तेन्दुपत्ता या रतनजोत

Posted on April 25, 2009. Filed under: Hindi |

तेन्दुपत्ता या रतनजोत

क्या इस बात की कल्पना भी की जा सकती है कि रतनजोत कितना नुकसान दायक हो सकता है. इसका जवाब हाँ मे भी हो सकता है और नही में भी. पिछले दो-तीन महीनों में जितनी भी बार मेरी मुलाकात रतनजोत से हुई है, अच्छी नही रही. यह सुन्दर सा विदेशी पौधा कैक्टस ही नजर आया. रतनजोत से तो अच्छा नाम बगरंड़ा है, कुछ डरावना, भस्मासुर जैसा.


मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह जी आयुर्वेद के जानकार है और एक डॉक्टर भला ऎसी गलती कैसे कर सकता है यह भी समझ में नही आया! मवेशी तक तो रतनजोत खाते नही. क्या उन्होने रतनजोत से ऎसी कोई दवाई खोज निकाली है जो उन हजारों देशी वनस्पति से भी कारगर है? वर्तमान में तो यह एक पायलेट प्रोजेक्ट के रूप में चल रहा है. उत्पादन शुरू भी नही हुआ है और अभी से इससे होने नुकसान नजर आने लगे है.


दो महिने पहले एक डॉक्युमेंटरी फिल्म के लिये मैने बिलासपुर में कुछ बच्चों और उनके अभिभावकों की इंटरव्युह की. लगभग 3 से 12 वर्ष तक के एक दर्जन बच्चे रतनजोत खाकर बीमार पड़े थे और उन्हे तुरंत सिम्स में भर्ती कराया गया था. जहाँ मैने शुटिंग की थी वह बिलासपुर का इमलीभाटा क्षेत्र है और यह कोई पहली घटना नही थी. चुंकि कुछ घटनाये शहर या शहर के आसपास के इलाकों में होती है, दुर्घटना का पता चल जाता है. फिर पिछले महिने सी. पी. एम. के श्री संजय पराते के साथ कांकेर के परलकोट क्षेत्र में जाने का मौका मिला. चुंकि पूरी यात्रा बाईक से थी तो जगह-जगह रूक-रूक कर बहुत सी बांतों को समझने और जानने का मौका मिला. इसमें से एक थी सड़क के दोनो तरफ फैली हुई बगरंडा.


यह पहली बार नही था इस तरह से किलो मीटर नापना लेकिन अप्रेल-मई तेन्दुपत्ता का मौसम तो होता ही है और अगर शहर से 100-150 कि.मी. दूर जाये तो सड़क के दोनो तरफ अपने से उगे तेन्दुपत्ता जरूर दिखाई दे जाते है लेकिन इस बार अंतर था. तेन्दुपत्ता की जगह फैला था भस्मासुर-बगरंडा.

पंचायत, वन विभाग और रोजगार गारंटी के तहत लाखों रूपये खर्च कर इस पूरे क्षेत्र में पिछले दो साल से रतनजोत के पौधे का रोपण किया जा रहा है.


पहले बात करे भ्रष्टाचार की- एक तो रतनजोत का रोपण, रोजगार गारंटी के तहत किया जा रहा है जो वनीकरण के शर्तो में नही आता. ऊपर से रोपण करने वाले ग्रामीणों को दो-तीन महिने से मजदूरी भी नही मिली है.


ग्राम पी.व्ही. 20 ग्राम पंचायत-बैकुंठपुर, ब्लॉक कोयलीबेडा, कांकेर में कुछ लोगो ने अपने रोजगार गारंटी कार्ड दिखाये, जिन्होने वनीकरण के नाम पर दो महिने पहले रतनजोत का पौधा रोपण किया था लेकिन आज तक इन्हे भुगतान नही हुआ है. इसी गाँव के जतनशील और सुभाष सरकार ने बतलाया कि हम लोग 15,000 रतनजोत लगाये. उसमें 7 लाख का काम रोजगार गारंटी की तहत हुआ फिर एस.डी.एम. ने और 5,000 बढ़ाया उसके बाद फिर 10,000 बढ़ाया फिर उसके बाद पेमेंट दिया. उस समय पेमेंट को लेकर 7 लाख का घोटाला हुआ था. असल पेमेंट तो मात्र 28,000 से 30,000 तक ही हुआ था. और अभी वहाँ एक भी झाड़ नही है. उस समय हम लोग 15-20 आदमी इस काम के तहत गये हुये थे और यह लगभग एक महिने तक चला. सरकारी जमीन पर लगाया गया और वर्तमान में ज्यादा से ज्यादा 50-100 ही पौधे ही जीवित होंगे.


आदिवासी क्षेत्र में फल खाने की संख्या बढ़ेगी- अभी भी छत्तीसगढ़ का बहुत बड़ा हिस्सा वन क्षेत्र है और यहाँ रहने वाले जनजातियाँ न केवल वनोपज से आर्थिक लाभ लेती है वरन् उनके भोजन का हिस्सा भी है और वे जड़ी-बूटी के बड़े जानकार भी है. अगर इसी तरह से बगरंडा लगाया तो उपरोक्त तीनों बांतों पर देर-सबेर भारी असर पड़ेगा. आदिवासी क्षेत्र में यदि गलती से कोई फल खा ले तो तुरंत किसी को समझ में भी नही आयेगा और पास ही कोई आपात चिकित्सा की सुविधा भी नही होगी. जब तक फल नही लगे है तब तक तो ठीक है लेकिन तब क्या होगा जब यही आदिवासी बच्चे नजदीक में ही मुफ्त में काजू की तरह लगने वाले फल को खायेंगे!!!


पी.व्ही. 26 मायापुर पंचायत के गणॆश बर्मन ने बतलाया कि कुछ साल पहले पी.व्ही. 45 में रतनजोत खाने से दो बच्चे बीमार पड़े थे. उनकी हालत बहुत खराब थी. एक बच्चा तो कई घंटो तक भी होश में नही आया था और दुसरा भी 4-5 घंटे तक बेहोशी की हालत में रहा.


तेन्दुपत्ता व्यव्साय पर जबरदस्त प्रभाव पड़ेगा- पखांजूर से दुर्ग कोन्दल के रस्ते पर पुरे समय हमारी नजर रतनजोत और तेन्दुपत्तो पर ही रही. जो बांते कुछ ग्रामीनों से हुई वह वाकई चौकाने वाली थी कि कही न कही रतनजोत, तेन्दुपत्ता को नुकसान पहुंचा रहा है और फिर यह ख्याल आता रहा कि यदि इसी तरह से रतनजोत लगाया गया तो अन्य वनस्पतियों के साथ-साथ तेन्दुपत्ता भी चौपट हो जायेगा.

पखांजूर से दुर्गकोन्दल के मुख्य मार्ग के दोनो तरफ रतनजोत का रोपण हुआ है. बीच में ऎसे कुछ जगह है जहाँ तेन्दुपत्ता अपने नैसर्गिक रूप से मौजुद है, घने है और बढ़त भी अच्छी है. लेकिन साथ ही ऎसा बड़ा क्षेत्र भी आया जहाँ दोनो तरफ रतनजोत का रोपण हुआ है. जहाँ-जहाँ रतनजोत है वहाँ तेन्दुपत्ता या तो नही है, या तो कम है और अगर है तो बढ़त नही है. लेकिन ऎसा हमने एक भी बार नही देखा कि रतनजोत और तेन्दुपत्ता की सघनता और ऊंचाई बराबर हो.


सड़क के दोनो तरफ जहाँ सामने की ओर रतनजोत है वहाँ तेन्दुपत्ता नही है और जहाँ सड़क से 100-200 मीटर दूर रतनजोत है वही सामने की तरफ तेन्दुपत्ता है लेकिन वहीं 100-200 मीटर दूर रतनजोत के पास तेन्दुपत्ता नही है. वही ऎसे भी कुछ क्षेत्र भी देखने को मिले जहाँ ढ़लान है और पानी का स्रोत है वहाँ रतनजोत सघन है और ऊंचाई भी है लेकिन इसका तेन्दुपत्ता पर असर पड़ा है.


आदिवासी साल के चार महिने इन्ही तेन्दुपत्ता पर निर्भर रहते है और उन्हे अभी भी तेन्दुपत्ता पास ही के जंगलों में मिल जाता है, दूर जाने की जरूरत नही होती. अब देखना यह है कि अगर वाकई में रतनजोत तेन्दुपत्ता को नुकसान पहुंचा रहा है तो यह आने वाले आठ-दस सालों में ही यह तेन्दुपत्ता का कितने बड़े भु-भाग पर असर डालेगा. अभी शायद यह बहुत ज्यादा चिंता का विषय नही है क्योंकि तेन्दुपत्ता के बहुत बड़े हिस्से को तोड़ा ही नही जाता. इस तरह से यह निश्चिंतता तो हो सकती है कि कम से कम कुछ दशक तक नुकसान की भरपाई हो जायेगी लेकिन नही भुलना चाहिये कि इससे एक तो पत्ते तोड़ने दूर तक जाना होगा और फल खाने की घटनाये निश्चित तौर पर बढ़ेगी.


जब रतनजोत का रोपण किया जाता है तब जो गढ्ढ़ा खोदा जाता है उससे भी तेन्दुपत्ता को नुकसान होता है.


साल में एक बार बूटा कटाई होती है और फिर तेन्दु का पौधा अपने से बढ़ने लगता है. लेकिन रतनजोत रोपण के नाम पर तीन-तीन, चार-चार बार बूटा कटाई हुई है. जिस कीटनाशक क्लोरोफासऔर अन्य दवा का प्रयोग किया जाता है वह आसपास की वनस्पति को नुकसान पहुंचा रहा है. यह कीटनाशक दवा केयर टेकर के लिये भी नुकसानदेह है. इससे त्वचा और साँस में तकलीफ होती है. लेकिन सरकार ने अभी तक किसी को भी इससे होने वाली बिमारी के बारे में न तो बतलाया है और न ही किसी प्रकार का जागरूकता अभियान चलाया है.


दुर्गकोन्दल के श्री शक्ति डे ने भी बतलाया कि उनके क्षेत्र में रतनजोत के रोपण के बाद से तेन्दुपत्ता की सघनता में कमी आई है और जहाँ-जहाँ पर रतनजोत है वहाँ घास भी नही उगती.


छत्तीसगढ़ की रमन सरकार जिद्द पर यह प्रोजेक्ट कर रही है और पूरे देश में केवल डॉ. रमन सिंह के अलावा किसी की गाड़ी बायो-डीजल से नही चलती. जहाँ तक बात बायो-डीजल के सस्ते में उपलब्ध होने की है तो डीजल और पेट्रोल पर लगने वाले बहुत से टैक्स हटा दे तो यह कीमत बायो-डीजल से कम ही होगी यानि बायो-डीजल महंगा साबित होगा.

बाद में रतनजोत पर कृषि वैज्ञानिक श्री पंकज अवधिया से बात हुई तो उन्होने बतलाया कि चिंता की बात तो है लेकिन साथ ही तकनीकि दिक्कतें भी है और वैज्ञानिक चुनौतीयां भी.

बगरंडा (रतनजोत) बिल्कुल बेशरम की ही तरह फैल रहा है और महिसासुर जैसे बहुत बड़े क्षेत्र को तबाह कर रहा है. आज नही तो कल आदिवासी क्षेत्रों में इसकी वजह से भुखमरी फैलेगी जैसा कि शक्ति डेने कहा. इसलिये बहुत जरूरी है कि यह तय हो कि क्या तोड़े और हमें क्या चाहिये तेन्दुपता या रतनजोत.

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