड़ता था.

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करपा                                         बाबूजी ब्यारा में खरही के साथ                 पंखा से धान उड़ाते

उन दिनों खेती दिवस बहुत लम्बी हुआ करती थी. धान पकने के बाद, पहले घान कटाई फिर कुछ दिनों तक धान (करपा) खेतों में ही पड़ा रहता था फिर धान ब्यारा तक पहुंचाना (भाड़ा ढुलाई करना) फिर ब्यारा में एकत्रित करना (खरही बनाना) और जब सारे धान ब्यारा में पहुंच जाता था तब बेलन चलना, धान उड़ाना और बोरे में भराई शुरू होती थी. तक जाकर धान बिकने को तैयार होता था. इस पूरे प्रक्रिया में दो महिने भी लग जाया करते थे. उस समय हमारे खेत बहुत उर्वरक थे, गोबर खाद का ही उपयोग हुआ करता था. हम मोटे और पतले दोनो धान बोया करते थे. धीरे-धीरे ट्रेक्टर और अब हार्वेस्टर के आने से दो महिने का काम दो दिन में हो जाता है. समय के साथ मजदूरों का नही मिलना और देरी होने से कृषि में बदलाव आना शुरू हो गया.

जब मैं गर्मी की छुट्टियों में जाया करता था तब तिवरा, चना, धनिया, अलसी, सरसों और गेहूँ भी देखने को मिल जाया करती थी साथ में बेर और ईमली भी. जो अब पूरी तरह से बन्द हो गयी है. धीरे-धीरे फसल भी सिमटते गया और वर्तमान में केवल घान का उत्पादन होता है. अधिक कीटनाशक और रासायनिक खाद के कारण खेतों की उर्वरूकता भी खतम होती गयी. समय के साथ-साथ हमने भी खेती करनी बन्द कर दी और खेत रेहगा में दे दिया लेकिन मैने शौकिया खेती जारी रखी.

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किसानों भाई-बहनों के साथ                                                                            स्कूल

गाँव में खाली पड़े मकान को कुछ बदलाव के बाद मैने छोटे से स्कूल के रूप में तब्दिल कर दिया इस तरह से गाँव में आना-जाना लगा रहता है. खेती करना मेहनत, धर्य, देखभाल और विश्वास का काम है. मौसम कभी एक सा नही रहता. आर्थिक चुनौती के साथ-साथ मजदूर, पानी, मवेशी और बिमारी से भी जुझना होता है. यह प्रक्रिया बहुत कुछ सीखाता है और प्रकृति के व्यवहार का भी आनन्द लेने का सुख मिलता है. खेती से जुड़ना भी पड़ॆगा और जुझना भी पड़ेगा.

दिनांक : 11.07.2020, शनिवार

तेजेन्द्र ताम्रकार

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पान सिंह तोमर

Posted on January 4, 2013. Filed under: Hindi | Tags: , , , |

तिग्मांशु धुलिया निर्देशित फिल्म ‘पानसिंग तोमर’ बार-बार देखी जानी चाहिए. यह फिल्म पानसिंह तोमर के ऎथलिट से बागी बनने तक की कहानी है.‘पानसिंह तोमर’ सफल फिल्म होने के तमाम हथकंड़ो का मुँहतोड़ जवाब है. मुरैना क्षॆत्र के इस बाधा दौड़ धावक का इरफान खान द्वारा अविस्मरणीय अदायगी वाली फिल्म है. मुझे यह ऎसी पहली फिल्म लगी जिसमें नायक की विजयी\अविजयी दौड़ को बिना किसी अतिरेक के स्वाभाविकता के साथ दिखाया गया है.
हालांकि फिल्म का एक-एक फ्रेम प्रभावशाली है लेकिन कुछ दृश्य अतिप्रभावशाली है जैसे ‘पान सिंह’ द्वारा थानेदार को वर्दी से माफी मांगने को कहना, पानसिंह बागी हो जाने के बाद भी वर्दी की सम्मान करना नही भुलता, यही दृश्य बागी को नायक के रूप में प्रतिष्टित करता है. थानेदार जिस तरह से थाने में मैडल और फोटो का उसी के होने का सबूत मांगता है फिर उसे पानसिंह के मुँह पर फेंकना, उसका अपमान था. बागी होने के बाद पानसिंह चाहता तो थानेदार को मार सकता था.
इसी तरह फिल्म मे ऎसे बहुत से यादगार दृश्य है जो गुदगुदाते भी है और भावुक भी कर देते है. जैसे पानसिंह की भूख. अफसर द्वारा ड्युटी पर दो दिन देर से आने की वजह पूछे जाने पर पानसिंह जवाब देता है कि– “खड़ी फसल कैसे छोड़ आते.” इसी तरह बागी बनने के बाद पानसिंह जब अपने बेटे से मिलने जाता है तब शरमाते हुये बेटॆ से “मम्मी” के बारे में पूछना, गजब का था. बेटे को आर्मी पर कम और पिता पर ज्यादा गर्व है. बेटे का यह कहना कि उसकी शादी तो आपके बागी बन जाने की वजह से ही लगी. वही उनके नायक है. वहीं आईस्क्रीम का तीनों सिक्वेंस बेहतरीन था. चाहे वह चार मिनट में अफसर के घर में आइसक्रीम पहुँचाने की बात हो या पत्रकार को जर्मन आइसक्रीम के बारे में बतलाने की या फिर उसी अफसर द्वारा पानसिंह के रिटायर होने पर आइसक्रीम तोहफे में दिये जाने पर उसे सबसे बड़ा मेडल कहना हो. यह बरसों के रिश्ते का सबसे ज्यादा बेहद भावुक क्षण था.
बागी किन परिस्थितियों में रहते है उसका अच्छा चित्रण हुआ है. आमतौर से बागियों के लिए डर का भाव पैदा होता है लेकिन फिल्म अतिनाटकीयता से बची रही. बागी धार्मिक भी होते है और शायर भी. एकता उनकी ताकत होती है और आत्मसम्मान सबसे ऊपर. इसलिए मरना पसन्द लेकिन आत्मसमर्पण नही.
चुंकि पानसिंह आदतन अपराधिक प्रवृत्ति का नही था इसलिए रॆडियो पर अपनी बागी होने की खबर सुनकर मीडिया की सनसनीखेज खबर पर गुस्सा जाहिर करता है कि जब उसने देश के लिए खेल कर मैडल जीता तब किसी उसे गम्भीरता से नही लिया. बागी बनने से पहले पानसिंह को सबसे ज्यादा गुस्सा चचेरे भाई द्वारा उसकी माँ को बन्दुक के कुन्दे से मारे जाने पर आया था. फिल्म में उसका पहला गुस्सा भी तब सामने आया जब उसके कोच ने उसे माँ की गाली दी थी और फिर गुस्से का इस्तेमाल दौड़ में लगाया और जीता.
जब पानसिंह एशियन गेम्स खेलने गया तब कोच के साथ खाने-पीने सुविधा व जुते को लेकर साफगोई से की गई बातचीत भी मजेदार है और भारत में एथलिट की हालात बयां करती है. अचानक से मिली सुविधाएँ व तामझाम खिलाड़ियों को असहज बना देती है इसलिए दौड़ते समय पानसिंह का ध्यान दौड़ने में कम और जुते पर ज्यादा था. अंतत: दौड़ के बीच में ही उसने जुता उतार फेका और स्वाभाविक दौड़ा. आज भी हालात मोटे तौर पर जस के तस है.
पान सिंह को युद्ध में केवल इसलिए नही भेजा गया क्योंकि वह धरोहर है. युद्ध में न भेजा जाना उसके लिए कड़वे घुट से कम नही था. इसलिए, समाज व व्यवस्था से न्याय नही मिलने के कारण युद्ध के लिए वह हथियार उठा लेता है. पानसिंह को अपने बागी होने पर उतना गर्व नही था जितना कि सेना मे होना, खिलाड़ी होना, आदर्श बेटा, पति होना और एक परिपक्व आदर्श पिता होना जो विपरित परिस्थितियों से गुजरने पर भी बिना विवेक खोये अपने बेटे को देश की रक्षा करने लिए सेना में भेजता है.
बागियों का जीवन व विचारधारा को निकट से जानने-सूनने की उत्सुकता के साथ बहुत कुछ दाँव पर लगाकर रिपोर्टिंग करना पत्रकार के लिए जोखिम के साथ-साथ रोमांचक भी होता है, जिसे बखुबी दिखाया गया है. इरफान खान द्वारा एक खिलाड़ी और बागी जीवन के साथ-साथ, पानसिंह जिस पृष्ठभुमि से सेना में गया उसकी संवादगी, सादगी, निडरता, भोलापन व भीतर के गुस्से की कमाल की एक्टिंग की गई है.
फिल्म में एक भी गीत नही है, और ब्रेक भी अनावश्यक लगता है. सभी पात्रों ने अपना-अपना श्रेष्ठ काम किया है. माही गिल ने अपनी पिछली अनुराग कश्यप निर्देशित फिल्म ‘देव-डी’ की तरह इस फिल्म में भी पात्र के साथ न्याय करने की कोशिश की है. यह नायक प्रधान नही, कहानी प्रधान फिल्म है और दर्शको ने इसे भरपुर सराहा है. थियेटर से निकलने के बाद भी यह दिलोदिमाग पर छाई रहती है.
फिल्म के अंत में उन प्रतिभावान लोगों की सूची है जिन्होने देश-विदेश में भारत का नाम रोशन किया है.  जिन्हे समाज और सरकार द्वारा पर्याप्त सहायता व सम्मान नही मिलने के कारण अभाव व मुश्किल में दिन गुजारने पड़े. समाज अच्छे कामों की सराहना बहुत देर बाद करती है. कई बार तो मर जाने के बाद.
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आदिवासी : आदिवासी

Posted on June 6, 2010. Filed under: Hindi | Tags: , , , |

पिछले हफ्ते मैं अंतर्राष्ट्रीय समाचार चैनल अल-ज़जीरा इंग्लिश की टीम के साथ दक्षिण बस्तर में था. हम यु.पी.ए. सरकार के छठवें वर्ष के समाप्ति पर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के अपने पहले प्रेस कांफ्रेस के सम्भावित बयानों को ध्यान में रखकर देश के सबसे अधिक नक्सल प्रभावित एवं संवेदनशील क्षेत्र दक्षिण बस्तर से सीधा प्रसारण करने के लिए पहुंचे थे.

प्रधानमंत्री जी मीडिया द्वारा पूछे गये नक्सल सम्बन्धित सवालों के जवाबों को तो टाल गये. लेकिन हम अपने काम को नही.

गाँवों में आदिवासियों से बातचीत के साथ-साथ दोरनापाल कैम्प के स्थानीय पुलिस एवं कोया कमांडॉं द्वारा पेट्रोलिंग और डीमाईनिंग की रोजमर्रा की प्रक्रिया में हम दिनभर के लिए शामिल हुये. 45 डिग्री सेल्सियस की झुलसा देने वाली गर्मी और 15 से 20 किलो की भारी भरकम बुलेटप्रूफ जैकेट और अन्य समानों के साथ जवानों की रोज की कई किमी की प्रेट्रोलिंग थकाऊ और मुश्किल भरा काम है. घनें जंगलों में फैल कर पेट्रोलिंग करने वाले इन जवानों के पास आपसी सम्पर्क और बचाव के लिए नाममात्र के ही वायरलेस सेट और सुविधाये है.

कोया कमांडों के जवान पहले सलवा जुडुम समर्थक थे बाद में एस.पी.ओ. बने. ये कोई और नही स्थानीय आदिवासी ही है. पिछले दिनों मारे गये कोया कमांडों के जवान जिस यात्री बस में सवार थे वे शायद क्षण भर अपनी सशस्त्र पुलिसिया जवाबदारी को भुलाकर उसी भावना के साथ बस में बैठ गये थे जैसे वे कभी बेखौफ यात्रा किया करते थे. अपने आदिवासी भाईयों के इस तरह से मारे जाने की घटना के बाद से अब इन्हे अपने क्षेत्र ही में अकेले या दल के साथ भी 5-10 कि. मी. जाने से डर लगता है कि कही नक्सली उन्हे मार न डाले.

दोनो तरफ से एक दूसरे के प्रति अविश्वास, डर और जनजीवन पहले की तरह ही सामान्य होने की उम्मीद के बीच की असमंजस्य स्थिति बनी हुई है. यही वजह है कि स्थानीय आदिवासी जवान और नक्सली आपस में ही हमलावर और बचाव की स्थिती में है, जो कभी इनके अपने ही थे. इनके चेहरों पर ढेरों प्रश्न पढे जा सकते है. अपनी-अपनी सत्ता और सम्पदा की दोहन और लूट से ऊपजी इस खूनी खेल में अपने ही लोगो और समुदाय से साथ की लम्बी लड़ाई ने उन्हे द्रवित और विचलित कर दिया है जिन्हे मानवीय तौर पर केवल महसूसा जा सकता है.

तेजेन्द्र

साथ में पढियें अल-ज़जीरा इंग्लिश की सम्वाददाता प्रेरणा सूरी की रिपोर्ट:

http://blogs.aljazeera.net/asia/2010/06/03/maoists-heartland

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तेन्दुपत्ता या रतनजोत

Posted on April 25, 2009. Filed under: Hindi |

क्या इस बात की कल्पना भी की जा सकती है कि रतनजोत कितना नुकसान दायक हो सकता है. इसका जवाब हाँ मे भी हो सकता है और नही में भी. पिछले दो-तीन महीनों में जितनी भी बार मेरी मुलाकात रतनजोत से हुई है, अच्छी नही रही. यह सुन्दर सा विदेशी पौधा कैक्टस ही नजर आया. रतनजोत से तो अच्छा नाम बगरंड़ा है, कुछ डरावना, भस्मासुर जैसा. वर्तमान में भाजपा सरकार इसे एक पायलेट प्रोजेक्ट के रूप में चल रहा है. उत्पादन शुरू भी नही हुआ है और अभी से इससे होने नुकसान नजर आने लगे है.

दो महिने पहले एक डॉक्युमेंट्री फिल्म के लिये मैने बिलासपुर में कुछ बच्चों और उनके अभिभावकों की इंटरव्युह की. लगभग 3 से 12 वर्ष तक के एक दर्जन बच्चे रतनजोत खाकर बीमार पड़े थे और उन्हे तुरंत सिम्स में भर्ती कराया गया था. जहाँ मैने शुटिंग की थी वह बिलासपुर का इमलीभाटा क्षेत्र है और यह कोई पहली घटना नही थी. चुंकि कुछ घटनाये शहर या शहर के आसपास के इलाकों में होती है, दुर्घटना का पता चल जाता है. फिर पिछले महिने मार्क्सवादी कम्यूनिष्ट पार्टी के श्री संजय पराते के साथ कांकेर के परलकोट क्षेत्र में जाने का मौका मिला. चुंकि पूरी यात्रा बाईक से थी तो जगह-जगह रूक-रूक कर बहुत सी बांतों को समझने और जानने का मौका मिला. इसमें से एक थी सड़क के दोनो तरफ फैली हुई बगरंडा.

यह पहली बार नही था इस तरह से किलोमीटर नापना लेकिन अप्रेल-मई तेन्दुपत्ता का मौसम तो होता ही है और अगर शहर से 100-150 कि.मी. दूर जाये तो सड़क के दोनो तरफ अपने से उगे तेन्दुपत्ता जरूर दिखाई दे जाते है लेकिन इस बार अंतर था. तेन्दुपत्ता की जगह फैला था भस्मासुर-बगरंडा.

पंचायत, वन विभाग और रोजगार गारंटी के तहत लाखों रूपये खर्च कर इस पूरे क्षेत्र में पिछले दो साल से रतनजोत के पौधे का रोपण किया जा रहा है.

पहले बात करे भ्रष्टाचार की- एक तो रतनजोत का रोपण, रोजगार गारंटी के तहत किया जा रहा है जो वनीकरण के शर्तो में नही आता. ऊपर से रोपण करने वाले ग्रामीणों को दो-तीन महिने से मजदूरी भी नही मिली है.

ग्राम पी.व्ही. 20 ग्राम पंचायत-बैकुंठपुर, ब्लॉक कोयलीबेडा, कांकेर में कुछ लोगो ने अपने रोजगार गारंटी कार्ड दिखाये, जिन्होने वनीकरण के नाम पर दो महिने पहले रतनजोत का पौधा रोपण किया था लेकिन आज तक इन्हे भुगतान नही हुआ है. इसी गाँव के जतनशील और सुभाष सरकार ने बतलाया कि हम लोग 15,000 रतनजोत लगाये. उसमें 7 लाख का काम रोजगार गारंटी की तहत हुआ फिर एस.डी.एम. ने और 5,000 बढ़ाया उसके बाद फिर 10,000 बढ़ाया फिर उसके बाद पेमेंट दिया. उस समय पेमेंट को लेकर 7 लाख का घोटाला हुआ था. असल पेमेंट तो मात्र 28,000 से 30,000 तक ही हुआ था. और अभी वहाँ एक भी झाड़ नही है. उस समय हम लोग 15-20 आदमी इस काम के तहत गये हुये थे और यह लगभग एक महिने तक चला. सरकारी जमीन पर लगाया गया और वर्तमान में ज्यादा से ज्यादा 50-100 ही पौधे ही जीवित होंगे.

आदिवासी क्षेत्र में फल खाने की संख्या बढ़ेगी- अभी भी छत्तीसगढ़ का बहुत बड़ा हिस्सा वन क्षेत्र है और यहाँ रहने वाले जनजातियाँ न केवल वनोपज से आर्थिक लाभ लेती है वरन् उनके भोजन का हिस्सा भी है और वे जड़ी-बूटी के बड़े जानकार भी है. अगर इसी तरह से बगरंडा लगाया तो उपरोक्त तीनों बांतों पर देर-सबेर भारी असर पड़ेगा. आदिवासी क्षेत्र में यदि गलती से कोई फल खा ले तो तुरंत किसी को समझ में भी नही आयेगा और पास ही कोई आपात चिकित्सा की सुविधा भी नही होगी. जब तक फल नही लगे है तब तक तो ठीक है लेकिन तब क्या होगा जब यही आदिवासी बच्चे नजदीक में ही मुफ्त में काजू की तरह लगने वाले फल को खायेंगे!!!

पी.व्ही. 26 मायापुर पंचायत के गणॆश बर्मन ने बतलाया कि कुछ साल पहले पी.व्ही. 45 में रतनजोत खाने से दो बच्चे बीमार पड़े थे. उनकी हालत बहुत खराब थी. एक बच्चा तो कई घंटो तक भी होश में नही आया था और दुसरा भी 4-5 घंटे तक बेहोशी की हालत में रहा.

तेन्दुपत्ता व्यव्साय पर जबरदस्त प्रभाव पड़ेगा- पखांजूर से दुर्ग कोन्दल के रस्ते पर पुरे समय हमारी नजर रतनजोत और तेन्दुपत्तो पर ही रही. जो बांते कुछ ग्रामीनों से हुई वह वाकई चौकाने वाली थी कि कही न कही रतनजोत, तेन्दुपत्ता को नुकसान पहुंचा रहा है और फिर यह ख्याल आता रहा कि यदि इसी तरह से रतनजोत लगाया गया तो अन्य वनस्पतियों के साथ-साथ तेन्दुपत्ता भी चौपट हो जायेगा.

पखांजूर से दुर्गकोन्दल के मुख्य मार्ग के दोनो तरफ रतनजोत का रोपण हुआ है. बीच में ऎसे कुछ जगह है जहाँ तेन्दुपत्ता अपने नैसर्गिक रूप से मौजुद है, घने है और बढ़त भी अच्छी है. लेकिन साथ ही ऎसा बड़ा क्षेत्र भी आया जहाँ दोनो तरफ रतनजोत का रोपण हुआ है. जहाँ-जहाँ रतनजोत है वहाँ तेन्दुपत्ता या तो नही है, या तो कम है और अगर है तो बढ़त नही है. लेकिन ऎसा हमने एक भी बार नही देखा कि रतनजोत और तेन्दुपत्ता की सघनता और ऊंचाई बराबर हो.

सड़क के दोनो तरफ जहाँ सामने की ओर रतनजोत है वहाँ तेन्दुपत्ता नही है और जहाँ सड़क से 100-200 मीटर दूर रतनजोत है वही सामने की तरफ तेन्दुपत्ता है लेकिन वहीं 100-200 मीटर दूर रतनजोत के पास तेन्दुपत्ता नही है. वही ऎसे भी कुछ क्षेत्र भी देखने को मिले जहाँ ढ़लान है और पानी का स्रोत है वहाँ रतनजोत सघन है और ऊंचाई भी है लेकिन इसका तेन्दुपत्ता पर असर पड़ा है.

आदिवासी साल के चार महिने इन्ही तेन्दुपत्ता पर निर्भर रहते है और उन्हे अभी भी तेन्दुपत्ता पास ही के जंगलों में मिल जाता है, दूर जाने की जरूरत नही होती. अब देखना यह है कि अगर वाकई में रतनजोत तेन्दुपत्ता को नुकसान पहुंचा रहा है तो यह आने वाले आठ-दस सालों में ही यह तेन्दुपत्ता का कितने बड़े भु-भाग पर असर डालेगा. अभी शायद यह बहुत ज्यादा चिंता का विषय नही है क्योंकि तेन्दुपत्ता के बहुत बड़े हिस्से को तोड़ा ही नही जाता. इस तरह से यह निश्चिंतता तो हो सकती है कि कम से कम कुछ दशक तक नुकसान की भरपाई हो जायेगी लेकिन नही भुलना चाहिये कि इससे एक तो पत्ते तोड़ने दूर तक जाना होगा और फल खाने की घटनाये निश्चित तौर पर बढ़ेगी.

जब रतनजोत का रोपण किया जाता है तब जो गढ्ढ़ा खोदा जाता है उससे भी तेन्दुपत्ता को नुकसान होता है.

साल में एक बार बूटा कटाई होती है और फिर तेन्दु का पौधा अपने से बढ़ने लगता है. लेकिन रतनजोत रोपण के नाम पर तीन-तीन, चार-चार बार बूटा कटाई हुई है. जिस कीटनाशक क्लोरोफासऔर अन्य दवा का प्रयोग किया जाता है वह आसपास की वनस्पति को नुकसान पहुंचा रहा है. यह कीटनाशक दवा केयर टेकर के लिये भी नुकसानदेह है. इससे त्वचा और साँस में तकलीफ होती है. लेकिन सरकार ने अभी तक किसी को भी इससे होने वाली बिमारी के बारे में न तो बतलाया है और न ही किसी प्रकार का जागरूकता अभियान चलाया है.

दुर्गकोन्दल के श्री शक्ति डे ने भी बतलाया कि उनके क्षेत्र में रतनजोत के रोपण के बाद से तेन्दुपत्ता की सघनता में कमी आई है और जहाँ-जहाँ पर रतनजोत है वहाँ घास भी नही उगती.

छत्तीसगढ़ की रमन सरकार जिद्द पर यह प्रोजेक्ट कर रही है और पूरे देश में केवल डॉ. रमन सिंह के अलावा किसी की गाड़ी बायो-डीजल से नही चलती. जहाँ तक बात बायो-डीजल के सस्ते में उपलब्ध होने की है तो डीजल और पेट्रोल पर लगने वाले बहुत से टैक्स हटा दे तो यह कीमत बायो-डीजल से कम ही होगी यानि बायो-डीजल महंगा साबित होगा.

बाद में रतनजोत पर कृषि वैज्ञानिक श्री पंकज अवधिया से बात हुई तो उन्होने बतलाया कि चिंता की बात तो है लेकिन साथ ही तकनीकि दिक्कतें भी है और वैज्ञानिक चुनौतियाँ भी.

बगरंडा (रतनजोत) बिल्कुल बेशरम की ही तरह फैल रहा है और महिसासुर जैसे बहुत बड़े क्षेत्र को तबाह कर रहा है. आज नही तो कल आदिवासी क्षेत्रों में इसकी वजह से भुखमरी फैलेगी जैसा कि शक्ति डेने कहा. इसलिये बहुत जरूरी है कि यह तय हो कि क्या तोड़े और हमें क्या चाहिये तेन्दुपता या रतनजोत.

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द्रविणों पर आर्यो का हमला

Posted on November 11, 2008. Filed under: Hindi | Tags: , , , , , , , , , , , , , , , , , , , |

इस बार नवरात्रि बस्तर में ही बीती. पिछले बार की तरह इस बार भी सफ़र बाईक पर ही था लेकिन पहले से बहुत ज्यादा लम्बा दूरी …. लगभग 1300 कि.मी. बस्तर जाने से पहले मैंने दूसरी बार पं. जवाहर लाल नेहरू की “विश्व इतिहास की झलक” पढ़ना शुरू किया था. लगभग आधा पढ़ लेने के बाद बस्तर चला गया. मोटॆ तौर पर आर्य, द्रविण, जाति, धर्म और सत्ता की लड़ाई, बर्बरता, कबिलाई संघर्ष, कला और संस्कृति के बारे में पढ़ी बहुत सी बातें मेरे दिमाग मे ताजा थी. जिस दौर की बातें मैं पढ़ रहा था मानो मैं वर्तमान में बस्तर में देख रहा था.

2 अक्टूबर की सुबह-सुबह, जगदलपुर से दंतेवाड़ा की ड्राईव बड़ी सुहावनी थी. अच्छी ठंड थी और हल्की सूरज की रोशनी पड़ते ही दूर-दूर तक गहरी धुन्ध फैली हुई थी. 10-20 मीटर से आगे कुछ दिखाई नही दे रहा था. बड़ी सुनहरी और सुहावनी सुबह थी. इस रास्ते पर आगे जिस बात ने ध्यान खींचा, वह था नवरात्रि के पदयात्री. वे सारे युवा और गैर-आदिवासी थे.  दंतेवाड़ा  में डोंगरगढ़ की तरह का नजारा था. एस्सार ने रास्ते भर ठहरने और खाने-पीने की व्यवस्था की थी.

जहाँ रोज यहाँ के आदिवासी कई किलोमीटर पैदल चल कर बाज़ार या अन्य काम के लिये कस्बे या शहर आते है वहीं वे इन शहरी नौजवान लड़के-लड़कियाँ को पाँव में पट्टी बांध-बांध कर पदयात्रा करते और उनकी यह दशा-दुर्दशा देखकर साथ चल रहे आदिवासी इस नयी परम्परा को आश्चर्य से देख रहे थे और उन्हे ऎसी भक्ति समझ में नही आ रही थी.

खैर, मैं दंतेवाड़ा पहुंचा जहाँ वनवासी चेतना आश्रम के हिमांशु जी द्वारा गाँधी जयंती पर न्याय एवं शांति सभा और  रैली निकाली जानी थी. धीरे-धीरे लोग इकट्ठे होने शुरू हुये. लोगों को इस तरह इकट्ठे होते देख मुझे लगभग तीन साल पहले सलवा जुडुम पर बनाये जाने वाले एक डॉक्यूमेंटरी फिल्म की याद आ गई, तब सलवा जुडुम को शुरू हुये ज्यादा दिन नहीं हुये थे और हम भैरमगढ़ और पास की कुछ नक्सल प्रभावित गाँवों में रैली के साथ-साथ गये थे.

पिछले साल, गाँधी जयंती के दिन मैं रायगढ़ में था वहाँ  मेधा पाटेकर जी आई थीं. शहीद सत्यभामा जी को श्रद्धांजलि देकर अन्य साथियों के साथ तमनार ब्लॉक के “गारे” और “राबो” गाँव पहुंचे थे जहाँ कुछ दिन पहले ही जिन्दल कोल माईंस और राबो बान्ध के खिलाफ की जा रही एक जन सुनवाई के दौरान लाठी चार्ज हुई थी और 105 ग्रामीण घायल हुये थे जिसमें 11 लोग गम्भीर रूप से घायल हुये थे. इस साल भी छत्तीसगढ़ के एक ऎसे क्षेत्र में गाँधी जयंती देखा जहाँ घोर अशांति है. दंतेवाड़ा की रैली में लगभग 200-300 आदिवासी शामिल हुये थे. सभी नक्सली और सलवा-जुडुम प्रभावित थे और अपनी मूलभूत जरूरतों की मांग कर रहे थे.

लेकिन उस शांति रैली और आज के शांति रैली में नि:सन्देह अंतर है. रैली में दोनों तरफ से प्रभावित लोग शामिल थे और अब वे सामान्य जीवन जीने के लिये संघर्ष कर रहे है. सभा में बहुत से लोगो ने अपनी बातें रखी फिर रैली निकली और शाम होते-होते सभी अपने-अपने गावों को लौट गये. इसी दंतेवाड़ा में आज सुबह एक पदयात्रा देखी जो माँ दंतेश्वरी के दर्शन को जाते गैर आदिवासी थे और दिन में भी एक पदयात्री देखी जो  रैली के रूप में आदिवासियों की थी वह भी फोर्स के साये में.  सैकड़ों की संख्या में जो लोग दंतेश्वरी माता के दर्शन के लिये दूर-दूर से आये उन्हे इसी शहर में हो रहे इस रैली/गतिविधि के बारे में रूचि नही है. मैने कुछ लोगो से प्रतिक्रिया जाननी चाही लेकिन वे चुप्प रहे.

इस रैली में एक छोटा सा 5-6 साल का बच्चा भी था जो पूरे समय अपने साथ ए.के.47 रायफल (प्लास्टिक का खिलौना) रखे रहा. उसके पिताजी ने बतलाया कि “मिज़ो फोर्स के लोग इसके हीरो है और यह बहुत दिनों से उन्ही की तरह बन्दूक रखने की ज़िद कर रहा था. कुछ महीने पहले मेरी मुलाकात पखान्जूर के मांड क्षेत्र से आये एक परिवार से हुई थी. उनमें से 30-32 साल के एक लड़के ने बतलाया था कि जब वह 5-6 साल का था तब पहली बार नक्सली उसके गाँव आये थे और आज उनका गाँव नक्सली और पुलिस के बीच पीस रहा है. किस तरह से मासूम बच्चे बन्दूक के साये में पल-बढ़ रहे है इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है. क्या नक्सली, सलवा जुडुम या फोर्स (सरकार) एक पीढ़ी के बाद फिर दूसरी पीढ़ी को यही विकल्प या आदर्श के रूप में पेश कर रहे है?

अगले दिन संयोग से मेरा “नेन्द्रा” जाना हुआ. “नेन्द्रा”, दंतेवाड़ा जिले का एक ऎसा गाँव है जिसे चार बार जलाया है और कई लोगों को मारा गया है. वनवासी चेतना आश्रम के प्रयास से अब कुछ लोग वहाँ रहने आये है, जो भागकर आन्ध्रप्रदेश चले गये थे. वे आश्रम के सहयोग से अस्थाई घर बना कर रह रहे है और आश्रम द्वारा राशन की मदद भी दी जा रही है. लोग अब अपने गाँव वापस आना चाहते है. खेती करना चाहते है और फिर से पहले की तरह जीना चाहते है. यह तो सिर्फ एक गाँव की बात है दंतेवाड़ा में तो ऎसे बहुत से गाँव से है.

घने जंगल में 8 कि. मी. पैदल चलकर हम इस गाँव तक पहुंचे. कितने टूटे, परेशान और निराश दिखे यहाँ के लोग. समझ पाना बहुत मुश्किल है कि कोई कैसे इनके घरों को आग लगा सकता है, कैसे मार सकता है. यहाँ रह रहे लोगों ने जो आप-बीती सुनाई वह किसी भयंकर बुरे सपने से कम नहीं थी. किसी भी स्थिति को समझने और जानने के लिये मुझे लगता है कि वहाँ जाना और लोगों से बात करना बहुत जरूरी है. लोग कैम्पों में कैद है. जगह-जगह चेकिंग पोस्ट है, मिलेट्री है, फोर्स है. यहाँ हर कोई संदिग्ध है और एक-दूसरे के दुश्मन है.

फिर आगे नगरनार और लोहंड़ीगुड़ा गया जहाँ उद्योग लगने है. यहाँ लोगों को उद्योग के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नही है और वे भविष्य को लेकर चिंतित और भयभीत है. अलग-अलग राजनैतिक दल के लोग वहाँ जाते रहते है और सांत्वना देते रहते है. जब मैं नगरनार पहुंचा तब लोग धरना देने की तैयारी में थे. ये वे लोग है जिनका जमीन ले लिया गया है और वायदानुसार आज तक इन्हें नौकरी नहीं मिली है और न ही खेती करने दिया जा रहा है. लोहंड़ीगुड़ा के लोग तो और भी ज्यादा डरे हुये है. ग्रामीण कुछ भी बोलने और बतलाने से भी कतरा रहे है.

बहुत से गाँव में समय बिताने और लोगो से मिलने के बाद दशहरा से पहले जगदलपुर वापस आया. बस्तर का प्रसिद्ध दशहरा केवल एक रस्म नही है इसके पीछे पूरी आदिवासी परम्परा और व्यवस्था है जो समय के बदलाव के साथ टुटती और बिखरती नजर आयी.

वैसे तो बस्तर के दशहरा का भगवान श्रीराम से कोई लेना देना नहीं है. वैसे भी यह दंण्डकारण्य है और दन्तेवाड़ा के उत्तर-पश्चिम में लंका नामक एक जगह भी है और इस अंचल में रावण मारने की भी कोई परम्परा भी नहीं है. बस्तर दशहरा का सरकारीकरण हुआ सो हुआ लेकिन पिछले कुछ सालों में इस उत्सव में गैर आदिवासियों का दखल और दबदबा भी तेजी से बढ़ा है. बस्तर दशहरा के कमेटी में गैर-आदिवासियों का कब्जा हो रहा है और इनके बीच आदिवासी घुटन महसूस कर रहे है. जय माता दी और जय श्री राम आदि के नारे आदिवासियों को चुभ रहे है. लाऊड स्पीकरों और सरकारी बैंड के शोर में इनका पारंपरिक वादन दब गया है. जिस दिन का इंतजार यहाँ के आदिवासियों को साल भर से रहता है, जिसके लिये वे दिन-रात तैयारी में लगे रहते है, कुछ ही घंटे में निराश, हताश और अपमानित महसूस करते है. इनके पूजा-पाठ के तौर-तरीकों, नाच-गान और देवताओं के साथ झूपने का मजाक उड़ाया जाता है.

दंतेवाड़ा में दंतेश्वरी मन्दिर में कुछ सालों से जसगीत शुरू हुआ. जगदलपुर के दंतेश्वरी मन्दिर में सांई बाबा का चित्र टंगी देख आश्चर्य होता है. मन्दिर के पुजारी बतलाते है कि एक प्रभावशाली स्थानीय कांग्रेसी नेता ने किस चतुराई के साथ सांई बाबा को मन्दिर में एंट्री दिलवाई. जगदलपुर में एक 50-60 फीट की हनुमान की मूर्ति स्थापित की गई है. पिछले कुछ सालों में बजरंग दल, शिव सेना और अन्य हिन्दू धर्म के संघठनों ने बड़ी तेजी से पैर फैलाया है. हजारों साल पहले हुये “द्रविणों पर आर्यो का हमला” आज भी अपने तरिके से जारी है.

बस्तर के दशहरे पर्व में आदिवासी समाजों की अपनी-अपनी विशिष्ट स्थान और जिम्मेदारियाँ है लेकिन गैर आदिवासी, धार्मिक और राजनैतिक दल के पदाधिकारी, व्यापारी और उच्च वर्ग मिलकर इन पर अपना कब्जा कर रखा है. आने वाले कल में दंतेश्वरी माई की छतरी उठाने वाला पूरी तरह से कोई गैर आदिवासी या यही लोग रथ खींचने भी लगे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी.

यहाँ कुछ शहरी समाज के लोग बड़े गर्व से मुझे यह भी बतला रहे थे कि हमने इन आदिवासियों को जीने का तरीका सिखाया है, कपड़े पहनना सिखाया है नहीं तो ये जंगलों में नंगे रहते थे. इन असभ्य लोगों को हमने सभ्य बनाया है. ये भूल जाते है कि ये इनके क्षेत्र में रहते है और इन्ही के क्षेत्र के बदौलत इनका व्यापार चलता है.

विकास के नाम पर जहाँ-तहाँ आदिवासियों  के मृतक स्तम्भों को तोड़-तोड़ कर चमकदार सड़कें बना दी गई. मुझे याद है कि झारखण्ड में कोयलकारो परियोजना को वहाँ के आदिवासियों ने केवल इसलिये नही बनने दिया कि वे अपने गाँव के देवताओं को जलमग्न नहीं होने देना चाहते थे. क्योंकि यही उनकी एक पहचान है.

बस्तर में  केवल समस्या ही नहीं है, बहुत सी अच्छी बातें भी है जिसको जानना और समझना अभी भी बाकी है. देवी-देवताओं और रूढ़ीवादी परम्पराओं में यहाँ के आदिवासी अभी भी पूरी तरह से विश्वास रखते है. जंगल, जीवन और लोक कथाओं की बड़ी समझ, अभी भी बाकी है. बस्तर को समझने के लिए बस्तर का दशहरा एक बड़े अवसर की तरह है क्योंकि यही वह समय होता है जब पूरे बस्तर से लोग आते है और उनसे मिलने, बातचीत करने, जानने और समझने का मौका मिलता है. यही के राजमहल के अहाते में मेरी मुलाकात बड़ॆ-डोंगर के पास के गाँव से आये एक बुज़ुर्ग से हुई जिन्होने बतलाया कि किस तरह से वे बचपन और जवानी में गीत-संगीत करते थे. दिनभर थके होने के बावजूद रात में लगातार चार घंटे ऎसे-ऎसे गीत सुनाये जो अब गाएँ नहीं जाते.

तेजेन्द्र

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अंत में बहुत सी बातें

Posted on November 10, 2008. Filed under: Hindi | Tags: , , , , , , , , , , , |

आज लगातार चौथा दिन है कि यहाँ टेलीफोन पूरी तरह से ठप्प है. हफ्ते में तीन-चार बार ठप्प होना, यहाँ सामान्य बात है. खासकर शुक्रवार-शनिवार को बन्द कर दिया जाता और फिर सोमवार-मंगलवार को फिर चालू कर दिया जाता है. इससे दो बातें सामने आ रही है एक तो बी.एस.एन.एल. के अधिकारियों की निजी टेलीफोन कम्पनियों की मिली भगत से उपभोक्ताओं को परेशान करना ताकि वे अन्य निजी टेलीफोन की मांग करे और दूसरी कम्पनियों को लाभ मिले. दूसरी खबर जो बाद में आयी वह यह की भानुप्रतापपुर रस्ते पर किसी ठेकेदार द्वारा गलती से लाईन का काट दिया जाना जिससे की इतने दिन तक टेलीफोन ठप्प रहा. शायद बाद में उसके खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज कराया गया. इस तरह से टेलीफोन का बन्द हो जाना पखांजूर में ही नही पूरे कांकेर जिले में है.

आज छठा दिन 22 तारीख, आखिर कार आज वह दिन आ ही गया जिसकी तैयारी पिछले कई दिनों से चल रही थी. सुबह से बैनर, पोस्टर और लाऊड स्पीकर की तैयारी शुरू हो गई. जो नौजवान लोग थे वे लोग तैयारी करने में लगे थे और धीरे-धीरे लोग आना शुरू करते गये और फिर नारे बाजी और भाषण शुरू हुई. रोजगार गारंटी योजना की योजना अधिकारी सांतन देवी जांगड़े अन्दर ही बैठी थी. कुछ देर के नारे के बाद पार्टी के लोग एस.ड़ी.एम. से मिलने अन्दर गये. स्थिती उस समय गरमा गई जब कामचलाऊ आश्वासन और कुछ कार्यवाही किये जाने की बात कह कर एस.डी.एम. बाहर जाने लगी. फिर संजय जी और अन्य साथियों ने घेराव किया. यह पूरा क्षण बहुत तनाव भरा था.

किसी अधिकारी को कैसे घेरना है, कैसे लोगो में जोश भरा जाता है या कहे एक लीडरशीप की झलक यहाँ देखने को मिली. इसका नतीजा यह निकला कि थानेदार के हस्तक्षेप से सुलह हुई और एस.डी.एम. पूरी बातें सुनने, कार्यवाही करने और गलती मानने को राजी हुई.

धरने के बाद से यहाँ राजनैतिक हलचल और थोड़ी बहुत झड़पों की खबरें भी आने लगी है. जहाँ-जहाँ कांग्रेस और भाजपा के सरपंच है वहाँ-वहाँ छुटपुट घटनायें हुई है. जैसे कांग्रेस और भाजपा के लोगों ने मिलकर, धरना के बाद वापस जा रहे एक पार्टी कार्यकर्ता को मारा. यह घटना इन्द्रप्रस्थ पी. व्ही. 39 की है. जिससे मारपीट की गई वह एक किराना दुकान चलाता है और उसकी पत्नी वार्ड पंच है. कल के धरने में वह अपनी पत्नी की तरफ से गया था और यहाँ चल रही भ्रष्टाचार के खिलाफ बोला था.

जब हम सुबह पी.व्ही. 39 गये और उस घटना स्थल की शूटिंग की जहाँ पोकलैंड से खुदाई हुई थी तब सरपंच भागा-भागा हमारे पीछे आया और घूरता हुआ वापस चला गया. उसके बाद हम फिर दूसरे रास्ते से वापस गये. इस बात का अन्दाजा था कि वे हमें घेर कर मारपीट करते और कैमरा छीनने और तोड़ने की कोशिश करते.

हफ्ते भर परलकोट में रहने के बाद वापस दुर्गकोंदल पहुंचे और फिर रास्ते में हमारा ध्यान रतनजोत और तेन्दूपत्ते पर गया और हमने देखा कि कैसे रतनजोत, तेन्दूपता को बर्बाद कर रहा है. आज कोड़ेकर्सी का बाजार है. सो बाजार की शूटिंग करने गये. कोड़ेकर्सी दुर्गकोन्दल से 16 कि.मी. है. लोग गोंड़ी के अलावा कुछ छत्तीसगढ़ी भी बोल रहे थे. गाँव से पहले एक नदी पड़ती है जिस पर पुल नही है. यह गाँव भी बरसात में कट जाता है. बाजार कुछ खास नही थी.  रास्तें में मृतक स्तम्भ की शूटिंग की. कोड़ेकर्सी, स्वतंत्रता सेनानी केन्दरू राम का गाँव है. लेकिन मैं इस बारे में कोई पूछताछ नही कर पाया इसलिये केन्दरू के बारे में कोई जानकारी नही है.

इसके बाद केवटी से भानुप्रतापपुर और फिर अंतागढ़ आये. यहाँ लोगों ने बतलाया कि एक अधिकारी पुरातत्व संपदा को अपने घर में जमा कर रहा है और कोई कुछ भी नही बोल सकता. यहाँ बहुत भ्रष्टाचार है और सभी विभाग जम कर लूट मचा रहे है.

मुझे याद है तीन-चार साल पहले मैं इसी रास्ते से नारायणपुर-अंतागढ़-भानुप्रतापपुर-दल्ली-डौंडी-रायपुर आया था. हम नारायणपुर का प्रसिद्ध मेला शूट करने गये थे. उस समय भी यह रास्ता बहुत सुनसान था और फोर्स की चौकियाँ बनी हुई थी. आज भी जब हम अंतागढ़ जा रहे थे फोर्स रास्तों पर थी. अभी सड़क निर्माण हो रहा है इस कारण से पूरे रास्ते के बरसों पुराने बड़े-बड़े बहुत से आम के पेड़ काट दिये गये.

अंतागढ़ में गंगा पोटाई से मुलाकात हुई. कांग्रेस से कई बार विधायक और सांसद रह चुकी है. अर्जुन सिंह की समर्थक है. बाद में अजीत जोगी ने मनोज मंड़ावी को टिकट दिया. 2004 के चुनाव में मंड़ावी हार गये. अभी यहाँ भाजपा से विधायक है.

अंतागढ़ नाम भी अब खौफ का पर्याय हो गया है. इतनी नक्सली और पुलिसिया घटनायें हो चुकी है और इतने बार अखबारों में यह नाम पढ़ा जा चुका है कि नाम सुनने पर ही दिमाग में सशस्त्रधारी लोगों का खौफ नजर आने लगते है. अंतागढ़, दंतेवाड़ा, भैरमगढ़, सुकमा, बीजापुर, अबूझमांड, गीदम, नारायणपुर, ओरछा आदि बस्तर के ये सब नाम अब किसी भयानक सपने की तरह हलचल मचाता है.

अंतागढ़ से वापस भानुप्रतापपुर आये. भानुप्रतापपुर के कचहरी में एक गाड़ी भरकर आदिवासी लाये गये थे, कहते है ये सभी नक्सली है. ये सभी लगभग 6 महिने से जेल में है और आज कचहरी  लाये गये  है. किस धारा और आरोप के तहत बन्द थे यह बताने में लोग हिचकते रहे लेकिन सभी के ऊपर नक्सली होने का आरोप जरूर था. उनसे मिलने उनके परिजन भी आये थे. किसी की पत्नी छोटे-छोटे बच्चों को लेकर पहुंची थी, किसी की माँ, तो किसी के पिताजी. सभी आदिवासी के हाथों में हथकड़ी थी और पीने के लिये पानी तक नही मिल रही थी. इतनी गर्मी में जानवरों की तरह बन्द थे उस लोहे के डब्बे में. लगभग 15 से ज्यादा आदिवासी तो थे ही उस डग्गे में. मैं इन आदिवासियों से बात करना चाहता था और शूटिंग भी लेकिन कचहरी परिसर में होने के कारण और वकीलों के भारी विरोध के चलते शूट नही कर पाया. चाह कर भी किसी से बात नही हो पाई. इनकी खबरें किसी भी समाचार पत्रों, चैनलों और इन्टरनेट पर भी नही आई.

तेजेन्द्र

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परलकोट में वामपंथ

Posted on November 10, 2008. Filed under: Hindi | Tags: , , , , , , , , , , , , |

शाम होने से पहले बड़गाँव मेला पहुंचे. यहाँ साल में एक बार तीन दिन का बड़ा मेला भरता है. आज अंतिम दिन था. प्रतापपुर में हुई नक्सलियों की जन सुनवाई की घटना के बाद से वहाँ बड़ी मात्रा में फोर्स की तैनाती थी. गर्मी और महंगाई का भी असर इस मेले पर हुआ है. जब हम पहुंचे तब तक वाकई में रौनक नहीं थी. मेला अपने अंतिम चरण में था. कुछ मात्रा में फोर्स अभी भी ड्रेस में और सादे ड्रेस में मौज़ूद थी. मेला के बचे खुचे होने पर फोर्स को शायद इस बात की निश्चिंतता थी कि अब अंतिम समय में किसी प्रकार की कोई नक्सली हिंसा नही होगी इसलिये वे बड़ी लापरवाही से मेले में घुमते दिखे. कुछ तो झूलना झूलते और कुछ पास ही चल रहे चौसर और जुआँ देखने में मगन थे. झूलना से ही थोड़ॆ दूर पर मुर्गा लड़ाई चल रही थी. वहाँ बड़ी भीड़ और शोर थी. बहुत सा मुर्गा और पैसा दांव पर लगा होता है. मुर्गा लड़ाई आदिवासियों का प्रिय खेल है. बड़े स्थानीय बाजार, मेले या उत्सव के समय यह इनके प्रिय शौक में से एक है. पूरे खेल में मुर्गों के पीछे हजारों तक की बोली होती है. इस खेल को खिलाने वाले और भीड़ को नियंत्रण करने के लिये दादा जैसे लोग होते है. इसके अपने नियम और कानून भी होते होंगे जो मुझे नही पता और यह भी नही पता कि पूरा खेल खासकर पैसों का, कैसे चलता है. खैर, रात होने से पहले ही हम वहाँ से निकल पड़े.

संजय पराते जी बतलाते है कि इन दस सालों में पूरे परलकोट में ऎसा कोई भी गाँव नही होगा जहाँ वे न गये हो और मीटिंग न ली हो. लोग अभी भी संजय जी के तेज तर्रार तेवरों को लोग भूले नही है और फिर से वापस आने का न्यौता देते रहते है. सी.पी.एम. के अलावा एस.वाई.आई और डी.वाई.एफ.आई. जैसे युवा मोर्चे भी है.

संजय पराते जी पखांजूर से अपनी पार्टी की ओर तीन बार विधानसभा चुनाव के लिए खड़े हो चुके है. पहली बार 1994 में, फिर 1999 में और फिर 2000 में. अलग राज्य बनने के बाद रायपुर आये और पार्टी के काम लग गये. पखांजूर से हटने के बाद मंतू राम पवार को पार्टी की ओर से टिकट दिया गया लेकिन वे कांग्रेस में चले गये जिससे पार्टी को बहुत नुकसान हुआ.

ऎसे बहुत से लोग जो संजय पराते जी के समय पार्टी में थे लेकिन वे अब या तो कांग्रेस में है या भाजपा में. खासकर ऎसे बहुत से लोग जो पंच-सरपंच-जनपद जैसे पदों में है. पद मिलने के बाद वे जमीनी लड़ाई लड़ने के बजाय पार्टी के कड़े सिद्धांत की वजह से घुटन महसूस करने के कारण पार्टी छोड़ देते है. कई बरस के मेहनत की बाद कैडर तैयार होता है और जब यही कैडर पद में आने पर पार्टी छोड़ देते है तो बड़ा नुकसान होता है.

संजय जी द्वारा पूर्व में किये गये मेहनत का असर दिखता है. उनके ही नेतृत्व में यहाँ पार्टी दूसरे या तीसरे क्रम पर रही है. कट्टर वामपंथी और बुजुर्ग लोग अब नये लोगो से उम्मीद खो चूके है. परलकोट के सी.पी.एम. के फाऊंडर में से एक है सुदेब अधिकारी है.  ये बांग्लादेशी नही है. बुजुर्ग वामपंथियों को शिकायत है कि किसी भी मीटिंग और आन्दोलन के बारे में खबर नही दी जाती और मशवरा भी नही लिया जाता. ये वही पुराने लोग है जिहोने संजय जी के भी आने से बहुत पहले से कई-कई कि.मी. साईकल पर गाँव-गाँव घूमकर पार्टी का प्रचार किया करते थे लेकिन अब उन्हे ज्यादा महत्व नही दिया जाता. पहले, मिटिंग या आन्दोलन होता था तब सभी लोगों को पोस्टकार्ड से सूचना मिल जाया करती थी लेकिन अब फोन के जमाने में भी लोग सम्पर्क नहीं रखते.

सी.पी.आई का चुनाव चिन्ह हंसिया और धान की बाली है और सी.पी.एम. हंसिया हथौड़ी और स्टार है लेकिन पूरे वामपंथी घटको का झंड़ा एक ही है हंसिया और हथौड़ा.

तेजेन्द्र

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आत्मविश्वासी सिरहा

Posted on November 10, 2008. Filed under: Hindi | Tags: , , , |

शहरी लोग जो दंतेवाड़ा, पखांजूर या नारायणपुर जैसे क्षेत्रों में नहीं रहते वे बहुत सी सुनी-सुनाई और छपी बातों पर विश्वास करते है और तरह-तरह के कयास लगाते रहते है. लेकिन बहुत से मामलों में सच्चाई कुछ अलग ही होती है. जहाँ लोग जाने की सोचते भी नही और हिम्मत तक नही करते वहाँ ताज्जुब होता है कि मिशनरी और बहुत सी संस्थायें काम कर रहे है. पखांजूर, बान्दे और बेठिया में लगभग पिछले 10-15 सालों से मिशनरी काम कर रहे है. मिशनरी कैसे, क्या और किस तरह से काम करते है मुझे नही पता लेकिन जिस ओर हम शहरी देखते और सोचते नही है वहाँ मिशनरी की महिलायें (नन) रहकर-जाकर काम कर रही है.

आज सुबह-सुबह महुआ बीनने की शूटिंग के लिये पास ही के जंगल गये. कुछ अच्छे दृश्य लेने के बाद पास ही एक गाँव की शूटिंग की. इस गाँव में तीन अच्छी चीजें मिली एक तो देवी पूजा और दूसरी धान रखने की बांस के कोठी और तीसरी शादी का मंडप. जब मैं एक घर के पास शूटिंग कर रहा था तभी कुछ आवाजें आई तो कैमरा चालू किये-किये वही चला आया. एक छोटे से तंग कमरे में एक व्यक्ति पूजा कर रहा था (झूप रहा था) और उसके आसपास तकरीबन 7-8 लोग बैठे हुये थे. इस परिवार ने कुछ बदा था लेकिन सिरहा के अनुसार आज देवता से बात नही हो पाई. आज वे नही आये. देवता से बात करने और नही करने की उनकी अपनी गणित है. बांस के एक पाईप में कुछ गेंहूँ के दाने रखे थे जिसे बिखराने पर सम की संख्या में आना चाहिये. गिनती में पहले दो की जोड़ी फिर चार की फिर आठ की, ऎसे करने पर यदि सम में आता है तब तो ठीक है नही तो ऎसा माना जाता है कि आज देवता बात करने नही आये. जिस दाने से गणना की जा रही थी वह बहुत पुराने दाने थे. इस बांस और दाने का प्रयोग उसके दादा भी करते थे. दानें बहुत पुराने लग रहे थे. गणना करने वाला व्यक्ति आत्मविश्वास से भरा था और बतला रहा कि उनके ईलाज और शहरी डॉक्टर के ईलाज में कोई अंतर नही है. हाँ, हम दोनों का तरिका जरूर अलग-अलग है. मैं मरीजों को जड़ी-बूटी से ठीक करता हूँ और गणना से पता भी लगाता हूँ.

सिरहा ने बलताया कि “यह बांस का है. इसमें गेहूँ के दाने रखते है इससे कीड़ा नही लगता. किसी को बुखार होता है तब इसी के माध्यम से बिमारी का पता लगाता हूँ. जोड़ी बनाकर देखता हूँ फिर डॉक्टर की तरह इलाज करता हूँ. किसी को भूत-प्रेत पकड़ा होगा तो इसी से पता करता हूँ. जोड़ी बनाते समय अगर सम में आता है तब तो भूत-प्रेत सही बोल रहा है और अगर विषम आया इसका मतलब भूत-प्रेत सामने नही आ रहा है. अन्दाजे से दाने निकालते है और मंत्र भी पड़ते है. जैसे डॉक्टर लोग इलाज करते है वैसे ही हम भी पूजा के द्वारा बिमारी का पता लगा कर इलाज करते है.

आज हम लोग कुछ पता लगाने के लिये यहाँ आये हुये है. आज हमको पता चला कि देवी दुर्गा आज नही आई क्योंकि आज इतवार है, कल सोमवार को आयेगी. आने से कुछ रोगी या बिमारी या बेईमान या दुश्मन का पता चलेगा. यह दाना लगभग 60 साल पुराना होगा. अभी तो इसमें कुछ कीड़े भी लग गये है. मैं झाड़-फूंक के अलावा जड़ी-बूटी से भी इलाज करता हूँ.”

फिर आगे एक और आदिवासी के घर गया तब मुझे उनके घर अच्छे से सजा एक नया और एक पुराना खम्भा मिला. वह शादी का मंडप था. नया खम्भा 2004 का था. सुन्दर नीले चटक रंग से रंगा था. घर गोंड आदिवासी का था. ये लोग ऎसा पिल्लर (खम्भा) सिर्फ लड़के की शादी में ही बनाते है. जो पुराना खम्भा था वह उस लड़के के पिताजी का था. तकरीबन 25-30 साल पुराना.

इन्ही के घर पर बांस से बनी एक सुन्दर सी धान की कोठी देखी.

तेजेन्द्र

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इधर के ना उधर के

Posted on November 7, 2008. Filed under: Hindi | Tags: , , |

पखांजूर में कुछ आदिवासी परिवार से मुलाकात हुई. उनमें से एक नौजवान ने बतलाया कि उसकी भतीजी कई दिनों से पुलिस हिरासत में और अभी बड़गाँव थाने में है.  वे महिने में कई बार उससे मिलने और छोड़ देने की गुहार लगाने आ चुके है. आज एस.डी.ओ.पी. के छुट्टी पर होने के कारण नहीं मिल पाये. उनके अनुसार एस.डी.ओ.पी. ने उन्हें लड़क़ी को छोड़ देने का आश्वासन दिया है. लड़की की उम्र 18-20 वर्ष है और अविवाहित है. वह तीन साल पहले नक्सलियों के साथ रही फिर माँ की देहांत की खबर सुनकर वापस गाँव आ गई तो फिर नक्सलीयों के पास वापस नही गई. नक्सलियों ने उन्हे साथ चलने को कई बार दबाव डाला लेकिन नही गई. इस तरह से दो साल तक वह गाँव में ही रही फिर एक रात पुलिस उसे पकड़ कर ले गई. तब से उसके घर वाले थाने का चक्कर लगा रहे है.

ये बारकोट के रहने वाले है. बारकोट, कोटरी नदी के उस पार पड़ता है और मांड क्षेत्र में आता है और साल में 7 महिने कटा रहता है और 5 महिने खुला रहता है. बारकोट से पखांजूर 26 कि.मी. के आस-पास होगा. ये लोग सुबह 4 बजे से बारकोट से 4 कि.मी. पैदल चलकर संगम आये फिर संगम से 22 किमी पखांजूर तक बस से आये है.

लड़के ने बतलाया कि– “वर्तमान में हमारे गाँव में अभी कोई नक्सली समस्या नही है. स्कूल में पढ़ाई चल रहा है, लेकिन अस्पताल नही है. हमारे गाँव में पिछले तीन-चार महिने से नक्सली आये नही है. पहले बहुत दिक्क्त थी. वे मिटिंग में जाने के लिये दबाव डालते थे और उधर पुलिस मिटिंग में जाने वाले को परेशान करते थे. अभी हम लोग पखांजूर आये है. मेरी भतीजी को पुलिस पकड़ कर ले गई है, नक्सलियों के साथ रही ऎसा कह कर. उसी के लिये हम आये है.

बरसात के समय में आने जाने में बहुत दिक्क्त होता है. हम लोग खेती-किसानी करते है और गाँव में कोई भी राशन दुकान नही है. राशन के लिये संगम तक आना पड़ता है. हमारे गाँव बारकोट से संगम 4 किमी दूर है और बरसात के समय नाव से आना-जाना  पड़ता है और अभी पैदल ही आना-जाना होता है.

– तुम्हारे गाँव में नक्सलियों के आने से ठीक है?
— नही. ठीक नही है, साथ में चलो-चलो करते है लेकिन गाँव वाले उनका साथ नही दे रहे है. इसलिए अभी तीन महीने से आ भी नही रहे है. हमें साथ में कैम्प में जाने के लिए कहते है. लेकिन हम लोग मना कर देते है.

– क्या करते थे?
— मिटिंग में आने के लिये कहते थे और नही आने पर मारने की धमकी देते थे.

– कितने लोग आते थे?
— 15 से 20 तक

– क्या कभी मारपीट भी किये है?
— मारपीट तो किये है नक्सली लोग.

– क्यो करते थे, किसलिए करते थे?
— हम लोग इधर आते थे इसलिये. वे कहते थे कि तुम लोग गाँव से बाहर जाते हो और मुखबिरी करते हो करके हमें मारते थे. हमारे इस साथी को भी मारा है. एक बार ये बोरिंग का पानी पी रहा था तो “सरकार का पानी” पीते हो कहकर मारे. सरकार का पानी पीना बन्द करो कहते थे. कहते थे कि नदी और कुआं का पानी पीयो. अभी गाँव का कोई भी उनका साथ नही देता इसलिये नही आते.

– सबसे पहले कब आये थे नक्सली आपके गाँव में?
— उन्हे हमारे गाँव में आये 25 साल से भी ज्यादा हो गया. जब वे आये तब हम छोटे-छोटे बच्चे थे.”

तेजेन्द्र

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गोंड़ और बंगाली

Posted on November 6, 2008. Filed under: Hindi | Tags: , , , , , , |

रोजगार गारंटी के बारे में जमीनी स्तर पर जानने-समझने का यह अच्छा अवसर था. कुछ ही दिनों पहले कांकेर में करोड़ों के घोटाले का पता चला और उजागर होने पर कलेक्टर को हटाना पड़ा. इसी सिलसिले में संजय पराते जी गांव-गांव में बैठकें ले रहें है. गांव के लोगों को रोजगार गारंटी की कोई साफ-साफ जानकारी नही है. यहाँ अधिकारी और पंचायत के लोग मिलकर लाखों रूपये का भ्रष्टाचार कर रहे है. जो बातें समझ में और सामने आई वे सभी चौकानें वाली थी और यह भी समझ में आई कि कैसे कोई योजना, भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है. निर्मल ग्राम, रोजगार गारंटी आदि योजनाओं की जमीनी हकीकतें मालूम हुई.

परलकोट क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से बंगाली परिवारों के हाथ में है. लगभग सभी के पास अच्छी खेती या हर प्रकार का व्यवसाय और संसाधन है. यहाँ तक की मुर्गा लड़ाई भी. पखांजूर, बड़गाव, बान्दे और कापसी जैसे कस्बे और शहर पूरी तरह से बंगालियों के हाथ में है.

इसीलिये, कहीं न कहीं स्थानीय आदिवासियों और बंगाली परिवारों में तनाव तो है और मुझे तो ऎसा लगता है कि आने वाले समय में यह दूरी और बढ़ेगी. इसकी बहुत सी वजहें हैं जैसे कि यहाँ की अर्थव्यव्स्था का बंगालियों के हाथ में होना, बंगाली परिवारों का हर क्षेत्र में घुसपैठ, अधिकारियों और नेताओ के साथ मेल-जोल-तालमेल, अधिक सुविधासम्पन्न होना, खेती-किसानी में भी बंगाली परिवारों का आधिपत्य होना, वन जमीन पर भी कब्जा होना, सरकारी सुविधाओं में भी बंगालियों को प्राथमिकता जैसे उदाहरण है जिससे आदिवासी अपने को ठगे से महसूस कर रहे है जिससे गोंड़ और बंगाली परिवारों में दूरी बढ़ती जा रही है.

यहाँ एक बात और देखने को मिलती है. वह है गैर आदिवासियों का आदिवासी से शादी. ज्यादातर लड़के गैर आदिवासी होते है और लड़की आदिवासी. इस सम्बन्धों के बहुतायत अर्थ है और पूरा मामला जमीन का होता है या किसी जगह में अपने पैर फैलाने का. आदिवासी की जमीन को तो कोई नही खरीद सकता लेकिन इस तरह से लोग आदिवासी जमीन पर कब्जा बनाये हुये है.

रंगपंचमी (होली) के बाद से महुआ बीनने का काम शुरू होता है. अब महुआ का मौसम खत्म होने को है. चार बीनने भी काम अब लगभग खत्म होने को है. अभी भी दुर्गम स्थानों में रहने वाले आदिवासी चिरौंजी के बदले नमक का सौदा करते है लेकिन अब कम होता है और इसी चिरौंजी का दाम बाजार में शायद 400 रूपये किलो से भी ज्यादा में बिकता हो. स्थानीय व्यापारी इन आदिवासियों से कुछ रूपये देकर चिरौंजी खरीद लेते है और बड़े व्यापारियों को ऊंचे दामों में बेच देते है.

चार का बीज या फल कच्चा होने पर रंग हरा और खट्टापन लिये होता है और पकने के बाद रंग काला और मीठा होता है. इसके फल को खाने के बाद जो गुठली बचती है उसे फोड़ने से चिरौंजी मिलती है बिल्कुल बेर की तरह लेकिन छोटा.

इस बार पूरे बस्तर में आम की पैदावारी लगभग नही हुई है और उत्तर छत्तीसगढ़ की तरह यहाँ कटहल के पेड़ भी बहुत है.
तेजेन्द्र

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