किशोर साहू- एक बहुआयामी कलाकार

Posted on November 18, 2007. Filed under: Article after shoot |

यदि किसी एक व्यक्ति में नायक खलनायक, चरित्र अभिनेता, निर्माता, निर्देशक और लेखक बनने की क्षमता हो तो ऎसे बहुआयामी कलाकार के समक्ष हमें नतमस्तक होना ही होगा. भारतीय फिल्माकाश से जो ध्रुव नक्षत्र अब से 23 वर्ष पुर्व विलुप्त हुआ था वह किशोर साहू ही था, जिनके व्यक्तित्व में ये तमाम खूबियाँ समाहित थी. राजनान्दगांव में प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त तथा नागपुर में उच्च शिक्षा के साथ-साथ नाटक अभिनीत करने की कला में पारंगत होने के पच्चात बम्बई के फिल्म उद्योग में अपनी बहुमुखी प्रतिभा का दिगदर्शन करने में जो सफलता और यश-कीर्ति स्व. किशोर साहू ने अर्जित की थी, यह एक अर्थ में अद्वितीय थे, असाधारण थे. अपनी इन्ही विशेषताओं के बल पर किशोर साहू को ‘आचार्य’ किशोर साहू के विभुषण से विभुषित किया जाता था. लेखक, कलाकार और निर्माता, निर्देशक के रूप में उन्हे कला जगत के सभी वर्गो का सम्मान प्राप्त था.

हिमांशु राय की बाम्बे टाकिज़ के बैनर तले निर्मित फिल्म ‘जीवन प्रभात’ में देविका रानी के साथ नायक का अभिनय करने पर किशोर साहू का भाग्योदय हो गया. ‘जीवन प्रभात’ की शानदार सफलता से प्रेरित होकर किशोर साहू ने ‘बहुरानी’ फिल्म में जहाँ नायक का रोल किया, वही उसका निर्माण, निर्देशक और कथानक लेखन भी किया. ‘बहुरानी’ की कामयाबी से किशोर साहू की मांग बढ़ती गयी. फिर 1940 में प्रसिद्ध फिल्म ‘पुनर्मिलन’ में किशोर साहू और स्नेह प्रभा प्रधान नायक-नायिका के रूप में आये. इस फिल्म का संगीत पक्ष अत्याधिक मजबूत था.

किशोर साहू ने सुखांत और दुखांत दोनो प्रकार की फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया है. किशोर साहू अब तक एक सफल निर्देशन और अभिनेता के रूप में अपनी धाक जमा चुके थे. बहुत थोड़े लोग यह जानते है कि विख्यात लेखक श्री अमृतलाल नागर और भगवतीचरण वर्मा किशोर साहू के साथ कार्य कर चुके है. भगवती चरण वर्मा का प्रसिद्ध गीत – “है आज यहाँ कल वहाँ चलो” किशोर साहू की ‘राजा’ फिल्म का प्रमुख गीत थी. ‘कुंवारा बाप’ जैसे कॉमेडी फिल्म बनाकर श्री साहू ने फिर एक बार लोकप्रियता के सिंहद्वार खोल दिये. इस फिल्म में प्रतिमा दासगुप्ता नायिका थी और किशोर साहू स्वयं थे. लेखक अमृतलाल नागर ने भी ‘कुंवारा बाप’ में अभिनय किया था. ‘राजा’ फिल्म में सिराज का रोल मोनी चटर्जी ने किया था. इन दोनों फिल्मों से किशोर साहू का नाम काफी रोशन हो गया. इतिहास की तरफ लौट कर उन्होने ‘वीर कुणाल’ का निर्माण किया. जिसमें शोभना समर्थ (नूतन की माँ) ने कुणाल की माँ का रोल किया था. इसमें किशोर साहू सम्राट अशोक के पुत्र वीर कुणाल बने थे. इनकी कहानी अशोक की द्वितीय पत्नी तिष्यरक्षिता पर केन्द्रित थी. जिसका रोल कंचन माला ने किया था. तिष्यरक्षिता अपने ही की पुत्र कुणाल पर आशक्त हो जाती है और इसी धुन में उसकी आंखे फोड़ डालती है. कुणाल का कथानक अत्यधिक रोचक है. प्रथम उप-प्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री सरदार बल्ल्भभाई पटेल ने मुम्बई में वीर कुणाल को रिलीज़ करते हुये इसे श्रेष्ठ फिल्म घोषित किया था. किशोर साहू लिखित ‘कुणाल’ भी पठनीय है.

‘नदिया के पार’ किशोर साहू निर्देशित एक और कामयाब फिल्म थी. जिसमे दिलीप कुमार और कामिनी कौशल की प्रमुख भुमिका थी. इस फिल्म में सुशील साहू ने नाविक की भुमिका की थी. ‘नदिया के पार दे उतार’ गाना सुशील साहू ने गाया था. इसके बाद ‘रिमझीम’ और ‘सावन आ रे’ फिल्म रिलीज़ हुई. सन् 1951 में किशोर साहू में अखिल भारतीय स्पर्धा आयोजित कर बीना राय, आशा माथुर, कुमुद धुगानी का चयन किया. उसी वर्ष उन्होने ‘कालीघटा’ फिल्म का निर्माण किया, जिसमें किशोर साहू के साथ बीना राय तथा आशा माथुर भी थी. इस फिल्म का संगीत जहाँ प्रभावशाली था वही उसका कथानक भी ह्र्दय स्पर्शी था. 1947 में किशोर साहू ने विधवा विवाह कथानक को लेकर अपनी बहुचर्चित फिल्म ‘सिन्दुर’ का निर्माण किया. इस फिल्म में शमीम नायिका थी. अमीर बाई कर्नाटिकी की आवाज में ‘ओ रूठे हुये भगवान तुमको कैसे मनाऊ’ संगीत प्रेमियों को आज भी रिझाता है.

लगभग 50 फिल्मों में अपनी अभिनय कला की छाप छोड़ने वाले किशोर साहू ने ‘बुजदिल’, ‘गाईड’, और ‘ज़लज़ला’ में अपने चरित्र अभिनय से सबको प्रभावित किया. 30 कला फिल्मों का निर्देशन कम उपलब्धियाँ नही है. युं तो निर्देशन में उनका हाथ कोई नही पकड़ सकता था तथापि जेमिनि की ‘गृहस्थी’ फिल्म में उनका निर्देशन देखते ही बनता था. ‘हरे कांच की चुड़िया’ तथा ‘पूनम की रात’ में किशोर साहू की पुत्री नैना साहू ने भाव पुर्ण अभिनव किया था. ‘मयुर पंख’ उनकी महात्वाकांक्षी फिल्म थी लेकिन दुर्भाग्य से वह बाक्स ऑफिस हिट सिद्ध नही हो पाई. ‘हेलमेंट’, ‘बड़े सरकार’, ‘सपना’, ‘साजन’ अपेक्षाकृत सफल रही. ‘मयुर पंख’ को भारत की प्रथम मेगाकलर कहलाने का श्रेय प्राप्त है. उनकी ‘पुष्पांजली’ तथा ‘धुये की लकीर’ फिल्में अपने ढंग की अनोखी फिल्में थी. वैसे उनकी सर्वाधिक चर्चित और लोकप्रिय फिल्म ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ मानी जाती है. जिनके गीत-संगीत आज भी कर्णप्रिय लगते है. इसके विषय में एक तथ्य यह भी है कि मीनाकुमारी अपने पति कमाल अमरोही के निर्देशन में काम करने से मना कर दिया था. वे किशोर साहू के निर्देशन में काम करना चाहती थी. इस शर्त के कारण फिल्म की शुटिग कई दिनों तक रूकी रही.

स्व. किशोर साहू ने फिल्म उद्योग में अनुशासन स्थापित करने पर विशेष बल दिया था. प्रतिमा दासगुप्ता, अनुराधा, बीनाराय, माला सिन्हा, कुमुद छुगानी और परवीन बॉबी के अभिनय प्रतिभा के निखारने का श्रेय किशोर साहू को ही है. वे एक कुशल लेखक भी थे. ‘टेसू के फूल’, ‘घोसला’, ‘छलावा’ आदि उनके कहानी संग्रह है, जबकि चार उपन्यासों की रचना भी किशोर साहू ने की है. ‘कुछ मोती कुछ सीप’ एक सशक्त उपन्यास है. ‘अभिसार’ गद्य गीतों का संग्रह है. ‘शादी या ढकोसला’ एक एकांकी नाटकों का संग्रह है.

साभार: श्री कुमार साहू

जन्म: 22 नवम्बर 1915 रायगढ़, छत्तीसगढ़, भारत
मृत्यु: 22 अगस्त 1980 बैंकाक, थाईलैंड (हार्ट अटैक से)

फिल्मी सफर:
बतौर अभिनेता:

वकील बाबू: 1982 जस्टिस राजवंश

हरे रामा हरे कृष्णा: 1971 मि. जायसवाल

गैम्बलर: 1971 पब्लिक प्रोस्क्युटर

पुष्पांजली 1970 जमाल पाशा

गाईड: 1965 मार्को

पूनम की रात 1965

काला बाजार 1960

लव इन शिमला 1960 जनरल राजपाल सिंह

कालापानी: 1958 राय बहादुर जसवंत राय

हैमलेट 1954

मयुरपंख 1954 रंजीत

हमारी दुनिया 1952

सपना 1952

ज़लज़ला 1952

बुजदिल 1951

काली घटा 1951

नमूना 1949

सावन आया रे 1949 आनन्द

सिन्दुर 1947

इसान 1944

राजा 1943

जीवन प्रभात 1937 रामू

 

बतौर निर्देशक

घुएँ की लकीर 1974

पुष्पांजली 1970

हरे कांच की चुड़ीया 1967

पूनम की रात 1965

घर बसा के देखो 1965

गृहस्थी 1963

दिल अपना और प्रीत पराई 1960

बड़ॆ सरकार 1957

किस्मत का खेल 1956

हैमलेट 1954

मयुरपंख 1954

हमारी दुनिया 1952

काली घटा 1951

सावन आया रे 1949

सावन भादो 1949

नदिया के पार 1948

साजन 1947

सिन्दुर 1947

वीर कुणाल 1945

शरारत 1944

राजा 1943

कुंवारा बाप 1942

 

बतौर लेखक

तीन बहुरानीयां 1968

औरत 1967 (डायलॉग)

हरे कांच की चुड़िया 1967 (डायलॉग, स्क्रीनप्ले और कहानी)

दिल अपना और प्रीत पराई 1960  

बतौर निर्माता

पुष्पांजली 1970

हरे कांच की चुड़ीया 1967

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