परलकोट:छत्तीसगढ़ का बंगाल

Posted on November 5, 2008. Filed under: Hindi | Tags: , , , , , , , , , , , |

परलकोट: छत्तीसगढ़ का बंगाल

अप्रेल महीनें में किये परलकोट दौरे को एक छोटे यात्रा वृतांत की तरह लिख रहा हूँ. परलकोट जाने का यह मेरा पहला मौका था. कुल 990 कि.मी. की थकान भरी इस दौरे से बहुत कुछ सीखने, समझने और जानने को मिला. साथ संजय पराते जी भी थे जो सी.पी.एम. छत्तीसगढ़, सदस्य है, छत्तीसगढ़ किसान सभा के राज्य संयोजक है और राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना, भुमि समतलीकरण और ऋण माफी जैसे मुद्दों पर काम कर रहे है. संजय जी परलकोट के गाँव-गाँव में घूम-घूम कर लोगों से बातचीत करेंगे, योजनाओं की जानकारी देंगे और अप्रेल 22 तारिख के पखांजूर में एस. डी. एम. कार्यालय के सामने होने वाले धरना प्रदर्शन की जानकारी भी देंगे. परलकोट के बारे में मेरी जानकारी बहुत कम है. बस इतना पता था कि कांकेर जिला में है और महाराष्ट्र सीमा से सटा है. योजना बनी कि बाईक से ही जाया जाए. एक तो गर्मी ऊपर से लम्बी दूरी. शाम होने से पहले हम रायपुर से निकल गये. धमतरी में थोड़ी देर के लिये रूके फिर चरामा से अन्दर मुड़ गये. शार्टकट रास्ते से होते हुए केंवटी पहुंचे. केंवटी, नारायणपुर और भानुप्रतापपुर रास्ते पर है, यही से भानुप्रतापपुर के लिए मुड़ गये. बड़ी दूरी तय करने के बाद केवटी में रूके. फिर दुर्गकोन्दल पहुंचे तब तक रात के 8 बज गये थे. नारायणपुर से भानुप्रतापपुर के बीच सड़क चौड़ीकरण का काम निर्माणाधीन है इसलिए रात में गाड़ी चलाना मुश्किल है.

रात हम दुर्गकोन्दल में शक्ति डे के यहाँ रूके. चान्दनी रात थी. गर्मी बहुत थी, भला कि मच्छर नही थी. शक्ति डे यहाँ 1974 में खड़गपुर से आये और यही एक आदिवासी से शादी करके बस गये. शक्ति डे के ससुर रंजन डे 60 के दशक में यहाँ आये जब प. बंगाल में सी.पी.एम. की सरकार बनी. तभी अविभाजित मध्यप्रदेश में केन्द्र सरकार की बांग्लादेशियों को बसाने के लिये एक दंडकारण्य प्रोजेक्ट की शुरूआत हुई. रंजन डे परलकोट में वामपंथ लाने वाले पहले कुछ लोगो में थे. रंजन डे ने भी स्थानीय आदिवासी महिला से शादी की और यही बस गये थे.

दुर्गकोन्दल में कुछ परिवार बनिया और ब्राम्हण के है बाकि आदिवासी जाति के है, जिसमें गावडे, दुग्गा आदि प्रमुख है. दुर्गकोंदल और पखान्जूर में पुलिस चेकिंग पोस्ट है और शाम के बाद से ही सघन तलाशी शुरू हो जाती है. दुर्गकोन्दल से पखांजूर अब संवेदनशील हो गया है. कुछ वर्ष पहले ही इसी रास्ते में पड़ने वाले एक पुल को नक्सलियों से बम से उड़ा दिया था तभी से स्थानीय लोगों में डर बना हुआ है. इस रास्ते पर एक से दूसरे गाँव की दूरी भी बहुत है. इस रास्ते के दो बड़े गाँव बड़गाँव और कापसी अब संवेदनशील हो गया है. अखबारों से पता चला कि कुछ दिन पहले ही पखांजूर के पास ही के प्रतापपुर ब्लॉक के एक गाँव में नक्सलियों ने जनसूनवाई रखी थी और एक ग्रामीण को सजा भी दिया गया. इसके बाद से यहाँ दहशत फैला हुआ है. इसी तरह, शाम के बाद अब नारायणपुर से अंतागढ़ परिवहन बन्द है.

सुबह दुर्गकोन्दल में शूटिंग की और फिर पखांजूर के लिये निकल पड़ॆ. रास्ते भर नजरें उस सुनसान सड़क पर रही जिसके लिये दहशत रहती है. जैसे-जैसे हम पखांजूर की तरफ बढ़े भुट्टॆ के खेत दिखाई पड़ने लगे. मैंने इतने बड़े पैमाने पर भुट्टे की खेती कभी नही देखी थी. पखांजूर क्षेत्र भुट्टे के उत्पादन के लिये प्रसिद्ध है और बहुत सा भुट्टा नागपुर/महाराष्ट्र के पोल्ट्री फार्मों में निर्यात होता है. यहाँ लोग सम्पन्न है और आधुनिकतम जरूरत के सभी सामान लोगो के पास है. छत्तीसगढ़ के पूरे आदिवासी क्षेत्र में बस्तर का यही एक ऎसा क्षेत्र है जहाँ सम्पन्नता है. भुट्टे के साथ-साथ यहाँ फल और सब्जिय़ों की भी पैदावारी होती है. जिसे भी छत्तीसगढ़ के अन्य जिलों में निर्यात किया जाता है.

पखांजूर कांकेर जिले के अंतर्गत आता है. असल पखांजूर, मार-पखांजूर है जो पखांजूर से लगभग 40 किमी की दूरी पर महाराष्ट्र सीमा पर है. पखांजूर, परलकोट क्षेत्र का एक कस्बाई शहर है जहाँ बंगाली परिवार की अधिकता है और यह प्रमुख व्यवसायिक क्षेत्र है. परलकोट क्षेत्र में स्थानीय आदिवासी गोंड़ी और हल्बी बोलते है और अन्य भाषा में बंगाली है.

दुर्गकोन्दल और आसपास के गाँवों में आन्ध्रप्रदेश से आये कुछ परिवार, स्थाई और अस्थाई रूप से बसकर शल्फी और छिन्द रस का व्यवसाय कर रहे है. ये लोग छिन्द या शल्फी के पेड़ को कुछ सौ रूपये देकर सालभर के लिये ले लेते है और फिर साल भर उस पेड़ से इतना रस निकाला जाता है कि कुछ पेड़ तो साल भर के अन्दर ही सूखकर मर जाते है. शल्फी के पेड़ को सूर भी कहते है. छिन्द का पेड़ छोटा होता है और शल्फी का पेड़ बड़ा होता है. परलकोट में बसे बंगाली परिवार (पूर्वी पाकिस्तान अब बांग्लादेश से आये) इसके रस को निकालने की सही विधि जानते है वही स्थानीय आदिवासी नही जानते. आदिवासी इससे रस तभी निकालते है जब यह पेड़ बड़ा हो जाता है और वह भी सीधे पेड़ के उस स्थान से जहाँ से निकालने पर कुछ ही वर्षो में पेड़ मर जाता है. लेकिन बंगाली किसान शल्फी के लगभग तीन फीट बड़े होने के बाद से ही रस निकालना शुरू कर देते है और निकालने का तरिका भी अलग है. ये पहले एक तरफ से काटते हैं फिर अगले साल दूसरे तरफ से. ऎसे में उन्हे रस भी बहुत मिलता है और पेड़ की आयु भी बनी रहती है. शल्फी के पत्ते को अगर शल्फी में डुबो कर रखे तो कई दिन तक उसे बिना खराब किये रखा जा सकता है. फ्रिज में रखने से ठंडा भी रहता है और कुछ दिन तक खराब भी नही होता.

छिन्द रस से गुड़ बनता है और अगर सरकार चाहे तो इसे एक कुटीर उद्योग का रूप दे सकती है. यहाँ पोईफल की एक सब्जी उगती है जिसे यहाँ बड़े चाव के साथ खाया जाता है, ज्यादातर इसे बंगाली परिवार ही खाते है.

दुर्गकोन्द्ल क्षेत्र में सी.पी.आई और सी.पी.एम का कुछ प्रभाव है. देवीलाल दुग्गा, भारतीय जनता पार्टी से विधायक है और वर्तमान में संसदीय सचिव के पद पर है. इस पूरे आदिवासी अंचल में चुनावी दिक्क्ते भी बहुत है. पैसे और शराब का खुला खेल यहाँ खेला जाता है और आदिवासी भी सभी पार्टीयों से मजे लेती रहती है.

शक्ति डे ने बतलाया कि जब खड़गपुर में दुनिया की सबसे बड़ी रेल्वे स्टेशन बन रही थी तब प. बंगाल में स्थानीय लोगों ने डर के कारण यहाँ नौकरी नहीं की, तब दक्षिण भारतीय और छत्तीसगढ़ के बहुत से लोग वहाँ नौकरी करने आये और अब तो वही स्थाई रूप से बस गये है. रेल्वे में नौकरी को लेकर डर के मामले में वहाँ भी शायद ऎसी ही स्थिती रही होगी जैसे यहाँ भिलाई इस्पात संयंत्र के शुरू होने के समय थी. खड़गपुर में छत्तीसगढ़ी कॉलोनी और मोहल्ले भी हैं.

अप्रेल में अभी शादीयों का मौसम है, जगह-जगह शादी, शादी की तैयारी और सामाजिक उत्सव का माहौल बना हुआ है. जब रात दुर्गकोन्दल रूके थे तब भी किसी के यहाँ शादी हो रही थी लेकिन जिस बात ने दुखी किया वह यह था कि पारम्परिक गीत-गाना-बजाना का न होना. अब यह मात्र औपचारिकता ही रह गई है. मैंने अपने इस 8 दिन के इस दौरे में किसी भी प्रकार का पारम्परिक गीत-संगीत नही सुना. जो बज रहा था वह या तो सी.डी. था या फिर आधुनिक बैंड. खैर, पखांजूर पहुंचे. हम मिहिर राय के यहाँ रूके. फिर एक हफ्ता उन्हीं के घर रहे और परलकोट के बहुत से गाँवों में हमने दौरे किये.

तेजेन्द्र

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