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छत्तीसगढ़ में प्राप्त पांडुलिपियाँ

Posted on December 8, 2007. Filed under: About Chhattisgarh |

छत्तीसगढ़ में प्राप्त पांडुलिपियाँ
विभिन्न अखबारों से प्राप्त

जनसत्ता गरियाबन्द, 02-06-07

अनुविभाग मुख्यालय से 30 कि.मी. दूर ग्राम गोडलबाय निवासी बोधसिंह दीवान (80) के यहाँ से 300 वर्ष पुरानी पांडुलिपियाँ उड़िया भाषा मे हस्तलिखित तालपत्र 38 पृष्ठीय ज्योतिष रोग-ब्याधि सम्बन्धी विवरण और 70 पृष्टीय तालपत्र (कलंकी पुराण) उपलब्ध है. इसी तरह ग्राम पतोरा दादर से परमेश्वर सिंह नेताम के यहाँ से 100 पृष्ठीय तालपत्र (झाड़-फूकमंत्र) और 50 पृष्ठीय तालपत्र ज्योतिष लग्न सम्बन्धी मिला. ग्राम घटौद में पूर्व सरपंच बलीराम कोमर्रा के घर से 61 पृष्ठीय तालपत्र ज्योतिष शुभ-अशुभ विचार सम्बन्धी उपलब्ध है. ग्राम मोहन्दा में रामसिंह मरकाम के यहाँ 211 पृष्ठीय तालपत्र उड़िया भागवत पुराण मिला है. जिसमें भक्त और भगवान की कथा का वर्णन है. इसी ग्राम मोहन्दा में उपसिंह दिवान के यहाँ सात प्राचीन पांडुलिपियाँ कुल 264 पृष्ठीय तालपत्र उड़िया भाषिय तालपत्र संग्रहित है.

लोगो को उड़िया भाषा का ज्ञान नही होने के कारण वे इनमें छिपी हुई विद्याओं के लाभ से वन्चित है.
सर्वेक्षण दल के सदस्य भगवान सिंह कोर्राम, उच्चश्रेणी शिक्षक सढ़ौली, भागसिंग अग्रवाल को चबाय और परमेश्वर लाल सिन्हा शिक्षक घुटकू नवापारा के अथक प्रयास से सफल हुआ है.

छत्तीसगढ़ , रायगढ़, 03-06-07
रमल विद्या के बारे में कोई इसे अरब का होना मानता है और कोई इसे महाभारत कालीन द्युतक्रीड़ा (पासा) से जोड़ते हुये महाभारत के प्रसिद्ध पात्र शकुनि मामा को रमल विद्या के विशेषज्ञ मानते है.
राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के खोजी दल ने 200 वर्ष पुरानी रमल विद्या पर आधारित ताड़पत्र में हस्तलिखित ग्रंथ की खोज की है जिसमें 3 इंच लम्बी और 10 सेंटीमीटर लम्बी चौकोर गुटखा जिसे पासा कहते है प्राप्त हुई है.

जिले मे कांसा, पीतल के बर्तन बनाने के लिए मशहूर शिल्प नगरी पुसौर में उक्त रमल विद्या ग्रंथ प्राप्त हुई है. समन्वयक शिव राजपूत के यह पहली घटना है कि रमल विद्या प्राप्त हुई है. यह सुर्यदास महाणा के घर सुरक्षित है. लोहे की कलम से तालपत्रों पर उकेरे गये है. ऎसे ही 24 और भी पांड़ुलिपि प्राप्त हुई है. रमल विद्या सहित श्री महाणा के यहाँ से 6 नग छोटी-बड़ी पांडुलिपियाँ मिली है. जिसमें 55 पृष्ठ में बेलपत्र से औषधि सम्बन्धित पांडुलिपि भी प्रमुख है. गांव के पंडित विजयशंकर सतपथी के यहां तालपत्र में लिखे 12 ग्रंथ प्राप्त हुए है जिसमें महाभारत, हरिवंश पुराण, जरासन्ध वध और पंचम खंड महाभारत भी शमिल है.

किशोरचन्द महाणा के यहां 5 पांडुलिपियाँ मिली है जिसमें 12 स्कन्ध भागवत पुराण शामिल है. वही प्राप्त पान्डुलिपियों में प्रेम पंचामृत, विदर्भ चिंतामणी, वैदेही विलाप जैसे ग्रंथ प्राप्त हुये है.

गांव के सुप्रसिद्ध पुराने वैद्य स्वर्गीय श्री सोमनाथ षड़ंगी के वंशज चमरू षड़ंगी ने एक आयुर्वेदिक ग्रंथ सहित तीन नग पांडुलिपियों का प्रलेखन कराया वही अचिन्हित पांडुलिपियों में लोककला से सम्बन्धित होने की सम्भावना पाठकों द्वारा व्यक्त की गई. चमरू षड़ंगी के पिता स्व. श्री बिहारीलाल षड़ंगी लोककला के मर्मज्ञ थे. श्री वच्छ षड़ंगी ने सर्वेक्षण दल को मंगला स्तुति, ज्योतिष शास्त्र एवं अघोर विद्या पर आधारित ग्रंथो का अवलोकन कराया.

छत्तीसगढ़, रायगढ्, 25-05-07
राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के समन्वय शिव राजपूत ने बतलाया कि इस सामाजिक दौर में प्राचीन दुर्लभ पांडुलिपियाँ ज्यादतर उन घरों में पाई गई जहां संयुक्त रूप से सांस्कारिक लोग निवास करते है वहीं सरायपाली, लोईंग, पड़िगांव, सरिया, सांकरा जैसे कई मायनों में ऎतिहासिक ग्रामों में बड़ी संख्या में ताड़पत्रों पर उकेरी गई सचित्र एवं लिपिबद्ध प्राचीन ग्रंथ हरिवंश पुराण, महाभारत, कृष्ण लीला, कर्मकांड सम्बन्धी तथा प्राचीन चिकित्सा पद्धति जिसमें आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी के अलावा तंत्रोक्त चिकित्सा पद्धति शामिल है.

धरमजयगढ़ क्षेत्र से प्रोफेसर सत्येन्द्र मालिया की टीम द्वारा 85 पांडुलिपियों का अंकेक्षण किया. जिसमें ग्राम टिनीमिनी के कीर्तिचन्द सतपथी के यहां 11, पड़िगांव के फकीरचन्द के यहां 1, दैतारी मेहर के यहां 1, पालेश्वर प्रधान मचीदा के यहां 4, कान्हूचरण प्रधान, सुकुल भठली से 1, सुकमुनि धोबा, मचीदा के यहां से 4, बोधराम बाधाडोला के यहां 2, रामसुबरन डनसेना दाऊ भठली के यहाँ 4 पांडुलिपियाँ प्राप्त हुई है.

यहाँ से प्राप्त पांड़ुलिपियों में गौ-चिकित्सा, बंगला भाषा का साहित्य प्रमुख है. जबकि सरिया का ब्रम्हाण्ड सम्बन्धी जानकारी, दशावतार आदि पांडुलिपि सांकरा में उड़िया भाषा का शब्दकोश, तंत्रोक्त गाराड़ी मंत्र, कृष्ण लीला प्राप्त हुये है. वही ग्राम सरिया में ज्योतिष कर्मकांड से सम्बन्धित दुर्लभ ग्रंथ भी प्राप्त हुये है. ग्राम लोईंग से जगन्नाथ मन्दिर से श्रीमद् भागवत, आयुर्वेद, भविष्य पुराण, बैचन्द्र गीता, नरसिंह पुराण, लक्ष्मी पुराण जैसे ग्रंथ पाये गये. पांडुलिपि मिशन के प्रभारी अधिकारी एस. के. देवांगन के मुताबिक अब तक 200 पांडुलिपियों का प्रलेखन किया गया.

देशबन्धु, महासमुन्द, 29-05-07

पांडुलिपि सर्वेक्षण के दौरान जिले में 800 पांडुलिपियाँ प्राप्त हुई है. पूरे जिले में 11 से 15 मई तक 50 सर्वेक्षणों का सर्वेक्षण का यह अभियान संचालित हुआ. जिले में प्राप्त 800 पांडुलिपियों में से सर्वाधिक 312 पांडुलिपियाँ पिथौरा से, 236 सरायपाली से, 57 बसना से, 171 बागबहरा से, 24 महासमुन्द से प्राप्त होने की जानकारी है. अधिकांश उड़िया भाषा के है और कुछ देवनागरी और संस्कृत में भी है. इन पांडुलिपियों में कबीर पंथ, तंत्र-मंत्र, हवन, पानी मंत्र, औषधीय मंत्र, रामलीला, कृष्ण लीला, वैद्य चिकित्सा, गौरवगढ़ का इतिहास, वनौषधिक, सर्प चिकित्सा, इन्द्रजाल आदि विषय पर सामाग्री अंकित है.

पिथौरा क्षेत्र के सर्वेक्षक एफ. नन्द ने उस समय लिखने में उपयोग में आने वाली लेखनी का भी पता लगाया. लोहे से बना यह लेखनी उन्हे जगदीशपुर से प्राप्त हुआ. पूरी जानकारी संस्कृति विभाग को दे दी गई.

छत्तीसगढ़ रायगढ़, 07-05-07
सैकड़ो सदियों पुराने ताम्रपत्र, तालपत्र आदि में लिखित ऎसे प्राचीन ग्रंथ चाहे वह मानव-चिकित्सा से सम्बन्धित हो, पशु-चिकित्सा से सम्बन्धित, ज्योतिष एवं अन्य जन-जीवन से जुड़ी ज्ञान-वर्धक ग्रंथ राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के तहत चल रहे प्रलेखन कार्य में रायगढ़ जिले में अब तक कई दुर्लभ ग्रंथ पाये गये है. रायगढ़ रियासत के राज वैद्य स्व. श्री गाड़ाराय के यहां से दुर्लभ लोक चिकित्सा के ग्रंथ और धनीराम मालाकार तराईमाल से लेखनी प्राप्त हुआ है. वहीं चमार सिंह मालाकार ने ताड़पत्र में सुन्दर आकृतियों से सचित्र सुमुर्ति तालपत्र के लघु ग्रंथ मिले है. देखना यह है कि उपरोक्त पांडु लिपियों में संग्रहित प्राचीनतम् ग्रंथ ज्ञान का प्रलेखन के अलावा शोध एवं अध्ययन कार्य कैसे होगा.

तिऊरपारा, रायगढ़ के स्व. श्री गाड़ाराय के पुराने लकड़ी के पेटी से 13 नग पांडुलिपि, पशु के सिंग से बने डिब्बियों में दवाईयाँ आदि सामाग्री प्राप्त हुई है. प्राप्त पांडुलिपियों में विभिन्न धार्मिक ग्रंथो सहित विशेषत: जड़ी-बुटी से इलाज सम्बन्धित ग्रंथ उल्लेखनीय है. परिजनों ने बतलाया कि वैद्यराज मिर्गी और लकवा के शर्तिया इलाज करते थे. नन्दकिशोर बेहरा जो इस परिवार के दमाद है माता सेवा करने (चिकन पॉक्स) का ईलाज झाड़-फूंक सहित पारम्परिक दवाईयों से आज भी नि:शुल्क करते है. समुचा परिवार मछली बेचने का व्यवसाय करते है.

ग्राम-तराईमाल विकास खण्ड तमनार में स्व. श्री मंगलू मालाकार के वंशज धनीराम मालाकार के यहां तीन इंच लम्बी, एक इंच चौड़ी 56 पृष्टीय दो पांडुलिपियाँ मिली जिसमें एक गायन शैली सीखने का प्रायमरी ग्रंथ ‘रहस’ एवं दुसरी जड़ी-बूटी की जानकारी वाली पांडुलिपि मिली. चमार सिंह मालाकार ने 200 वर्ष पुरानी पूर्वजों द्वारा संग्रहित 10 दुर्लभ पांडुलिपियों के दर्शन कराये. जिसमें अंक ज्योतिष विद्या सहित सचित्र सुमुर्ति ग्रंथ जिसमें लिखित सामग्री के अलावा पशु-पक्षियों का सुन्दर चित्रण है. 50 पृष्टीय उक्त छोटे तालपत्र में प्राप्त सचित्र पांडुलिपि में जीव-जंतु, वृक्ष, मानव, देवी-देवता, मन्दिर, भवन आदि का चित्रण किया गया है. वहीं विभिन्न प्रकार के पत्तों को दवा के रूप में इस्तेमाल करने सम्बन्धी सांकेतिक औषधीय ग्रंथ प्राप्त हुआ है.

छत्तीसगढ़, रायगढ़, 20-04-07पं. लोचन प्रसाद पांडेय परिवार से 1300 वर्ष प्राचीन ताम्रफलक मिले. वही छत्तीसगढ़ के गौरवशाली इतिहास को इंगित करते अनेक दस्तावेज, सिक्के एवं महापुरूषों के पत्र आदि भी प्राप्त हुये है. ताम्रफलक देवनागरी लिपि में लिखे गये है.

पन्डित पांडेय को भारतीय हिन्दी साहित्य में छायावाद का प्रवर्तक माना जाता है. भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल, रविन्द्र नाथ टैगोर, ऎनी विसेंट आदि के पत्र, छत्तीसगढ़ी व्याकरण का अंग्रेजी में अनुवाद, तालपत्र एवं ताम्रपत्र में प्रमाणित अभिलेख आदि भी मिले है. ऎनी बिसेंट और रविन्द्रनाथ टैगोर के पत्रों के साथ तीसरी शताब्दी के स्त्री एवं पुरूषों की पाषाण कलाकृतियां, गुप्तकालीन मृदुभाण्ड, हैहयवंशीय व कुषाण कालीन सिक्के भी मिले है.

मिले ताम्रपत्र: रायपुर से प्राप्त ताम्रफलक लेख 821 चे.दी-सम्वत-1000 ई. का मिला है जिसमें महाकौशल के राजा पृथ्वीदेव प्रथम की जानकारी है.

सरखो ग्राम से मिले दो ताम्रपत्र चे.दी-सम्वत-1128 ई. के है. इस फलक में महाकौशल के तात्कालीन महाराज रत्नदेव द्वितीय के राजकाज की जानकारी है. लिंजिर ग्राम से मिला ताम्रपत्र सर्वाधिक प्राचीन है जिसका काल निर्धारित ई.स. 700 है. इसमें तत्कालीन महाराज महाभव गुप्त राजदेव जो त्रिलिंगाधिपति के नाम से भी जाने जाते थे, का उल्लेख है. इस ताम्रपत्र के साथ एक उनकी एक मुद्रा व छड़ी भी मिली है.

छत्तीसगढ़ में करोड़ो वर्ष पुराने शैलचित्र
छत्तीसगढ़ राज्य पुरातत्व तथा सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत सम्पन्न राज्य है. छत्तीसगढ़ राज्य चित्रित शिलाश्रयों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है. इन चित्रों के अध्ययन से प्रागैतिहासिक काल के आदि मानवों की जीवन शैली, उस काल के पर्यावरण तथा प्रकृति की जानकारी प्राप्त होती है. यहाँ मध्याश्मीय काल से लेकर ऎतिहासिक काल तक के शैलचित्र प्राप्त होते है. छत्तीसगढ़ राज्य में सर्वप्रथम चित्रित शैलाश्रयों की खोज सन् 1910 मे एंडरसन द्वारा की गई. इंडिया पेंटिंग्स 1918 में तथा इन्साइक्लोपिडिया ब्रिटैनिका के 13वें अंक में रायगढ़ जिले के सिंघनपुर शैलचित्रो का प्रकाशन किया गया, तत्पश्चात श्री अमरनाथ दत्त ने 1923 से 1927 के मध्य रायगढ़ तथा समीपस्थ क्षेत्रों में शैल चित्रो का सर्वेक्षण किया. डॉ ऎन. घोष, डी. एच. गार्डन द्वारा इस सम्बन्ध में महत्वपुर्ण जानकारी दी गई. तत्पश्चात स्व. पंडित श्री लोचनप्रसाद पांडेय द्वारा भी शैलचित्रो के सम्बन्ध में महत्वपुर्ण जानकारी उपलब्ध करायी गई.

रायगढ़, बस्तर, कांकेर, दुर्ग, कोरिया आदि जिलों के विभिन्न क्षेत्रों मे स्थित शिलाश्रय आदि मानव की कथायें सुनाती है. रायगढ़ जिले की सिंघनपुर गुफा और कबरा पहाड़ के अलावा जिले के टिमरलगा, चोरमाड़ा, गाताडीह, सिरोली डोंगरी, कर्मागढ़, ओंगना, पोटिया, बसनाझर और बोतल्दा में करोड़ों वर्ष पुराने शैलचित्र प्राप्त हुये है। आदिमानवों द्वारा उकेरे गये इन शैलचित्रों के आधार पर तत्कालीन रहन-सहन, पशु और संस्कृति के साथ-साथ प्राकृतिक अवस्था का भी पता चलता है। कुछ एक शैलचित्रों में शुतुरमुर्ग, डायनासोर और जिराफ से मिलते-जुलते जानवरों को उकेरा गया है, जो इस क्षेत्र में करोड़ों वर्ष पूर्व इनकी मौजूदगी की ओर संकेत करता है। साथ ही प्राकृतिक कारणों से आये बदलाव को भी ये शैलचित्र रेखांकित करते है।

रायगढ़ के कई स्थानों पर 90 करोड़ वर्ष पुराने शैलचित्र मिले है। इनमें हिरण, वन भैंसा, मछली, सांप, हाथी जैसे पशुओं के अलावा कुछ नये शैल चित्र भी मिले है जो गोंडवाना शैली के है। शैलचित्रों के निर्माण काल का पता लगाने के लिए दो तरह की विधियां प्रचलन में है। इनमें से एब्स्ल्यू विधि से डेटिंग पूरे देश में एक मात्र भुवनेश्वर में है। रायगढ़ से लगभग 35 किलो मीटर दूर खरसिया विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सोनबरसा गांव के पास लहंगा पहाड़ और छेरीगोदरी में मिले शैल चित्र सबसे अधिक 425 मीटर ऊंचाई पर है।

छत्तीसगढ़ में 32 ऐसे स्थान हैं जहां शैल चित्र खोजे गये है इनमें सबसे ज्यादा रायगढ़ जिले में है। इन शैलचित्रों में प्रदर्शित कुछ अलंकरण आज भी आदिवासी कलाओं में जीवित है।

अन्य देशों के मुकाबले में हमारे देश में इन शैलचित्रों के प्रति जागरूकता का अभाव होने के कारण ये भी नष्ट हो रहे है। कुछ स्थानों पर शैलचित्रों के आसपास लोग अपने नाम आदि भी लिख देते है जिससे इन शैलचित्रों पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है। ये शैलचित्र हमारे देश के ही नहीं पूरी सभ्यता के लिए धरोहर है। कई स्थानों पर यह भी देखा गया है कि शैलचित्रों को देखने आने वाले लोग ऐसे स्थलों को पिकनिक स्पाट के रूप में उपयोग करने लगते है। इन स्थानों पर ही चूल्हे जलाकर खाना पकाना शुरू कर देते है जिससे धुएं का असर इन शैलचित्रों पर पड़ रहा है।

शैलचित्र दरअसल आदिमानवों के अभिव्यक्ति का प्रमाण है। आदिमानवों के पास भाषा नहीं थी इसलिए वे कंदराओं को ब्लैकबोर्ड की तरह अपने विचारों की अभिव्यक्ति के रूप में उपयोग करते थे। शैलाश्रयों के बारे में अधिकाधिक जानकारी जुटा कर उन्हें लिपिबद्ध किया जाना और आने वाली पीढ़ी को शैलचित्रों और उनके संरक्षण के बारे में जागरूक किया जाना अत्यंत जरूरी है।

प्रमुख चिन्हित शिलचित्र स्थल है:
1. सिंघनपुर: रायगढ़-बिलासपुर रोड पर रायगढ़ से पश्चिम में 20 कि..मी. की दूरी पर यह शैलाश्रय स्थित है. सिंघनपुर शैलाश्रय प्राचीनतम शैलाश्रय में से एक है. यहाँ के चित्र लगभग धुन्धले हो चुके है. इसमें सीढ़ीनुमा पुरूषाकृति, मतस्यकन्या (मरमेड), पशु आकृतियाँ, शिकार दृश्य आदि का अंकन है.

2. कबरा पहाड़: रायगढ़ जिला मुख्यालय से 8 कि.मी. पुर्व मे स्थित कबरा पहाड़ के चित्र गैरिक रंग के है. ये चित्र अन्य स्थानो से ज्यादा व उत्तम प्रकार के है. यहाँ जंगली भैसा, कछुआ, पुरूषाकृति, ज्यामितिक अलंकरण का अलंकरण का अंकन पूरक शैली में है.

3. बसनाझर: सिंघनपुर से दक्षिण-पश्चिम मे लगभग 17 कि.मी. पर दूर ग्राम बसनाझर स्थित है. इस ग्राम के समीप के पहाड़ी श्रृंखला में लगभग 300 से अधिक शैलचित्र अंकित किये गये है. इसमें हाथी, गेंडा, जंगली भैसा, आखेट दृश्य, ज्यामितिय अलंकरण, नृत्य दृश्य आदि है. यहाँ हाथियों का भी सुन्दर अंकन है.

4. ओंगना: रायगढ़ से 72 कि.मी. दूर उत्तर की ओर धर्मजयगढ के निकट ओंगना ग्राम के पास बानी पहाड़ पर स्थित शैलाश्रय में 100 से अधिक चित्र बने है. यहाँ के शिलचित्रों के ऊपर आक्षेपित स्तर दिखाई पड़ता है. यहाँ बड़े-बड़े ककूदवाले बैल, उनका समुह, मानवाकृतियों के सिर पर विशेष प्रकार की सज्जा, नृत्य दृश्य आदि का अंकन है.

5. कर्मागढ़: रायगढ़ से 30 कि.मी. दूर कर्मागढ़ शैलाश्रय में 325 से अधिक चित्र अंकित है. यहाँ ज्यामितिय अलंकरण व बहुरंगी आकृतियों का अंकन है.

6. खैरपुर: रायगढ़ से 12 कि.मी. के दूरी पर उत्तर की ओर टीलाखोल जलाशय के निकट पहाड़ी में नृत्य-दृश्य तथा पशु-पक्षीयों का अंकन है. यह दृश्य ऎतिहासिक काल के है.

7. बोतलदा: बिलासपुर-रायगढ़ मार्ग पर खरसीया से 8 कि.मी. पश्चिम में बोतलदा ग्राम है इस ग्राम के उत्तर में लम्बी पहाड़ी श्रृंखला पर 2000 फीट की ऊंचाई पर सिंहगुफा स्थित है. यहाँ के चित्र मध्याश्म काल से लेकर ऎतिहासिक काल तक के है. इसमें पशु, शिकार दृश्य, ज्यामितिय अलंकरण आदि है.

8. भंवरखोल: बिलासपुर से रायगढ़ मार्ग पर खरसिया से 12 कि.मी. दूर सूतीघाट पर पतरापाली ग्राम के मध्य उत्तर मे स्थित पहाड़ी श्रृंखला में चित्रित शैलाश्रय है जो भंवरखोल के नाम से प्रसिद्ध है. यहाँ के शैलचित्र सफेद, गैरिक व अन्य रंगों से बने होते है. यहाँ मतस्यकन्या, जंगली भैसा, भालू, शिकार दृश्य, ज्यामितिक अलंकरण, स्वास्तिक, हथेली आदि का अंकन है.

9. अमरगुफा: खरसिया से 2 कि.मी. दूर मुख्य मार्ग से दक्षिण मे 11 कि.मी. दूर सोनबरसा नामक ग्राम के पुर्व में स्थित पहाड़ी अमरगुफा के नाम से विख्यात है. यहाँ पशु आकृतियां, मानवाकृतियाँ, आखेट दृश्य आदि का अंकन है.

10. सूतीघाट: बिलासपुर-रायगढ़ मार्ग पर पतरापाली ग्राम के समीप सूतीघाट मे चित्रित शैलाश्रय है. इसमें कृषि दृश्य तथा हाथ मे हल लिये किसान दर्शाया गया है. इसके पशु आकृतियों का भी अंकन है.

11. गाताडीह: सारंगढ़ के समीप स्थित गाताडीह में भी चित्रित शैलाश्रय है. इनमें पशुआकृतियाँ, शिकार दृश्य, मानवाकृतियो का अंकन है.

12. सिरौलीडोंगरी: सारंगढ़ नगर से उत्तर-पश्चिम मे 5 कि.मी. स्थित सिरोली-डोंगरी के शैलाश्रय मे भी शैलचित्र पाये जाते है. इनमें मानवाकृतियाँ, शिकार दृश्य व पशुओ का अंकन है. ये चित्र गैरिक रंग के है.

13. बैनीपाट: रायगढ़ से 32 कि.मी. की दूरी पर भैंसगढ़ी के बांस के जंगलों में यह शैलाश्रय स्थित है. यहाँ के अधिकांश चित्र धुन्धले हो चुके है. इन चित्रो में ज्यामितिक अलंकरण बहुतायत में है.

14. उड़कुड़ा: चारामा तहसील के ग्राम उड़कुड़ा में मेगालिथिक अवशेष तथा लघु अश्मोपकरण के साथ शैलचित्र भी प्राप्त होते है. यहाँ तीन स्थानों पर चित्रित शैलाश्रय है. जोगीबाबा का स्थान, चन्दा परखा व कचहरी से ज्ञात शैलचित्रों में हथेली, पैरों के चिन्ह, पशुओं का अंकन व धनुर्धारी प्रमुख है.
15. गारागौड़ी: चारामा से कांकेर जाने वाले मार्ग पर चारामा से 9 कि.मी. दक्षिण में कानापोड़ से पश्चिम में 12 कि.मी. दूर स्थित ग्राम गारागौड़ी के समीप पहाड़ी श्रृंखला में शीतलामाता नामक स्थान पर शैलचित्रों का अंकन है. यहाँ के अधिकांश चित्र धुन्धले हो चुके है. इनमें पशु आकृतियों का अस्पष्ट अंकन दिखाई देता है.

16. खैरखेड़ा: चारामा से कांकेर जाने वाले मार्ग पर चारामा से दक्षिण मे कानापोड़ से पश्चिम मे 5 कि.मी. दूर स्थित खैरखेड़ा ग्राम से दक्षिण मे स्थित पहाड़ी श्रृंखला मे चित्रित शैलाश्रय है. जिसे बालेरा के नाम से जानते है. यहाँ के शैल चित्रो में पशु आकृतियाँ, मानवाकृतियाँ, धनुर्धर तथा हथेली का अंकन है.

17. कुलगाँव: कांकेर से 12 कि.मी. दूर स्थित कुलगाँव की पहाड़ी श्रृंखला मे चित्रित शैलाश्रय
स्थित है. यहाँ पशुओं का अंकन है.

18. कान्हागाँव: कांकेर से पश्चिम में देवरी मार्ग पर 20 कि.मी. की दूरी पर पीढ़ापाल के समीप चित्रित शैलाश्रय है. यहाँ मानवाकृतियाँ व पशुओं के चित्र अंकित है.

19. गोटीटोला: चारामा-कांकेर मार्ग पर लखनपुरी ग्राम से 9 कि.मी. दूर स्थित गोटीटोला ग्राम के मधुबनपारा के 3 कि.मी. दूर दक्षिण-पश्चिम मे सीतारामगुड़ा स्थान पर पौराणिक चित्रों का अंकन है. यहाँ पर रामकथा से सम्बन्धित चित्रो का भी अंकन है. इसके ऊपर आखेट दृश्यों का अंकन है.

20. घोड़सार: सोनहत क्षेत्र में बदरा की पहाड़ियों में चित्रित शैलाश्रय घोड़ासार नाम से जाने जाते है, इनमें पशुआकृतियाँ, मानवाकृतियाँ, दैनंदिनी जीवन के कुछ दृश्य मुख्यत: सफेद रंग से चित्रित किये गये है.
21. कोहबउर: जनकपुर क्षेत्र में मुंगेरगढ़ की पहाड़ी पर कोहबउर चित्रित शैलाश्रय स्थित है. यहाँ विभिन्न रंगों से ज्यामितिय आकृतियाँ, मानवाकृतियाँ और आखेट दृश्यों का चित्रण अंकित है.

22. चितवाडोंगरी: यह दल्ली-राजहरा मार्ग पर डौंडीलोहारा तहसील के ग्राम सहगाँव के पास स्थित है. कहा जाता है कि यहाँ चीता काफी तादाद में पाया जाता था. यहाँ के अधिकांश शैलचित्र लाल गेरू रंग से बने हुये है. यहाँ के चित्रों मे मुख्य रूप से एक चीनी नस्ल की मानवाकृति जो कि खच्चर के ऊपर दिखाई पड़ती है उल्लेखनीय है. इसके साथ ही एक ड्रेगन के समान आकृति दिखाई पड़ती है. यहाँ के शैलचित्रों में कृषि जीवन से सम्बन्धित चित्र मुख्य रूप से दिखाई देते है. एक हिस्से में बैलगाड़ी स्पष्ट नजर आती है लेकिन उसमें बैल की जगह खाली है. सुर्य और चन्द्रमा के चित्र कुछ मानवीय आकृतियां और कुछ ज्यामितीय आकृतियां और चित्रलिपि भी यहाँ मौज़ुद है. पास ही गोन्दली जलाशय भी है. कच्चे तेल के भड़ार को लेकर भी चर्चा रहती है.

इन्हे पहली बार दुनिया के सामने लाने का श्रेय राजनान्दगांव निवासी इतिहासविद् डॉ. भगवान सिंह बघेल को जाता है. उन्हे इसकी जानकारी सन् 1967-68 में ग्रामीणों से हुई.

चितवाडोगरी और करकाभाट का सम्बन्ध आज भी अबूझ: सहगांव से 20 कि.मी. दूर बालोद-गुरूर क्षेत्र में फैले महापाषाणकालीन स्मारकों का काल भी 5000 साल पुराना बतलाया जाता है.

23. भास्करकेसकाल, 1-10-02बस्तर पुरातत्व समिति ने नवलराम कोर्राम, सोनुराम मरकाम, सोनसाय मरकाम आदि ग्रामीणों की सहायता से हजार वर्ष पुराना शैलचित्र खोज निकालने में सफलता प्राप्त की है.

राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 43 से 20 कि.मी. दूर स्थित ग्राम विश्रामपुरी से लगभग 5 कि.मी. दूर 8-10 वर्ग कि.मी. का पठार है जिसे ग्रामीण मांझीनगढ़ के नाम से सम्बोधित करते है. इस पठार के तीन ओर गहरी खाई है. एक ओर ग्राम खल्लारी से होकर इस पहाड़ पर चढ़ा जा सकता है. लगभग 10 कि.मी. पैदल चलकर स्थल तक पहुंचा जा सकता है.

इस पठार के नीचे अनेक दरहा (गुफाये) है जिनमें जंगली जानवरों का बसेरा है. लोक मान्यता है कि दरवाली माता के 12 दावन शेर यहां रहते है. एक दावन में 12 शेर अर्थात 12 दावन में 144 शेर यहां रहते है. इस पठार के पूर्वी भाग में लगभग 20 मीटर नीचे उतरने पर बरामदानुमा एक गुफा है जहां 15-20 व्यक्ति एक साथ विश्राम कर सकते है.

इस गुफा के परतदार चट्टानों में हजारों वर्ष पुराने शैलचित्र अंकित है. चित्र में अधिकतर दायें हाथ के पंजे के निशान है. अन्य चित्रों को ग्रामीणों ने अज्ञानता वश विकृत कर दिए है इसलिये स्पष्ट नजर नही आते है. पठार पर प्रतिवर्ष भाद्रपद महिना में जातरा का आयोजन किया जाता है.

इन स्थानो के अतिरिक्त बस्तर जिले में केशकाल लिमदरिहा, सरगुजा जिले में सीतालेखनी, ओंड़गी कुदुगढ़ी आदि अनेक स्थान पर चित्रित शैलाश्रय पाये जाते है.

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छत्तीसगढ़ के संस्कृत कवि

Posted on December 8, 2007. Filed under: About Chhattisgarh |

छत्तीसगढ़ के संस्कृत कवि
श्री हरि ठाकुर

जनश्रुति के अनुसार वैदिक युग के महान ऋषि वशिष्ठ, अंगीरस, ऋग्ड़ी, और वाल्मिकी के छत्तीसगढ़ मे आश्रम थे. वे इस क्षेत्र मे केवल तपस्या के लिए ही नही, आर्यधर्म और संस्कृति के प्रचार के लिये भी आये और यहीं निवास करने लगे. ऋग्वेद वेदों में सबसे अधिक प्राचीन है. वशिष्ठ और अंगीरस का ऋग्वेद के प्रमुख रचनाकारों मे स्थान है. ऋग्वेद के सप्तम मंडल के रचयिता वशिष्ठ ही थे. वाल्मिकी तो आदि कवि ही है. उन्होने रामायण की रचना की और रामकथा को सारे देश में प्रचार किया. यह संस्कृत साहित्य की अनुपम निधि है. आगे चलकर उनके इसी ग्रंथ से प्रेरणा लेकर रामकथा के आधार पर न जाने कितने ग्रंथो का निर्माण हुआ और साहित्य के श्रीवृद्धि हुई.
छत्तीसगढ़ के इतिहास मे रामगिरि पर्वत (सरगुजा) जिला का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है. वशिष्ठ का आश्रम इसी पर्वत था. ‘कल्याण कारक’ नामक वैद्यता ग्रंथ के रचयिता श्री उग्रादित्याचार्य इसी पर्वत पर निवास करते थे. वे जैन धर्मावलम्बी थे. बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन ने भी अनेक ग्रंथो की रचना की. चीनी यात्री हुएनसांग ने छत्तीसगढ़ को नागार्जुन का देश कहा है. छत्तीसगढ़ उस समय कौशल के नाम से प्रसिद्ध था. नागार्जुन के ग्रंथ आज से 1600 वर्ष पुर्व चीनी भाषा मे अनुवाद भी हुआ था.
छत्तीसगढ़ मे उपलब्ध अनेक शिलालेखों और ताम्रपत्तों मे हमे अनेक विद्वान कवियों और उनके ग्रंथों का उल्लेख मिलता है. कुछ शिलालेख ऐसे है जिनमें इन कविताओं की काव्य प्रतिमा का हमें अच्छा परिचय मिलता है.
भास्कर भट्ट
पांचवीं शताब्दि मे भास्कर भट्ट नामक कवि छत्तीसगढ़ मे हुये. इनकी काव्य-प्रतिभा का परिचय हमें पान्डुवंशीय भवदेव रणकेसरी के शिलालेख में मिलता है. भवदेव बौद्ध धर्मावलम्बी थे और भास्कर भट्ट के सम्भवत: उनका राजाश्रय प्राप्त था. पूरा लेख पढ़्ने से भास्कर भट्ट की विद्वता स्प्ष्ट झलकती है.

ईशान कवि
छ्त्तीसगढ़ के इतिहास मे महाशिवगुप्त बालार्जुन का नाम अमर है. बालार्जुन अत्यंत प्रतापी शासक थे. उन्होने अपने शासन काल मे वैष्णव और बौद्ध धर्म को आश्रय दिया. वे स्वयं शैव मतावलम्बी थे. उनके समय मे अनेक विद्वान सिरपुर मे थे. चीनी यात्री हुएनसांग बालार्जुन के समय ही सिरपुर आया था. ऎसा कुछ विद्वानो का मत है. कवि ईशान इसी बालार्जुन के राजाश्रय मे थे. ईशान ‘चिंतातुरांक’ उपनाम से भी काव्य रचना करते थे.

सुकवि-अल्हण
छत्तीसगढ़ मे दसवीं शताब्दि के लगभग हैहयवंश ने अपना प्रभुत्व बढ़ा लिया. हैहयवंशी शासन काल मे अनेक विद्वान कवि और कलाकारों को आश्रय प्राप्त था. पृथ्वी देव प्रथम के शासन काल में अल्हण सुप्रसिद्ध विद्वान कवि थे. अल्हण का समय भी दसवीं शताब्दि का मध्य माना जाता है. कवि अल्हण ईश्वर के अनन्य भक्त थे. वे गर्भ नामक ग्राम के स्वामी थे. सम्भवत: यह ग्राम पृथ्वी देव उन्हे उनकी काव्य प्रतिभा और विद्वत्ता के सम्मान मे दिया था.

कीर्तिधरग्यारहवीं शताब्दि के आरम्भ मे कीर्तिधर नामक प्रसिद्ध कवि हुए. वे गौड़ कायस्थ थे. उस समय जाज्ल्ल्देव का शासन था. कीर्तिधर के पुत्र वत्सराज भी अच्छे कवि थे. वे जडेर गाँव मे रहते थे. वत्सराज के पुत्र धर्मराज भी कवि थे.

कवि मल्हण
सन् 1144 के एक ताम्रपत्र मे कवि मल्हण का उल्लेख है. कवि मल्हण पृथ्वीदेव द्वितीय के शासन काल मे थे. पृथ्वीदेव द्वितीय के शासनकाल में अनेक कवियों और विद्वानों का उल्लेख मिलता है. कवि मल्हण के पिता का नाम शम्भुकर था. मल्हण कवि के रूप मे अत्यंत प्रसिद्ध थे. उन्होने अनेक ग्रंथो की रचना की. उनके विषय मे लिखा गया है कि वे कमल रूपी कवियों के मध्य भ्रमर के तरह लोकप्रिय थे.
कवि नारायण
सन् 1150 ई. के लगभग कवि नारायण हुये. वे विष्णु के भक्त थे. उन्होने सुन्दर और सरस ‘श्री रामाभ्युदय’ नामक ग्रंथ की रचना की. कवि के रचना कौशल पर स्वयं सरस्वती मुग्ध थीं. कवि नारायण ने अपने समकालीन गोपाल-देव की चर्चा की है. जो संस्कृत और प्राकृत के बड़े विद्वान थे.
देवगण
इसी काल मे देवगण नामक कवि भी हुए. सन् 1150 के एक शिलालेख मे कवि का परिचय उपलब्ध हुआ है. देवगण का जन्म कायस्थ वंश मे हुआ था. देवगण के पिता का नाम रत्नसिंह, पितामह का नाम मामे और प्रपितामह का नाम गोबिन्द था. गोबिन्द चेदिदेश से तुम्मान आये थे. कवि देवगण के पिता रत्नसिंह भी अच्छे विद्वान और कवि थे. रत्नसिंह कश्यप और अक्षपाद के न्यायसिद्धांत के मर्मग्य थे. देवगण की माता का नाम रम्भा था.
देवगण को विद्वता का समुद्र कहा गया है. उन्होने अपनी विद्वता और तर्कशक्ति से प्रतिपक्षी विद्वानों के घमंड को चूर कर दिया और उनकी ख्याति चारों ओर फैल गयी. देवगण की वाणी मे इतना चमत्कार था कि विद्वान लोग भी उनकी वाणी को सुनने के लिये उत्सुक रहते थे. देवगण छ्न्दशास्त्र, अलंकारशास्त्र, शब्दशास्त्र और कामशास्त्र के भी अच्छे विद्वान थे.
इसी काल मे एक देवपाणी नामक कवि का भी उल्लेख मिलता है.
त्रिभुवनपाल
पृथ्वीदेव द्वितीय के शासन काल मे ही त्रिभुवनपाल कवि भी प्रख्यात थे. उनके पिता अनन्तपाल भी अच्छे विद्वान और कवि थे. त्रिभुवन कवि अनेक कलाओं मे निपुण तथा विद्वान थे. वे गौड़ वंश मे उत्पन्न हुये थे.

नागनाथ
राजा वराहेन्द्र के शासन काल में नागनाथ नामक विद्वान कवि कर्नाटक से आये थे. वराहेन्द्र राजा ने उन्हे राजाश्रय दिया. नागनाथ ने दुर्गादेवी की प्रशस्ति रचकर सुनाई जिससे प्रसन्न होकर राजा ने उसे बहुमुल्य हाथी भेट किया था.
चन्द्राकर कविइसी राजा के समय चन्द्राकर नामक अच्छे कवि हुये. जो अन्यत्र से आकर कोसंगा (केसगई) मे बस गये और उनकी कवित्व प्रतिभा के सम्मान मे कोसंगा किले के अधिकारी घाटमदेव ने उन्हे गाय, बछ्ड़े तथा स्वर्ण वस्त्रादि भेंट किये.
चक्रपाणि मिश्रसम्बलपुर के राजा बलिहारसिंह के शासन काल में कवि चक्रपाणि का जन्म हुआ था. राजा बलिहारसिंह का शासन काल 1648 से 1698 तक था. चक्रपाणि मिश्र ने संस्कृत मे ‘कोसलानन्द काव्यम’ की रचना की. बस्तर में पन्डित भगवान मिश्र भी संस्कृत के अच्छे कवि हुए. वे मैथिली थे तथा बस्तर के महाराजा के राजगुरू थे.

रेवाराम बाबू
रतनपुर के रेवाराम बाबू का जन्म सन् 1813 में हुआ. उनके प्रपितामह का नाम महंतराय, पितामह का नाम शिवसिंह, पिता का नाम जगतराम था. माता का नाम सीता था. उनकी पत्नी का नाम फुन्दरीबाई था. बाबूजी जैमिनी गोत्र के कायस्थ थे. उनकी मृत्यु सन् 1873 मे हुआ. बाबूजी जगदम्बा के अनन्य भक्त थे. वे संस्कृत, ब्रजभाषा, उर्दु और फारसी के अच्छे विद्वान थे. वे संगीत शास्त्र के भी अच्छे मर्मज्ञ थे. संस्कृत मे उन्होंने 1. रामायण सार दीपिका, 2. ब्राम्हण स्तोत्र, 3. गीतमाधव, (महाकाव्य) 4. नर्मदाष्टक और, 5. गंगालहरी काव्य ग्रंथो की रचना की. ‘गीत माधव’ महाकाव्य महकवि जयदेव के ‘गीत गोविन्द’ से प्रेरित होकर लिखा गया है. यह ग्रंथ अपने माधुर्य के लिए प्रसिद्ध है. यह ग्रंथ उन्होंने सन् 1854 मे समाप्त किया.

रघुबरदयाल
आचार्य कवि रघुबरदयाल का जन्म दुर्ग में सन् 1815 मे हुआ था. उनके पिता का नाम दलगंजन साव था. दलगंजन साव भी संस्कृत के अच्छे विद्वान तथा कवि थे. रघुबरदयालजी संस्कृत तथा ब्रजभाषा के बहुत बड़े विद्वान थे. उन्होने संस्कृत में ‘छ्न्द रत्नमाला’ नामक ग्रंथ लिखा. रघुबरदयालजी के मृत्यु सन् 1895 मे हुई. उनके पुत्र दशरथलाल जी भी अच्छे कवि थे. उन्होने भी अनेक ग्रंथ लिखे.

पंडित लोचनप्रसाद पान्डॆय
पंडित लोचनप्रसाद पान्डॆय संस्कृत ही नही, हिन्दी, अंग्रेजी, ब्रजभाषा, बंगला और उड़िया के भी विद्वान और कवि थे. इस देश के प्रमुख पुरातत्वविदों मे उनका नाम श्रद्धापुर्वक लिया जाता है. द्विवेदी-युग मे उन्होने इस क्षेत्र की खड़ी बोली की अद्वितीय सेवा की. उन्होने हिन्दी, अंग्रजी, उड़िया, ब्रजभाषा और छत्तीसगढ़ी मे लगभग 25 ग्रंथो की रचना की. संस्कृत में उन्होने अनेक पद्य रचे. अनेक ग्रंथो का सम्पादन किया. पांडेयजी का जन्म सन् 1886 मे बिलासपुर जिले के बालपुर ग्राम मे हुआ था. उनके पिता का नाम चिंतामणि पांडेय तथा माता का नाम देवहुती था. आपकी प्राम्भरिक शिक्षा बालपुर मे ही हुई. 1902 मे सम्बलपुर से मिडिल की परीक्षा पास की तथा 1905 मे मैट्रिक की परीक्षा कलकत्ते से पास की. 1905 से ही आप राष्टीय भावनाओं के पोषक हो गये. ‘मचा दो गुल-हिन्द मे यह घर-घर, स्वराज लेंगे-स्वराज लेंगे’ कविता 1905 में ही उन्होने लिखी थी. पांडेयजी का सम्पूर्ण परिवार साहित्यिक है. उनके अनुज पंडित मुकुटधरजी छाया बाद के प्रवर्तकों मे से एक थे.
इन कवियों और विद्वानों की रचनाओं से स्पष्ट है कि छ्त्तीसगढ़ की साहित्य परम्परा शुन्य नही थी. प्राचीन काल मे, इस क्षेत्र मे भी अनेक विद्वानों और साहित्यकारों ने जन्म लेकर इस क्षेत्र का गौरव बढ़ाया है. उपरोक्त विवरण से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह क्षेत्र हमेशा से (ही) पिछ्ड़ा हुआ नही था. यहाँ के राजाओं ने हमेशा विद्वान कवियों तथा कलाकारों को राजाश्रय दिया और उनके समय में साहित्य तथा कला की पर्याप्त समृद्धि हुई. यह बात सही है कि इस काल के कवियों और साहित्यकारों के ग्रंथ उपलब्ध नही होते, वे समय-धुलि में कही खो गये किंतु जो भी अवशेष मिलते है वे उपरोक्त कथन की पुष्टि करते है.

नव भारत के दीपावली विशेषांक मे प्रकाशित, संवत 2021 (सन् 1965)

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The new state

Posted on August 24, 2007. Filed under: About Chhattisgarh |

15 अगस्त 1947, को देश आजाद हुआ तत्पश्चात देशी रियासतों का विलनीकरण कार्य प्रारम्भ किया. इस बीच छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश के अंतर्गत था और 21वी सदी में मध्यप्रदेश के दक्षिण-पुर्व के 16 जिलो को पृथक कर इस ‘धान के कटोरे’ को एक नये राज्य छत्तीसगढ़ का जन्म नवम्बर 1, 2000 को किया गया आज छत्तीसगढ़ राज्य भारतीय मानचित्र में 27 वें राज्य के रूप में रेखांकित हो गया है.

यह राज्य छ: दुसरे राज्यों से घिरा हुआ है. प्रदेश की सीमायें उत्तर मे उत्तर प्रदेश, उत्तरपुर्व में झारखंड, दक्षिण-पुर्व में उड़ीसा, दक्षिण मे आन्ध्रप्रदेश, दक्षिण-पश्चिम में महाराष्ट्र तथा पश्चिम-उत्तर में मध्यप्रदेश द्वारा निर्धारित है.

छतीसगढ़ राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री कांग्रेस के श्री अजीत प्रमोद जोगी बने और प्रथम राज्यपाल श्री दिनेश नन्दन सहाय बने. उच्चन्यायालय के प्रथम कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश श्री आर. एस. गर्ग थे. राजघानी रायपुर और उच्चन्यायालय बिलासपुर में बना और यह देश का 19 वाँ उच्चन्यायालय बना. छत्तीसगढ़ राज्य का मंत्रालय, रायपुर स्थित पूर्व डी. के. हस्पिटल में स्थापित किया गया. प्रशासनिक तौर पर छत्तीसगढ़ 3 रेवेन्यु कमीश्नरी और 16 रेवेन्यु जिलों में विभाजित है और 16 जिलों एवं 82 तहसीलों में बांटा गया है. ये जिले है- दंतेवाड़ा, बस्तर, राजनान्दगांव, दुर्ग, धमतरी, रायपुर, महासमुन्द, कवर्धा, बिलासपुर, जांजगीर-चाम्पा, कोरबा, रायगढ़, जशपुर, सरगुजा और कोरिया.

छत्तीसगढ़ प्रदेश 17 46’ अक्षांश से उत्तरी अक्षांश तथा 80 15’ पुर्वी देशांतर से 84 24’ पुर्वी देशांतर के बीच विस्तृत है. इसका कुल क्षेत्रफल 1,35,194 वर्ग कि.मी. है. कर्क रेखा इसके सरगुजा और कोरिया जिलो से गुजरती है. यहाँ की भुगर्भीक बनावट में आर्कियनशैल समुह और कड्प्पाशैल समुह का विस्तार सर्वाधिक पाये जाते है. यह प्रदेश के वृहत उच्चावच खण्ड प्रायद्विपीय पठार के उत्तरीय-पुर्वी भाग मे विस्तृत बघेलखन्ड पठार, छत्तीसगढ़ मैदान एवं दण्डकारण्य पठार के अंतर्गत आता है. बघेलखण्ड पठार के दक्षिणी-पुर्वी भाग, छत्तीसगढ़ मैदान एवं दण्डकारण्य पठार के सम्पुर्ण भाग का विस्तार है. इस प्रदेश को धरातलीय संरचना की दृष्टी से पहाड़ी प्रदेश, पठारी एवं पाट प्रदेश तथा मैदानी प्रदेश में विभाजित किया जा सकता है.

इस राज्य की प्राकृतिक शान देखते ही बनती है. कई नदियाँ, पहाड़ो और पठारो से गुजरती हुई इस राज्य को जीवन प्रदान करती है. नदियों, शैलीयों और पठारो की गठजोड़ से राज्य की प्राकृतिक आभा को चार चाँद लग जाते है.  इसी कारण यह राज्य अपनी विशिष्ट पहचान रखता है. छत्तीसगढ़ वन सम्पदा की दृष्टी से सम्पन्न राज्य है. इस प्रदेश के वनांचल में चार राष्ट्रीय उद्यान और 11 अभ्यारण्य है. यह क्षेत्र वन प्राणी संरक्षण, वन संरक्षण तथा पर्यटन हेतु महत्वपुर्ण है.

राष्ट्रीय राजमार्ग नं. 6 (हावड़ा-मुम्बई) और नं. 53 (विशाखापटनम-उड़ीसा) छत्तीसगढ़ से होकर गुजरती है. 7115 कि.मी. में से 1053 कि.मी. रेल्वे लाईन छत्तीसगढ़ के दक्षिण-पुर्व रेल्वे द्वारा अधिग्रहित है. दिल्ली, मुम्बई, भुवनेश्वर, नागपुर और जबलपुर के लिये नियमित विमान सेवा भी उपलब्ध है.

सन 2001 की जनगणना के अनुसार इस राज्य की कुल जनसख्या: 20, 795, 956 (2001 की जनगणना) है. जनसंख्या का घनत्व 154 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. है. कुल नगरीय जनसंख्या 20.8%.       लिंगानुपात में 990 प्रति हजार पुरुषो पर स्त्रीयाँ और साक्षरता का स्तर 65.18 % (पुरूष 77.86%, स्त्री 52.40%)

छत्तीसगढ़ में, ग्रीष्म ऋतु में तापमान 43 डिग्री सेंटीग्रेट से 23 डिग्री सेंटीग्रेट तक तथा शीत ऋतु में तापमान 28 डिग्री सेंटीग्रेट से 8 डिग्री सेंटीग्रेट रहता है. वर्षा ऋतु जून से सितम्बर तक रहती है. प्रदेश की औसत वार्षिक वर्षा 140 से.मी. है. यहाँ की जलवायु उष्णाआद्र मानसूनी प्रकार की है.

छत्तीसगढ़ प्रदेश में 26.76% जनसंख्या आदिवासीयों की है. यहाँ सतनामी प्रमुख अनुसुचित जाति तथा गोड़ प्रमुख अनुसुचित जनजाति है. जबकि पहाड़ी कोरबा, बिरहोर, बैगा, अबुझमाड़िया तथा कमार विशेष पिछड़ी जनजाजियाँ है.

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