परलकोट में वामपंथ

Posted on November 10, 2008. Filed under: Hindi | Tags: , , , , , , , , , , , , |

परलकोट में वामपंथ

शाम होने से पहले बड़गाँव मेला पहुंचे. यहाँ साल में एक बार तीन दिन का बड़ा मेला भरता है. आज अंतिम दिन था. प्रतापपुर में हुई नक्सलियों की जन सुनवाई की घटना के बाद से वहाँ बड़ी मात्रा में फोर्स की तैनाती थी. अखबारों से पता चला कि गर्मी और महंगाई का भी असर इस मेले पर हुआ है. जब हम पहुंचे तब तक वाकई में रौनक नहीं थी. मेला अपने अंतिम चरण में था. कुछ मात्रा में फोर्स अभी भी ड्रेस में और सादे ड्रेस में मौज़ूद थी. मेला के बचें खुचें होने पर फोर्स को अब इस बात की निश्चिंतता थी की अब अंतिम समय में किसी प्रकार की कोई नक्सली हिंसा नही होगी इसलिये वे बड़ी लापरवाही से मेले में घुमते दिखे. कुछ तो झूलना झूलते और कुछ पास ही चल रहे चौसर और जुआँ देखने में मगन थे. झूलना से ही थोड़ॆ दूर पर मुर्गा लड़ाई चल रही थी. वहाँ बड़ी भीड़ और शोर थी. बहुत सा मुर्गा और पैसा दांव पर लगा होता है. मुर्गा लड़ाई आदिवासियों का प्रिय खेल है. बड़े स्थानीय बाजार, मेले या उत्सव के समय यह इनके प्रिय शौक में से एक है. पूरे खेल में मुर्गों के पीछे हजारों तक की बोली होती है. इस खेल को खिलाने वाले और भीड़ को नियंत्रण करने के लिये दादा जैसे लोग होते है. इसके अपने नियम और कानून भी होते होंगे जो मुझे नही पता और यह भी नही पता कि पूरा खेल खासकर पैसों का, कैसे चलता है. खैर, रात होने से पहले ही हम वहाँ से निकल पड़े.

संजय पराते जी बतलाते है कि इन दस सालों में पूरे परलकोट में ऎसा कोई भी गाँव नही होगा जहाँ वे न गये हो और मीटिंग न ली हो. लोग अभी भी संजय जी के तेज तर्रार तेवरों को लोग भूले नही है और फिर से वापस आने का न्यौता देते रहते है. सी.पी.एम. के अलावा एस.वाई.आई और डी.वाई.एफ.आई. जैसे युवा मोर्चे भी है.

संजय पराते जी पखांजूर से तीन बार सी.पी.एम. से विधानसभा के लिए चुनाव में खड़े हो चुके है. पहली बार 1994 में, फिर 1999 में, फिर 2000 में और फिर 2004 में. उन्होनें यहां पार्टी की स्थिति बहुत मजबूत कर दी है. अलग राज्य बनने के बाद रायपुर आये और पार्टी के काम लग गये. पखांजूर से हटने के बाद मंतू राम पवार को पार्टी की ओर से टिकट दिया गया लेकिन वे कांग्रेस में चले गये जिससे पार्टी को बहुत नुकसान हुआ.

ऎसे बहुत से लोग जो संजय पराते जी के समय पार्टी में थे अब या तो कांग्रेस में है या भाजपा में. खासकर ऎसे बहुत से लोग जो पंच-सरपंच-जनपद जैसे पदों में है. पद मिलने के बाद वे जमीनी लड़ाई लड़ने के बजाय पार्टी के कड़े सिद्धांत की वजह से घुटन महसूस करने के कारण पार्टी छोड़ देते है. कई बरस के मेहनत की बाद कैडर तैयार होता है और जब यही कैडर पद में आने पर पार्टी छोड़ देते है तो बड़ा नुकसान होता है. क्योंकि फिर से कैडर तैयार करने में बरसों लगते है.

संजय जी द्वारा पूर्व में किये गये मेहनत का असर दिखता है. उनके ही नेतृत्व में यहाँ पार्टी दूसरे या तीसरे क्रम पर रही है. कट्टर वामपंथी और बुजुर्ग लोग अब नये लोगो से उम्मीद खो चूके है. बुजुर्ग वामपंथियों को शिकायत है कि किसी भी मीटिंग और आन्दोलन के बारे में खबर नही दी जाती और मशवरा भी नही लिया जाता. ये वही पूराने लोग है जिहोने संजय जी के भी आने से बहुत पहले से कई-कई कि.मी. साईकल पर गाँव-गाँव घूमकर पार्टी का प्रचार किया करते थे लेकिन अब उन्हे ज्यादा महत्व नही दिया जाता. पहले, मिटिंग या आन्दोलन होता था तब सभी लोगों को पोस्टकार्ड से सूचना मिल जाया करती थी लेकिन अब फोन के जमाने में भी लोग सम्पर्क नहीं रखते. परलकोट के सी.पी.एम. के फाऊंडर में से एक सुदेब अधिकारी/ ये बांगलादेशी नही है.

सी.पी.आई का चुनाव चिन्ह हंसिया और धान की बाली है और सी.पी.एम. हंसिया हथौड़ी और स्टार है लेकिन पूरे वामपंथी घटको का झंड़ा एक ही है हंसिया और हथौड़ा.

तेजेन्द्र

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