पूर्वी पाकिस्तान में हुये दंगे की याद अभी तक बुज़ुर्गो के ज़हन में

Posted on November 5, 2008. Filed under: Hindi | Tags: , , , , , , , , , |

पूर्वी पाकिस्तान में हुये दंगे की याद अभी तक बुज़ुर्गो के ज़हन में

परलकोट क्षेत्र अपना एक अलग ही पहचान रखता है. एक तो यहाँ 133 गांव में बांग्लादेशी (पूर्वी पाकिस्तान) के लोगों को भारत सरकार द्वारा बसाया गया है जिसे परलकोट गाँव कहा जाता है और जिन्हे नम्बर से पहचाना जाता है जैसे PV133, दूसरा बंगालियों के कारण यहाँ वाम विचारधारा के लोग भी बहुत है. बाद में प. बंगाल से भी बहुत से लोग यहाँ आकर बसे और व्यवसाय किया और अभी भी कर रहे है. बहुत से ऎसे भी परिवार है जिनका कलकत्ता और पखांजूर दोनो जगह व्यवसाय है.

सन् 1971 में जब भारत और पाकिस्तान का युद्ध हुआ तब बांग्लादेश में हिन्दू-मुसलमान का दंगा हुआ और बहुत मारकाट मचा. तब पूर्वी पाकिस्तान-बांग्लादेश से बहुत से हिन्दू भागकर भारत आये. मुझे लगता है शायद इसीलिये दक्षिण पंथी पार्टीयां मुसलमानों पर आक्रमण करती है. अधिकांश बांग्लादेशी दलित थे और खेतीहर मजदूर थे. बाद में फिर भारत सरकार ने उन्हे कुछ दिनों तक देश के अलग-अलग राज्यों मैं कैम्प बना कर रखा गया और फिर उन्हें व्यव्स्थित रूप से बसाया जैसे कि छत्तीसगढ् में दण्डकारण्य प्रोजेक्ट के नाम से 133 गाँवों को बसाया गया. अविभाजित मध्यप्रदेश में पहले तो इन बांग्लादेशियों को रायपुर के पास माना कैम्प में रखा गया फिर बारी-बारी उन्हें परलकोट स्थानांतरण किया. साथ ही शरणार्थियों को 5-5 एकड़ जमीन और भारतीय नागरिकता भी दी गई. यह प्रोजेक्ट परलकोट क्षेत्र के अंतर्गत शुरू किया गया.

एक बुजुर्ग ने बातचीत के दौरान बतलाया कि-“ पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में मेरी साढ़े तीन एकड़ जमीन थी. हम लोग खेती और मजदूरी दोनो करते थे और पूर्वी पाकिस्तान के पाबना जिले में रहते थे. वहाँ हिन्दू-मुस्लिम दंगा हुआ इसलिये अब यहाँ पर रहने को मजबूर है. फिर से वापस अपने गाँव तो जाने का मन करता है लेकिन जा तो सकते नही ना. जब हम लोग यहाँ आये तब यहाँ खूब जंगल थी. सरकार ने हमारे रहने के लिये जंगल साफ कर घर बनवा कर दिया. साथ ही हमें महीनें या हफ्ते में राशन और पैसे भी मिलते थे जिसे डोल कहते है. माना कैम्प में अभी भी मिलता है लेकिन अब यहाँ लगभग बन्द हो गया.

दंगे, पाबना जिले में नही हुआ था लेकिन पूरे क्षेत्र में मुसलमानों का डर था इसलिये बहुत से लोग डर कर भाग गये, वैसे ही हम भी आये है. वहाँ व्यवस्था ठीक नही थी बहुत से हिन्दू पलायन कर रहे थे.”

जब हम लोग यहाँ आये थे तब यहाँ आदिवासी लोग हमें देख कर डरते थे. आदिवासी और हमारे बीच कभी किसी प्रकार की कोई लड़ाई नही हुई लेकिन अब होता है. महुआ को लेकर, गाय चराने को लेकर या जमीन को लेकर अब लड़ाई होता है. पहले यहाँ बाघ, भालू और हिरण थे लेकिन अब कुछ भी नही बचा है केवल चिड़िया की बचे है.

तेजेन्द्र

Advertisements

Make a Comment

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Liked it here?
Why not try sites on the blogroll...

%d bloggers like this: