शंकर की जीत

Posted on November 2, 2008. Filed under: Hindi | Tags: , , , , , , |

शंकर की जीत

पिछले दो सालों में 28 सितम्बर को दल्ली-राजहरा जाकर मैने यह देखने और समझने की कोशिश की कि जिनके बारे में लम्बे समय से सुनते चला आ रहा हूं (छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा और कामरेड स्व. शंकर गुहा नियोगी) कभी गया नहीं और कभी सोचा भी नहीं. वहां जाने के बाद पहली बार इस दिन ने मुझे बहुत कुछ सोचने और समझने के लिये झिंझोड़ा. जो पहली बात मेरे मन में आई वह यही थी कि इतने सारे मजदूर और किसान क्यों किसी की शहादत दिवस पर जमा हो रहे हैं. इसलिये, समय-समय पर पढ़ना और ध्यान देना शुरू किया. अच्छा यह भी हुआ कि स्थानीय समाचार पत्र पर लेख, साक्षात्कार और बहसें भी पढ़ने को मिली.

हालांकि छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा आज तीन हिस्सों में और बहुत से उप हिस्सों में अलग-अलग लोगों द्वारा संचालित है लेकिन फिर भी दूर-दूर से जो लोग आते हैं वे नि:सन्देह वर्तमान नेता या मुखिया के कारण नहीं बल्कि कामरेड शंकर गुहा नियोगी के कारण ही आते हैं.

अभी तक हम रैली या भीड़ के नाम पर राजनैतिक और धार्मिक भीड़ ही देखते आये हैं लेकिन दल्ली-राजहरा की यह भीड़ ऎसी नही है. 17 साल बाद भी हजारों लोग एक ऎसे व्यक्ति को श्रद्धांजलि देने आते है जो उनके लिये तो अब कोई करिश्मा नही कर सकता लेकिन आस आज भी बरकरार है. हर साल की तरह आज भी शहादत दिवस पर दूर-दूर से मजदूर और किसान आये हैं अपने पुराने कामरेड नियोगी को श्रद्धांजलि देने.

लेकिन यह साल पिछले साल की तरह नहीं रहा और परिस्थितियां बदली हुई लगी. दल्ली-राजहरा में छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा कहीं न कहीं उद्देश्य से छूटे और मुद्दाहीन नजर आये. पिछले साल की अपेक्षा भीड़ इस बार लगभग आधी रही. किसी ठोस एजेंडा और करिश्माई व्यक्तित्व वाले नवयुवक नेता की कमी महसूस की जा रही है.

छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष और पूर्व विधायक श्री जनक लाल ठाकुर जी इसके पीछे अन्य राजनैतिक दल और नवयुवकों को मानते है. उनका मानना है कि नौजवान संगठित नही है, वे भटक गये हैं और उपभोक्तावादी हो गये है वगैरा वगैरा. लेकिन ताज्जुब होता है कि शंकर गुहा नियोगी के पुत्र जीत गुहा नियोगी एक नई जन संगठन (जन मुक्ति मोर्चा) बना कर इन्हीं नौजवानों को संगठित कर रहे है और आगे बढ़ रहे है.

जन संगठन और राजनीति की बातों को भारतीय इतिहास के सन्दर्भ में जब मैं मोटे तौर पर देखता/सोचता हूं तो लगता है कि ब्रिटिशकाल और आपातकाल, एक अन्धकार युग था. एक लम्बे समय के लिये और एक बहुत कम समय के लिये. लेकिन भारत के लिये बहुत महत्वपूर्ण घटना. इसी को थोड़ा एक दूसरे से जोड़ कर सोचता हूं तो ऎसा लगता कि फिर से एक बड़े परिवर्तन का एक दौर आयेगा.

वर्तमान में छत्तीसगढ़ में नवयुवकों का यदि कोई संगठन है तो वह है जन मुक्ति मोर्चा और यह लोकतांत्रिक तरीके से चल रहा है. जीत गुहा नियोगी के साथ ऎसे नौजवान हैं जिन्होंने कभी शंकर गुहा नियोगी को देखा-सुना नही है. बहुत से आज के नौजवान आपातकाल के (1975-1977) समय या उसके आसपास पैदा हुये (सत्तर के अंत में).

आपातकाल ने उस समय के नौजवानों की पत्रकारिता और राजनीतिक सोच ही बदल कर रख दी. लेकिन आपातकाल के समय या बाद में पैदा हुए लोगों ने इन तीस सालों में इस तरह का ऎसा कोई बड़ा घटनाक्रम वाला राजनैतिक दौर नही देखा है. आजादी की कहानी की तरह हम केवल सुनते रहे. बाद का जो परिवर्तन था, वह था नरसिम्हा राव का उदारीकरण और फिर भाजपा का हिन्दुत्ववाद. आज नौजवानों को इसी ने सबसे ज्यादा जकड़कर रखा है. तीस सालों में देश के अलग-अलग हिस्सों में बहुत सी घटनायें हुई लेकिन परिवर्तन लाने की हद तक कोई बहुत बड़ा आन्दोलन नही हुआ. सभी जनसंगठनें अपने-अपने क्षेत्र में अपने-अपने स्तर पर संघर्ष करती रहीं. आज का नौजवान कहीं न कहीं आपातकाल के दौर के अपने-अपने क्षेत्र के एंग्री यंगमैन की तरफ मुंह फाड़े देखते नजर आते है.

बहुत से जन संगठन अब धीरे-धीरे एन.जी.ओ. हो गये है और उसी को जन संगठन साबित करने में लगे हुये है. एन. जी. ओ. के नौजवानों को बिल्कुल दूसरी तरह का प्रशिक्षण मिल रहा है. छत्तीसगढ़ के बहुत से जनसंगठन रायपुर, भोपाल और दिल्ली में बैठक कर गहन विषयों (ग्रामीण और आदिवासी विषयों पर) पर गहन चर्चा करते रहते है!!!!!!

छत्तीसगढ़ में वर्तमान में राजनीति की कोई नर्सरी दिखती नही है. किसी भी प्रकार की छात्र राजनीति यहाँ नही हो रही है. लेकिन दल्ली-राजहरा क्षेत्र में जो नौजवानों की भीड़ (जन मुक्ति मोर्चा) मैंने देखी, वह किसी राजनैतिक दल की रैली या नवरात्रि या बोलबम की भीड़ नही थी बल्कि नौजवानों की अनुशासित संकल्प रैली थी. उनमें बेरोजगार थे, किसान थे और मजदूर थे. किसी जन संगठन की शैशवास्था को देखना हो तो फिर से दल्ली-राजहरा जाना चाहिये.

इस युवा जनसंगठन को देखकर अन्य राजनैतिक पार्टियों की ओर भी ध्यान जाता है, छत्तीसगढ़ में खासकर भाजपा और कांग्रेस की ओर. लेकिन इन पार्टियों के क्षेत्रीय या राष्ट्रीय सुप्रीमो द्वारा जाति और वर्ग के आधार पर युवा शक्ति को बढ़ावा दिया जा रहा है. इन पार्टियों के अधिकतर युवा अपने वरिष्ठ आकाओं की चापलूसी करती ही नजर आती है. इनके युवा संगठनों की अपनी कोई स्पष्ट युवा नीति नहीं दिखती.

दूसरी तरफ जैसे-जैसे छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा जैसा जन संगठन, ऎसा लगता है धीरे-धीरे बिखर और सिमट रहा है वैसे ही वैसे जन मुक्ति मोर्चा धीरे-धीरे नवयुवकों के नस-नस में ताजे खून की तरह दौड़ और फैल रहा है. कामरेड शंकर गुहा नियोगी के शहादत के 17 साल बाद आज एक नया नेतृत्व पूरी शक्ति के साथ सामने आ रहा है. प्रश्न यह उठता है कि क्यों आज नौजवान उनके साथ है और एकजुट हो रहे है. आज जब कांगेस, भाजपा और उनकी ढेर सारी योजनायें पंचायत और नगरीय नौजवानों को (जातिगत भी) लुभा रही हो तो क्यों फिर लोग जन मुक्ति मोर्चा की अगुवाई में एकजुट हो रहे हैं.

जन मुक्ति मोर्चा की रैली की शूटिंग करने जब मैं रात को एक गांव “अछोली” पहुंचा, जहां जीत गुहा नियोगी अपने सैकड़ों साथियों के साथ पहुंचने वाले थे, माहौल गर्मजोशी का था. अछोली और आसपास के गांव के 40-50 युवक जमा हो चुके थे. स्वागत और खाने-पीने की व्यवस्था की तैयारियाँ चल रही थी.

रैली के नजदीक पहुंचने की खबर सुनते ही सभी सक्रिय हो गये. दूर से ही “इंकलाब जिंदाबाद” और “कामरेड शंकर गुहा नियोगी अमर रहे” जैसे नारों की गूंज सुनाई दे रही थी. जैसे-जैसे अन्धेरे को चीरते रैली पास आने लगी जोश बढ़ता गया. बहुत से साथी खराब सड़क और बिजली नहीं होने के कारण चोटिल हुये. लेकिन जोश में कही कोई कमी नहीं थी. यहाँ के नवयुवक जिस तरह से जीत की अगुवाई करने को तैयार हैं उसे देखना ही अपने आप में रोमांचक था.

थोड़ी देर बाद सड़क पर ही दरी बिछा कर लोग कतार में बैठे खाना खाये. सभी काम नौजवान ही कर रहे थे, दूसरे दिन सुबह फिर से रैली शुरू हुई. जीत गुहा नियोगी को उम्मीद थी कि इस रैली में वर्तमान से तीन गुना लोग शामिल होते, चूंकि यह साईकिल रैली थी, महिलायें और बुज़ुर्ग शामिल नहीं हो सके. दल्ली-राजहरा के पहुंचते तक यह संकल्प साईकिल रैली नुमा नदी, विशाल जन सभा रूपी समुद्र में मिल जाने वाली है.

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2 Responses to “शंकर की जीत”

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भाई साहब नियोगी जी की छोटी लड़की मुक्ति, उनके नाम को खराब कर रही है बडी विडम्बना है दल्ली आओ और भिखारियों से

पूछो उसके बारे में, नियोगी का जनवाद अब पूंजीवाद में बदल चुका है

aap ne uper jo bhikhari sabd ka estemal kiya hai esase saf jahir hota hai ki aap mansik diwaliye pan ke sikar hai ,
aap swayam aapne bap ke kitne adarsho ka palan karte hai,
aap ka jawab dene me der kardi maine ?


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