अब झालर भी बिकने लगे!!

Posted on February 20, 2008. Filed under: Hindi | Tags: , , , , , , , , , |

अब झालर भी बिकने लगे!!

पिछले साल नवम्बर-दिसम्बर में भिलाई में मैंने धान का झालर (खरीफ की फसल कटाई के समय
अगहन महिने से पहले धान की बालियों से बनाये जाने वाला एक प्रकार का डिज़ाईन) बिकते
देखा, मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि क्या अब ये भी बिकने लगेंगे!!! भिलाई में रहते मुझे तकरीबन
25-26 साल हो गये है और यह पहली बार था जब मैंने सड़को में झालर बिकते देखा है. इसकी
चर्चा जब मैने दिल्ली से पढ़ कर आये अपने भाई से की तो उनसे बतलाया कि दिल्ली में भी
उसने झालर बिकते देखा है.

धार्मिक रूप से झालर का महत्व अगहन मास में होता है और इसकी अनेंक डिज़ाईनें भी होती
हैं. हमारे गाँव में एक खास प्रकार की झालर बनतीं हैं. अन्य गाँवों से ब्याह कर आईं
स्त्रियाँ अपने साथ और भी प्रकार की डिज़ाईनें लेकर आईं. इस तरह से चार प्रकार की
डिज़ाईन तो मेरे ही गाँव में देखी जा सकती है. झालर को ग्रामीण- आंगन में, छतों में या
पूजा कमरे में सजा कर रखते है. घरेलू चिड़िया आकर इसका दाना चुगती है.

झालर बनाना भी एक कला है जो तेजी से खत्म होती जा रही है. शहर से सटे गाँवों में तो
अब यह बन्द ही हो गया है.

अपने ही गाँव में मैने बहुत सी चीजों को धीरे-धीरे मिटते और खत्म होते देखा है लेकिन पिछले
साल दो साल भर में जो परिवर्तन आया है वह किसी बुरे सपने से भी कम नही हैं.
मशीनीकरण से क्रांति भले ही आई हो लेकिन बहुत से नुकसान भी हुये है और बहुत सी बातें कब
खत्म हो गई पता ही नही चल पाया.

मुझे याद है, बचपन में जब हम शीतकालीन की छुट्टी में फसल कटाई या मिंजाई के समय गाँव
जाते थे तब बेलन में बैठने के साथ-साथ खेतों के मेढ़ों पर बैठ कर बेर, तिवरा, मटर और चना
बूट आदि तोड़कर खाने का मजा ही कुछ और होता था.

हर साल की तरह इस साल भी हम उम्मीद कर रहे थे कि बेर, तिवरा खायेंगे लेकिन जब गाँव
पहुँचे तब तक कटाई हो चुकी थी. इस बार पहली बार हमारे गाँव में हार्वेस्टर से धान की
कटाई हुई (बनिहारों/मजदूरों का नही मिलना इसकी एक बहुत बड़ी वजह रही) और सस्ता
भी साबित हुआ. महिने दो महिने का काम कुछ ही घंटों में हो गया और धान बेचकर किसानों
को पैसे भी जल्दी मिल गये. पहले तो कटाई से लेकर बेचने तक में 4-5 एकड़ वालों को महिने
भर से ज्यादा का समय तो लग ही जाया करता था. लेकिन हार्वेस्टर आया और समय से बहुत
ज्यादा पहले ही काम खत्म हो गया. हमारे गाँव के लिये यह किसी क्रांति से कम नही है.
जब हार्वेस्टर चलता है तो ग्रामीणों की भीड़ लग जाती है.

फसल कटाई और बेर-तिवरा के बीच का अंतर अब महिनों का हो गया है. हम पहुँचे तो समय
पर थे लेकिन परम्परागत फसल कटाई नही होने की वजह से पूरा दृश्य बदला हुआ था.
हार्वेस्टर के आने से हफ्तों-महिनों का काम घंटो में होने लगा और पूरा समयचक्र बदल गया.

बढ़ौना (कटाई खत्म होने की खुशी में मनाया जाने वाला किसानों का स्थानीय उत्सव)
किसानों के लिये एक बड़ॆ त्योहार की तरह हैं जिसमें लाई, बताशा, नारियल प्रसाद के रूप
में सभी के घर बांटा जाता है. इस बार पहले की तरह नही मना, थोड़ा बहुत मना भी तो
केवल औपचारिकता भर के लिये. किसानी सम्बन्धित बहुत से शब्द जैसे कलारी, चपरासी और
रावन जैसे शब्द तो अब लुप्त ही हो गये है.

मेरा गाँव “मन्दलोर” नई राजधानी की सरहद से लगा हुआ है. यह पूरा क्षेत्र कुछ ही वर्षो
में पूरी तरह से बदल जायेगा और आसपास के गाँव नई राजधानी की एक श्रमिक बस्ती हो
जाने वाली है. भिलाई में रहते हुये मुझे अच्छी तरह से पता है कि रेल्वे पटरी के एक तरफ की
जिंदगी और दुसरे तरफ की जिंदगी कैसी है.

फिर मुझे याद आने लगा कि पिछले दफे जब मेरा दिल्ली जाना हुआ था तब एन.डी.टी.वी.
की सिनियर कैमरा पर्सन रही नताशा बधवार जी मुझे अपने घर ले गई जो ग्रेटर नोऎडा,
उत्तरप्रदेश में रहतीं है. नई दिल्ली में जहाँ मैं ठहरा था वहाँ से इनका घर कोई 40-50
कि. मी. की दूरी पर है. नई दिल्ली से ग्रेटर नोऎडा के रास्तें में गाँव और खेत देखे जा
सकते है लेकिन साथ ही दिल्ली से बाहर निकलते ही निर्माणाधीन लम्बी-चौड़ी सड़कें,
बड़े-बड़े कॉम्पलेक्स, रिहायशी मकानें और कॉलोनीयाँ भी देखीं जा सकतीं है. मैने रास्ते भर में
जो गाँव देखे ऎसा लग रहा था मानों अपनी ही जगह पर उजाड़ पड़े हुये है. जैसे किसी युद्ध
के अंत का दृश्य हो. इस अतिक्रमण की (भले ही मुआवजे मिलें हो) की पीड़ा गहरे तक वहाँ के
ग्रामीणों के चेहरों पर देखी जा सकती है. गाँवों-कस्बों को उज़ाड़-उज़ाड़ कर हाईवे और
रिहायशी मकानें बनाई जा रही थी. पूरे रस्ते, मैं असहज सा रहा और उस समय मुझे इस बात
का सन्तोष तो था कि मेरे गाँव में ऎसी स्थिति आने में अभी बरसो लगेंगे.

लेकिन अब मुझे भय होने लगा है. रायपुर के पास नई राजधानी का काम शुरू होने जा रहा
है. इस सैकड़ों एकड़ जमीन में क्या बनने वाला है और आसपास के कई गाँव दशक भर बाद क्या
हो जायेंगे इसका अन्दाजा मुझे और इन गाँव वालों को भी नही है.

भिलाई और दिल्ली की तरह यही के लोग, इन्ही सड़कों पर झालर बेचते दिखेंगे.

तेजेन्द्र ताम्रकार

18-02-2008

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4 Responses to “अब झालर भी बिकने लगे!!”

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धान के झालर मुझे भी अच्छे लगते हैं. मेरे घर में हमेशा 1-2 टंगे ही रहते हैं.

बडे बुर्जुगों से सुनते थे कि ‘तईया के बात ला बईहा लेगे’
तो विश्‍वास नहीं होता था । अब यही हो रहा है, धीरे धीरे
आधुनिकता ग्रामीण संस्‍कृति को लील रही है ।
मोर संग चलव रे की जगह मोला झोल्‍टू राम जन गीत
बन गया है, तेजेन्‍द्र जी हम अपनी पहचान खो रहे हैं
ऐसे में ये झालर में समाहित हमारी आत्‍मा ही हमारे
पास रह जायेगी ।

संजीव

आप ला सक्रिय देख के दिल खुस हो गे हवे। झालर के फोटू लगाना रीहीस ना। अब दिल्ली वाला मन नही जाने ये कइसे दिखथे। वैसे लिखे बढिया हस।

Good. Likhte raho.


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