अंत में बहुत सी बातें

Posted on November 10, 2008. Filed under: Hindi | Tags: , , , , , , , , , , , |

अंत में बहुत सी बाते

आज लगातार चौथा दिन है कि यहाँ टेलीफोन पूरी तरह से ठप्प है. हफ्ते में तीन-चार बार ठप्प होना, यहाँ सामान्य बात है. खासकर शुक्रवार-शनिवार को बन्द कर दिया जाता और फिर सोमवार-मंगलवार को फिर चालू कर दिया जाता है. इससे दो बांते सामने आ रही है एक तो बी.एस.एन.एल. के अधिकारियों की निजी टेलीफोन कम्पनियों की मिली भगत से उपभोक्ताओं को परेशान करना ताकि वे अन्य निजी टेलीफोन की मांग करे और दूसरी कम्पनियों को लाभ मिले. दूसरी खबर जो बाद में आई वह यह की भानुप्रतापपुर रस्ते पर किसी ठेकेदार द्वारा गलती से लाईन का काट दिया जाना जिससे की इतने दिन तक टेलीफोन ठप्प रहा. शायद बाद में उसके खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज कराया गया. इस तरह से टेलीफोन का बन्द हो जाना पखांजूर में ही नही पूरे कांकेर जिले में है.

आज छठा दिन 22 तारीख, आखिर कार आज वह दिन आ ही गया जिसकी तैयारी पिछले कई दिनों से चल रही थी. सुबह से बैनर, पोस्टर और लाऊड स्पीकर की तैयारी शुरू हो गई. जो नौजवान लोग थे वे लोग तैयारी करने में लगे थे और धीरे-धीरे लोग आना शुरू करते गये और फिर नारे बाजी और भाषण शुरू हुई. रोजगार गारंटी योजना की योजना अधिकारी सांतन देवी जांगड़े अन्दर ही बैठी थी. कुछ देर के नारे के बाद पार्टी के लोग एस.ड़ी.एम. से मिलने अन्दर गये. स्थिती उस समय गरमा गई जब कामचलाऊ आश्वासन और कुछ कार्यवाही किये जाने की बात कह कर एस.डी.एम. बाहर जाने लगी. फिर संजय जी और अन्य साथियों ने घेराव किया. यह पूरा क्षण बहुत तनाव भरा था.

किसी अधिकारी को कैसे घेरना है, कैसे लोगो में जोश भरा जाता है या कहे एक लीडरशीप की झलक यहाँ देखने को मिली. इसका नतीजा यह निकला कि थानेदार के हस्तक्षेप से सुलह हुई और एस.डी.एम. पूरी बांते सुनने, कार्यवाही करने और गलती मानने को राजी हुई.

इस पूरे घटना के बाद यह बात बार-बार मेरे मन में आती रही कि राजधानी में बहुत से नौजवान पार्टी कार्यकर्ता सिवाय पुतला फुंकने, नारे लगाने और रैली निकालने के अलावा कुछ नही करते. बहुत से ऎसे नेता पक्की तैयारी नही करते, अपने को किसी भी स्थिती के लिये तैयार नही रखते और शायद जानकारी का भारी अभाव रहता है.

कल के धरने के बाद से यहाँ राजनैतिक हलचल और थोड़ी बहुत झड़पों की खबरें भी आने लगी है. जहाँ-जहाँ कांग्रेस और भाजपा के सरपंच है वहाँ-वहाँ छुटपुट घटनायें हुई है. जैसे कांग्रेस और भाजपा के लोगों ने मिलकर, धरना के बाद वापस जा रहे एक पार्टी कार्यकर्ता को मारा. यह घटना इन्द्रप्रस्थ पी. व्ही. 39 की है. जिससे मारपीट की गई वह एक किराना दुकान चलाता है और उसकी पत्नी वार्ड पंच है. कल के धरने में वह अपनी पत्नी की तरफ से गया था और यहाँ चल रही भ्रष्टाचार के खिलाफ बोला था.

जब हम सुबह पी.व्ही. 39 गये और उस घटना स्थल की शूटिंग की जहाँ पोकलैंड से खुदाई हुई थी तब सरपंच भागा-भागा हमारे पीछे आया और घूरता हुआ वापस चला गया. उसके बाद हम फिर दूसरे रास्ते से वापस गये. इस बात का अन्दाजा था कि वे हमें घेर कर मारपीट करते और कैमरा छिनने और तोड़ने की कोशिश करते.

हफ्ते भर परलकोट घूमने के बाद वापस दुर्गकोंदल पहुंचे और फिर रास्ते में हमारा ध्यान रतनजोत और तेन्दूपत्ते पर गया और हमने देखा कि कैसे रतनजोत, तेन्दूपता को बर्बाद कर रहा है. आज कोड़ेकूर्सी का बाजार है. सो हम बाजार की शूटिंग करने गये. कोड़ेकूर्सी दुर्गकोन्दल से 16 कि.मी. है. लोग गोंड़ी के अलावा कुछ छत्तीसगढ़ी भी बोल रहे थे. गाँव से पहले एक नदी पड़ती है जिस पर पुल नही है. यह गाँव भी बरसात में कट जाता है. बाजार कुछ खास नही थी. लेकिन आया था इसलिये शूटिंग भी की. मछली बेचने वाला, महिला मोची, खुला नाई दुकान, मटकी/कर्सी, धन्ना, सेठ, व्यापारी. रास्तें में मृतक स्तम्भ की शूटिंग की. कोड़ेकूर्सी एक स्वतंत्रता सेनानी केन्दरू राम का गाँव है. लेकिन मैं इस बारे में कोई पूछताछ नही कर पाया इसलिये केन्दरू के बारे में कोई जानकारी नही है.

इसके बाद केवटी से भानुप्रतापपुर और फिर अंतागढ़ आये. यहाँ लोगों ने बतलाया कि एक अधिकारी पुरातत्व संपदा को अपने घर में जमा कर रहा है और कोई कुछ भी नही बोल सकता. यहाँ इतना भ्रष्टाचार है कि पूछिये मत और सभी विभाग जम कर लूट मचा रहे है.

मुझे याद है तीन-चार साल पहले मैं इसी रास्ते से नारायणपुर-अंतागढ़-भानुप्रतापपुर-दल्ली-डौंडी-रायपुर आया था. हम नारायणपुर का प्रसिद्घ मेला शूट करने गये थे. उस समय भी यह रास्ता बहुत सुनसान था और फोर्स की चौकियाँ बनी हुई थी. आज भी जब हम अंतागढ़ जा रहे थे फोर्स रास्तों पर थी. अभी सड़क निर्माण हो रहा है इस कारण से पूरे रास्ते के बरसों पुराने बड़े-बड़े बहुत से आम के पेड़ काट दिये गये.

अंतागढ़ में गंगा पोटाई से मुलाकात हुई. कांग्रेस से कई बार विधायक और सांसद रह चुकी है. अर्जुन सिंह की समर्थक है. बाद में अजीत जोगी ने मनोज मंड़ावी को टिकट दिया. 2004 के चुनाव में मंड़ावी हार गये. अभी यहाँ भाजपा से विधायक है.

अंतागढ़ नाम भी अब खौफ का पर्याय हो गया है. इतनी नक्सली और पुलिसिया घटनायें हो चुकी है और इतने बार अखबारों में यह नाम पढ़ा जा चुका है कि नाम सुनने पर ही दिमाग में सशस्त्रधारी लोगों का खौफ नजर आने लगते है. अंतागढ़, दंतेवाड़ा, भैरमगढ़, सुकमा, बीजापुर, अबूझमांड, गीदम, नारायणपुर, ओरछा आदि बस्तर के ये सब नाम अब किसी भयानक सपने की तरह हलचल मचाता है जैसे वहाँ कोई बड़ी तबाही हुई हो, सुनामी, नरगिस या किसी बड़े भुकम्प की.
अंतागढ़ से वापस भानुप्रतापपुर आये. भानुप्रतापपुर के कचहरी में एक गाड़ी भरकर आदिवासी लाये गये थे, कहते है नक्सली है. सभी लगभग 6 महिने से जेल में है और आज कचहरी आये हुये है. किस धारा और आरोप के तहत बन्द थे यह बताने में लोग हिचकते रहे लेकिन सभी के ऊपर नक्सली होने का आरोप जरूर था. उनसे मिलने उनके परीजन भी आये थे. किसी की पत्नी छोटे-छोटे बच्चों को लेकर पहुंची थी, किसी की माँ, तो किसी के पिताजी. सभी आदिवासी के हाथों में हथकड़ी थी और पीने के लिये पानी तक नही मिल रही थी. इतनी गर्मी में जानवरों की बन्द थे उस लोहे के डब्बे में. लगभग 15 से ज्यादा आदिवासी तो थे ही उस डग्गे में. मैं इन आदिवासियों से बात करना चाहता था और शूटिंग भी लेकिन कचहरी परिसर में होने के कारण और वकीलों के भारी विरोध के चलते शूट नही कर पाया. चाह कर भी किसी से बात नही हो पाई. इनकी खबरें विनायक सेन और अजय टी. जी. की तरह किसी भी समाचार पत्रों, चैनलों और इन्टरनेट पर भी नही आई.

तेजेन्द्र

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