सीतरम से सीताराम

Posted on November 6, 2008. Filed under: Hindi | Tags: , , , , , |

सीतरम से सीताराम

ग्रामीण बतलाते है कि परलकोट, परलदेव नाम के एक राजा के नाम पर पड़ा है और कोट का अर्थ होता है किला. परलकोट का यह पूरा क्षेत्र बड़गाँव से लेकर सीतरम के पास स्थित “परलकोट” तक का है. आज परलकोट नामक जगह में कोई नही रहता लेकिन अतीत के चिन्ह अभी भी देखे जा सकते है. पखांजूर से बान्दे फिर बेठिया जाते हुये लगभग 60 कि.मी. दूर माड़ क्षेत्र से लगा एक गाँव है सीतरम.  सीतरम से दो कि.मी. की दूरी पर स्थित है परलकोट. सीतरम से परलकोट के बीच एक नदी पड़ती है जिसके बाद से अबूझमाड़ क्षेत्र शुरू हो जाता है. डोंगाघाट नदी जो आगे जाकर कोटरी नदी से मिलती है. डोंगाघाट से ही मांड क्षेत्र शुरू हो जाता है.

परलकोट में हर साल रंगपंचमी के दिन बहुत बड़ा उत्सव मनाया जाता है जहाँ आसपास से 100 से ज्यादा गाँव के लोग शामिल होते है. परलकोट में स्वतंत्रता सेनानी शहीद गेन्दसिंह की स्मारक है और सीतरम में अंग्रेजों द्वारा उन्हें फांसी दी गई थी. आज भी वह इमली का पेड़ है जिसमें अंग्रेजों ने उन्हे फांसी पर लटकाया था.

अभी भी परलकोट में बूढ़ादेव और ग्राम देवी-देवता है. यहाँ बहुत सी पुरानी मूर्तियाँ थी लेकिन धीरे-धीरे सब चोरी हो गया. यहाँ आंगा देव और बूढ़ा देव भी है. इस आंगा देव का महत्व लगभग 105 गांव तक है और लोग इसकी पूजा करने आते है. इस आंगा का नाम माड़िया मोंगराज बाबा है. किसी गाँव में कोई परेशानी होने पर भी इसे लेकर जाते है. महाराष्ट्र से भी लोग यहाँ पर आते है. साथ में बूढ़ादेव भी है जो सालों से यहाँ पर है. लेकिन यह जगह अब वीरान है और केवल मन्दिरें भर है. 30-35 साल पहले लोग इस जगह को छोड़ कर चले गये, कहते है कि नदी-नाले के कारण महिनों तक आवागमन नही होता था और राशन की बहुत परेशानी होती थी.

परलकोट, ओरछा ब्लाक में आता है और ओरछा यहाँ से बहुत दूर है. सीतरम पहुंच मार्ग अभी भी बहुत दुर्गम है. बीच मे कोटरी नदी पड़ती है. यह पूरा क्षेत्र साल में केवल 5 महीने ही खुला रहता है और बाकी 7 महीने बाहरी दुनिया से कटा रहता है. सीतरम बड़ा गाँव है लगभग 150 मकान तो होंगे ही. गाँव का नाम तो सीतरम है लेकिन कई लोग उसे अब सीताराम भी कहने लगे है.  यहाँ अब मंड़िया की पैदावारी बहुत कम होती है. मंडिया, कोदो की तरह ही होता है और उसे पीसकर फिर पानी में उबालकर मंड़िया बनाया जाता है. मंड़िया शुगर फ्री होता है और शहरी उसे बहुत खाते है. लोग दूर-दूर से आते है इसे खरीदने के लिये.

हम वहाँ डूमर का फल खाये जो लाल रंग का होता है और रेशेदार होता और इसकी खुशबू बहुत अच्छी होती है कुछ-कुछ महुए जैसी (मुझे लगी). इसका उपयोग दही बनाने के लिये भी करते है. आदिवासी इसे सूखाकर फिर कूटकर पेज भी बना कर पीते है. इसका स्वाद बहुत अच्छा होता है. जरूरत के समय आदिवासी इसका उपयोग अनाज के रूप में करते है. (पेज बनाकर) इसका सब्जी (कच्चे का) भी बनता है.

सीतरम में माड़ के अन्दर जाते हुये कुछ आदिवासियों से बातचीत हुई तो उन्होंने बतलाया कि वे माड़ के अन्दर के ही एक गाँव में जा रहे हैं जो लगभग 4 कि.मी. दूर है. वहाँ के जंगल से तेन्दुपत्ता बान्धने के लिए रस्सी लाने जा रहे है जो एक पॆड़ के खाल/छाल से बनाते है. स्थानीय भाषा में पेड़ का नाम आटियों है. अभी तेन्दूपत्ता तुड़ई में समय है इसलिये पहले से तैयारी कर रहे है. ये आदिवासी मार-पखांजूर से आ रहे थे, जो कि यहाँ से बहुत दूर है.

यहाँ भुट्टे की तुड़ई लगभग हो चूकी है और दाना निकालने और बेचने का काम चल रहा है.

तेजेन्द्र

Advertisements

Make a Comment

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Liked it here?
Why not try sites on the blogroll...

%d bloggers like this: