छत्तीसगढ़ के संस्कृत कवि

Posted on December 8, 2007. Filed under: About Chhattisgarh |

छत्तीसगढ़ के संस्कृत कवि
श्री हरि ठाकुर

जनश्रुति के अनुसार वैदिक युग के महान ऋषि वशिष्ठ, अंगीरस, ऋग्ड़ी, और वाल्मिकी के छत्तीसगढ़ मे आश्रम थे. वे इस क्षेत्र मे केवल तपस्या के लिए ही नही, आर्यधर्म और संस्कृति के प्रचार के लिये भी आये और यहीं निवास करने लगे. ऋग्वेद वेदों में सबसे अधिक प्राचीन है. वशिष्ठ और अंगीरस का ऋग्वेद के प्रमुख रचनाकारों मे स्थान है. ऋग्वेद के सप्तम मंडल के रचयिता वशिष्ठ ही थे. वाल्मिकी तो आदि कवि ही है. उन्होने रामायण की रचना की और रामकथा को सारे देश में प्रचार किया. यह संस्कृत साहित्य की अनुपम निधि है. आगे चलकर उनके इसी ग्रंथ से प्रेरणा लेकर रामकथा के आधार पर न जाने कितने ग्रंथो का निर्माण हुआ और साहित्य के श्रीवृद्धि हुई.
छत्तीसगढ़ के इतिहास मे रामगिरि पर्वत (सरगुजा) जिला का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है. वशिष्ठ का आश्रम इसी पर्वत था. ‘कल्याण कारक’ नामक वैद्यता ग्रंथ के रचयिता श्री उग्रादित्याचार्य इसी पर्वत पर निवास करते थे. वे जैन धर्मावलम्बी थे. बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन ने भी अनेक ग्रंथो की रचना की. चीनी यात्री हुएनसांग ने छत्तीसगढ़ को नागार्जुन का देश कहा है. छत्तीसगढ़ उस समय कौशल के नाम से प्रसिद्ध था. नागार्जुन के ग्रंथ आज से 1600 वर्ष पुर्व चीनी भाषा मे अनुवाद भी हुआ था.
छत्तीसगढ़ मे उपलब्ध अनेक शिलालेखों और ताम्रपत्तों मे हमे अनेक विद्वान कवियों और उनके ग्रंथों का उल्लेख मिलता है. कुछ शिलालेख ऐसे है जिनमें इन कविताओं की काव्य प्रतिमा का हमें अच्छा परिचय मिलता है.
भास्कर भट्ट
पांचवीं शताब्दि मे भास्कर भट्ट नामक कवि छत्तीसगढ़ मे हुये. इनकी काव्य-प्रतिभा का परिचय हमें पान्डुवंशीय भवदेव रणकेसरी के शिलालेख में मिलता है. भवदेव बौद्ध धर्मावलम्बी थे और भास्कर भट्ट के सम्भवत: उनका राजाश्रय प्राप्त था. पूरा लेख पढ़्ने से भास्कर भट्ट की विद्वता स्प्ष्ट झलकती है.

ईशान कवि
छ्त्तीसगढ़ के इतिहास मे महाशिवगुप्त बालार्जुन का नाम अमर है. बालार्जुन अत्यंत प्रतापी शासक थे. उन्होने अपने शासन काल मे वैष्णव और बौद्ध धर्म को आश्रय दिया. वे स्वयं शैव मतावलम्बी थे. उनके समय मे अनेक विद्वान सिरपुर मे थे. चीनी यात्री हुएनसांग बालार्जुन के समय ही सिरपुर आया था. ऎसा कुछ विद्वानो का मत है. कवि ईशान इसी बालार्जुन के राजाश्रय मे थे. ईशान ‘चिंतातुरांक’ उपनाम से भी काव्य रचना करते थे.

सुकवि-अल्हण
छत्तीसगढ़ मे दसवीं शताब्दि के लगभग हैहयवंश ने अपना प्रभुत्व बढ़ा लिया. हैहयवंशी शासन काल मे अनेक विद्वान कवि और कलाकारों को आश्रय प्राप्त था. पृथ्वी देव प्रथम के शासन काल में अल्हण सुप्रसिद्ध विद्वान कवि थे. अल्हण का समय भी दसवीं शताब्दि का मध्य माना जाता है. कवि अल्हण ईश्वर के अनन्य भक्त थे. वे गर्भ नामक ग्राम के स्वामी थे. सम्भवत: यह ग्राम पृथ्वी देव उन्हे उनकी काव्य प्रतिभा और विद्वत्ता के सम्मान मे दिया था.

कीर्तिधरग्यारहवीं शताब्दि के आरम्भ मे कीर्तिधर नामक प्रसिद्ध कवि हुए. वे गौड़ कायस्थ थे. उस समय जाज्ल्ल्देव का शासन था. कीर्तिधर के पुत्र वत्सराज भी अच्छे कवि थे. वे जडेर गाँव मे रहते थे. वत्सराज के पुत्र धर्मराज भी कवि थे.

कवि मल्हण
सन् 1144 के एक ताम्रपत्र मे कवि मल्हण का उल्लेख है. कवि मल्हण पृथ्वीदेव द्वितीय के शासन काल मे थे. पृथ्वीदेव द्वितीय के शासनकाल में अनेक कवियों और विद्वानों का उल्लेख मिलता है. कवि मल्हण के पिता का नाम शम्भुकर था. मल्हण कवि के रूप मे अत्यंत प्रसिद्ध थे. उन्होने अनेक ग्रंथो की रचना की. उनके विषय मे लिखा गया है कि वे कमल रूपी कवियों के मध्य भ्रमर के तरह लोकप्रिय थे.
कवि नारायण
सन् 1150 ई. के लगभग कवि नारायण हुये. वे विष्णु के भक्त थे. उन्होने सुन्दर और सरस ‘श्री रामाभ्युदय’ नामक ग्रंथ की रचना की. कवि के रचना कौशल पर स्वयं सरस्वती मुग्ध थीं. कवि नारायण ने अपने समकालीन गोपाल-देव की चर्चा की है. जो संस्कृत और प्राकृत के बड़े विद्वान थे.
देवगण
इसी काल मे देवगण नामक कवि भी हुए. सन् 1150 के एक शिलालेख मे कवि का परिचय उपलब्ध हुआ है. देवगण का जन्म कायस्थ वंश मे हुआ था. देवगण के पिता का नाम रत्नसिंह, पितामह का नाम मामे और प्रपितामह का नाम गोबिन्द था. गोबिन्द चेदिदेश से तुम्मान आये थे. कवि देवगण के पिता रत्नसिंह भी अच्छे विद्वान और कवि थे. रत्नसिंह कश्यप और अक्षपाद के न्यायसिद्धांत के मर्मग्य थे. देवगण की माता का नाम रम्भा था.
देवगण को विद्वता का समुद्र कहा गया है. उन्होने अपनी विद्वता और तर्कशक्ति से प्रतिपक्षी विद्वानों के घमंड को चूर कर दिया और उनकी ख्याति चारों ओर फैल गयी. देवगण की वाणी मे इतना चमत्कार था कि विद्वान लोग भी उनकी वाणी को सुनने के लिये उत्सुक रहते थे. देवगण छ्न्दशास्त्र, अलंकारशास्त्र, शब्दशास्त्र और कामशास्त्र के भी अच्छे विद्वान थे.
इसी काल मे एक देवपाणी नामक कवि का भी उल्लेख मिलता है.
त्रिभुवनपाल
पृथ्वीदेव द्वितीय के शासन काल मे ही त्रिभुवनपाल कवि भी प्रख्यात थे. उनके पिता अनन्तपाल भी अच्छे विद्वान और कवि थे. त्रिभुवन कवि अनेक कलाओं मे निपुण तथा विद्वान थे. वे गौड़ वंश मे उत्पन्न हुये थे.

नागनाथ
राजा वराहेन्द्र के शासन काल में नागनाथ नामक विद्वान कवि कर्नाटक से आये थे. वराहेन्द्र राजा ने उन्हे राजाश्रय दिया. नागनाथ ने दुर्गादेवी की प्रशस्ति रचकर सुनाई जिससे प्रसन्न होकर राजा ने उसे बहुमुल्य हाथी भेट किया था.
चन्द्राकर कविइसी राजा के समय चन्द्राकर नामक अच्छे कवि हुये. जो अन्यत्र से आकर कोसंगा (केसगई) मे बस गये और उनकी कवित्व प्रतिभा के सम्मान मे कोसंगा किले के अधिकारी घाटमदेव ने उन्हे गाय, बछ्ड़े तथा स्वर्ण वस्त्रादि भेंट किये.
चक्रपाणि मिश्रसम्बलपुर के राजा बलिहारसिंह के शासन काल में कवि चक्रपाणि का जन्म हुआ था. राजा बलिहारसिंह का शासन काल 1648 से 1698 तक था. चक्रपाणि मिश्र ने संस्कृत मे ‘कोसलानन्द काव्यम’ की रचना की. बस्तर में पन्डित भगवान मिश्र भी संस्कृत के अच्छे कवि हुए. वे मैथिली थे तथा बस्तर के महाराजा के राजगुरू थे.

रेवाराम बाबू
रतनपुर के रेवाराम बाबू का जन्म सन् 1813 में हुआ. उनके प्रपितामह का नाम महंतराय, पितामह का नाम शिवसिंह, पिता का नाम जगतराम था. माता का नाम सीता था. उनकी पत्नी का नाम फुन्दरीबाई था. बाबूजी जैमिनी गोत्र के कायस्थ थे. उनकी मृत्यु सन् 1873 मे हुआ. बाबूजी जगदम्बा के अनन्य भक्त थे. वे संस्कृत, ब्रजभाषा, उर्दु और फारसी के अच्छे विद्वान थे. वे संगीत शास्त्र के भी अच्छे मर्मज्ञ थे. संस्कृत मे उन्होंने 1. रामायण सार दीपिका, 2. ब्राम्हण स्तोत्र, 3. गीतमाधव, (महाकाव्य) 4. नर्मदाष्टक और, 5. गंगालहरी काव्य ग्रंथो की रचना की. ‘गीत माधव’ महाकाव्य महकवि जयदेव के ‘गीत गोविन्द’ से प्रेरित होकर लिखा गया है. यह ग्रंथ अपने माधुर्य के लिए प्रसिद्ध है. यह ग्रंथ उन्होंने सन् 1854 मे समाप्त किया.

रघुबरदयाल
आचार्य कवि रघुबरदयाल का जन्म दुर्ग में सन् 1815 मे हुआ था. उनके पिता का नाम दलगंजन साव था. दलगंजन साव भी संस्कृत के अच्छे विद्वान तथा कवि थे. रघुबरदयालजी संस्कृत तथा ब्रजभाषा के बहुत बड़े विद्वान थे. उन्होने संस्कृत में ‘छ्न्द रत्नमाला’ नामक ग्रंथ लिखा. रघुबरदयालजी के मृत्यु सन् 1895 मे हुई. उनके पुत्र दशरथलाल जी भी अच्छे कवि थे. उन्होने भी अनेक ग्रंथ लिखे.

पंडित लोचनप्रसाद पान्डॆय
पंडित लोचनप्रसाद पान्डॆय संस्कृत ही नही, हिन्दी, अंग्रेजी, ब्रजभाषा, बंगला और उड़िया के भी विद्वान और कवि थे. इस देश के प्रमुख पुरातत्वविदों मे उनका नाम श्रद्धापुर्वक लिया जाता है. द्विवेदी-युग मे उन्होने इस क्षेत्र की खड़ी बोली की अद्वितीय सेवा की. उन्होने हिन्दी, अंग्रजी, उड़िया, ब्रजभाषा और छत्तीसगढ़ी मे लगभग 25 ग्रंथो की रचना की. संस्कृत में उन्होने अनेक पद्य रचे. अनेक ग्रंथो का सम्पादन किया. पांडेयजी का जन्म सन् 1886 मे बिलासपुर जिले के बालपुर ग्राम मे हुआ था. उनके पिता का नाम चिंतामणि पांडेय तथा माता का नाम देवहुती था. आपकी प्राम्भरिक शिक्षा बालपुर मे ही हुई. 1902 मे सम्बलपुर से मिडिल की परीक्षा पास की तथा 1905 मे मैट्रिक की परीक्षा कलकत्ते से पास की. 1905 से ही आप राष्टीय भावनाओं के पोषक हो गये. ‘मचा दो गुल-हिन्द मे यह घर-घर, स्वराज लेंगे-स्वराज लेंगे’ कविता 1905 में ही उन्होने लिखी थी. पांडेयजी का सम्पूर्ण परिवार साहित्यिक है. उनके अनुज पंडित मुकुटधरजी छाया बाद के प्रवर्तकों मे से एक थे.
इन कवियों और विद्वानों की रचनाओं से स्पष्ट है कि छ्त्तीसगढ़ की साहित्य परम्परा शुन्य नही थी. प्राचीन काल मे, इस क्षेत्र मे भी अनेक विद्वानों और साहित्यकारों ने जन्म लेकर इस क्षेत्र का गौरव बढ़ाया है. उपरोक्त विवरण से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह क्षेत्र हमेशा से (ही) पिछ्ड़ा हुआ नही था. यहाँ के राजाओं ने हमेशा विद्वान कवियों तथा कलाकारों को राजाश्रय दिया और उनके समय में साहित्य तथा कला की पर्याप्त समृद्धि हुई. यह बात सही है कि इस काल के कवियों और साहित्यकारों के ग्रंथ उपलब्ध नही होते, वे समय-धुलि में कही खो गये किंतु जो भी अवशेष मिलते है वे उपरोक्त कथन की पुष्टि करते है.

नव भारत के दीपावली विशेषांक मे प्रकाशित, संवत 2021 (सन् 1965)

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