शोरूमनुमा मन्दिरें और पुरातात्विक, पारम्परिक बर्बादी

Posted on August 24, 2007. Filed under: Article after shoot |

आजकल मन्दिरें भी किसी शोरूम की तरह् खुलन्…. माफ कीजियेगा, बनने लगी है.

राष्ट्रीय राजमार्ग 6 पर लगभग हर रोज भिलाई से रायपुर आते-जाते, चरोदा-कुम्हारी के बीच में नवनिर्मित साई मन्दिर को जब भी देखता हूँ तो हर बार यह महसूस होता है कि अब मंदिरें आमजनों और गरीबों के लिये तो रह ही नही गई है. आजकल के नवनिर्मित आलीशान मन्दिरों के बाहर मोटर-साईकल, स्कूटर और हर प्रकार की छोटी-बड़ी, महंगी चारपहिया तो दिखती है लेकिन रिक्शा, साईकल, ठेलेवाले और पैदल यात्री को मैंने बहुत कम ही (लगभग नहीं ही) वहाँ जाते देखा है. मन्दिरें भी आजकल शोरूम की तरह हो गई है जहाँ आमजन जाने से हिचकिचाने और डरने लगा है. अगर तुलना करें शोरूम और मन्दिर में तो, दोनो जगहों में चकाचौंध रहती है, संगमरमर, फिनिशिंग रहता है, शोरूम की तरह ही पूजा, धार्मिक पुस्तकें, वस्त्र सामग्री और प्रसाद मिलती है और दोनों जगहें गेट के बाहर एक वर्दीधारी चौकीदार भी रहता है, सेल्समैन की तरह पुजारी मौजूद रहते हैं, तो इतने तामझाम के बीच में आमजन जाये तो जाये कैसे. कैसे  भगवान के दर्शन करेगा.

साईं धाम से कुछ ही दूरी पर चरोदा के पास देवबलौदा में एक बहुत ही खूबसूरत और पुरातात्विक शिव मन्दिर है जहाँ शिवरात्री मे बहुत बड़ा मेला भरता है. लेकिन स्थानीय लोगों के अलावा शायद ही कोई वहाँ जाता है. संस्कृति और पर्यटन विभाग द्वारा लाखों-करोड़ों रूपये प्रदेश के इन धर्मिक, पुरातात्विक स्थलो पर खर्च किये जाने का दावा किया जाता है लेकिन स्थिति वैसी ही है जैसी पब्लिक और प्रायवेट कम्पनियों की है.

सिरपुर में आप जाये तो वहाँ मन्दिर ही मन्दिर हैं. जितने खुदाई से निकल रहे हैं उससे कहीं ज्यादा मन्दिरें तो यहाँ अलग अलग समाज के लोगों ने बना रखा है. यादव, साहू, केवट, मरार, देवांगन सभी समाज के अपने-अपने मन्दिर हैं, और एक-दो भी नहीं, अनेकों मन्दिरें हैं. लोगों ने मन्दिरों के नाम पर बहुत सी जमीनों पर अवैध कब्जा कर रखा है. जहाँ भी खुदाई से एक मन्दिर निकली तो वहीं किसी समाज ने एक और मन्दिर बनवा ली. इन मन्दिरों की आड़ में तो असल पुरातात्विक और धार्मिक महत्व की मन्दिरें दिखाई भी ही नहीं पड़ती. बहुत से मन्दिरों का निर्माण तो पुराने मन्दिरों की नकल पर बन रहा है. कुछेक साल बाद तो असल पुरातात्विक और नये मन्दिरों का फर्क भी समझ मे नहीं आयेगा. ऎसे में सरकार पता नहीं किसे और किसको अंतरराष्ट्रीय पर्यटन का केन्द्र बनाना चाह रही है.

नगपुरा और चम्पारण हमारे आसपास के ऎसे उदाहरण है जो धार्मिक और पुरातात्विक दोनों रूप में प्रसिद्ध है. संगमरमर पर नाम खुदवाने या लिखवाने पर ही हजारों और लाखों दान में दिया जाता है लेकिन इस ओर ध्यान नही जाता कि इन्हीं गाँव में पढ़ाई, स्वास्थ्य, खेल जैसे अन्य जरूरतों के लिये भी मदद की जा सके. इन शोरूमनुमा मन्दिरों मे वहीं के मूल गाँव वाले भी जाने और दर्शन करने के लिये भी नि:सन्देह झिझकते और डरते होंगे.

सरकारी और निजी आयोजकों और प्रायोजकों को भले ही राज्य में गरीबी मे पलती प्रतिभायें नजर नहीं आती हो, गाँव में खिलाड़ी नजर नहीं आते होंगे और लोक-कलाकार नजर नहीं आते होंगे लेकिन साधु-संतो, बाबाओं, महन्तों और मठाधीशों के लिये लाखों-लाखों सरकारी और गैरसरकारी खर्च हो जाते है. प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मिडिया मे भी ये लोग भरपूर जगह पाते हैं.

आदिवासी क्षेत्रों मे भी बहुत से ऎसे त्योहार और मेले है जो सरकारी संरक्षण में होता है. मै दो उदाहरण देना चाहूंगा. एक नारायणपुर के मेले का और दूसरा बस्तर दशहरे का. मुझे याद है कि जब मै नारायणपुर मेला शूट करने गया था तब यह पता चला कि यह मेला तो पूरी तरह से सरकारी संरक्षण मे होता है. भीड़ को नियंत्रण करने के लिये पुलिस प्रशासन जरूर होनी चाहिए. लेकिन पूजा-नाचगान में बन्दिशें क्यों?

बस्तर का नारायणपुर 20 परगना का क्षेत्र है और यहाँ प्रतिवर्ष मावली माता के नाम से मेला भरता है. वर्तमान में जिस जगह मे मेला भरता है, वहाँ साप्ताहिक बाजार भी भरता है. लगभग 20 वर्ष पूर्व तक भी यह मेला पास ही के एक बहुत बड़ॆ मैदान पर होता था, जहाँ आदिवासी दूर-दूर से अपने देवी-देवताओं को लेकर आते थे. आज भी ये लोग हफ्तों महीने पहले से ही यहाँ आने की तैयारी में लग जाते हैं. पत्रकार दोस्त अजय ने बतलाया कि पहले यहाँ पूरा मैदान नृत्य-संगीत करते हुए लोगों से भरा रहता था और इस पूरे घेरे को घूमने में ही घंटों लग जाते थे और संगीत की जो ध्वनि रात भर आती थी वो अदभुत हुआ करता था. आयोजन और व्यवस्था समाज के ही लोग स्वयं ही मिलजुल कर करते थे.

लेकिन अब इस कार्यक्रम का सरकारीकरण हो गया है. एक मंच बना दिया गया है जिसे घेर दिया गया है और मात्र विशिष्ट लोगों के बैठने के लिए कुर्सियाँ लगी हुई होती है. कलाकारों के प्रदर्शन के समय को सीमित अवधि के लिए बाँट दिया गया है. चारों तरफ भारी सुरक्षा बलों की तैनाती रहती है और बन्दूक के साये में सब होता आ रहा है. मीना बाजार इस मेले का मुख्य आकर्षण का केन्द्र हो गया है और पारम्परिक कर्मकाण्ड, संस्कृति तो बस पूरी तरह से औपचारिक ही रह गई गयी है. आज, उस जगह पर जहाँ यह नृत्य-संगीत होता था, पूरी तरह से मकानों और दुकानों के लिए कब्जा या आबंटित हो चुका है. यह सुन्दर संस्कृति बहुत तेजी के साथ खत्म हो रही है. शायद कुछ ही वर्षो में तो मानने और बतलाने वाले भी नहीं मिल पायेंगे. नारायणपुर के इस प्रसिद्ध मेले को जरूरत है उसे उसके ही स्वरूप में जिन्दा रहने दिये जाने की, न कि बाहरी प्रभाव, सरकारी संरक्षण और सशस्त्र बलों की.

बस्तर दशहरे का भी यही हाल है. सरकारी बैंड पार्टी की फिल्मी धुनों की शोर में मूल परम्परागत संगीत का माधुर्य दब जाता है, मनमोहक मोहरी के पाट तो सुनाई ही नहीं पड़ते.

शहरों में तो लोगों को मनमानी करने की छूट है पर वही ग्रामीणों और आदिवासियों के त्योहारों और मेलों के लिये सरकारी संरक्षण, हस्तक्षॆप और सशस्त्र बल क्यों? आज राजधानी में बड़ी धूमधाम से चेट्रीचन्द पर्व मनाया गया और चैत्र नवरात्री भी शुरू गई है. पुरानी बस्ती के लाखे नगर के आसपास के मुहल्लों में चेट्रीचन्द के माहौल में भीड़-भाड़ वाले इस इलाके में मोटरसाईकलों का काफिला तेजी से गाड़ी लहराते, हार्न बजाते और बदहवाशी मे झंडे लहराते घूमते रहे लेकिन प्रशासन सोती रही. मन्दिरों में भीड़ और पदयात्रियों का काफिला शुरू हो चुका है. परीक्षायें चालू है और मन्दिरों और अन्य धार्मिक स्थलों में लाऊडस्पीकरों का बजना भी शुरू हो चुका है. पास में स्कूल-कॉलेज है, अस्पताल है, बुजुर्ग लोग हैं. जिनकी धार्मिक प्रबन्धकों और प्रशासन को कतई चिंता नहीं है.

मुझे चिंता तो अब इस बात की हो रही है कि कहीं टाटा, बिड़ला और एस्सार के आ जाने के बाद यहाँ के आदिवासी क्षेत्रों में भी टाटा और बिड़ला के मन्दिरों को ज्यादा महत्व मिलना शुरू न हो जाये. हो सकता है कि वहीं के आसपास की बहुत सी अच्छी पुरातात्विक और धार्मिक स्थलों को इन मन्दिरों की चकाचौन्ध में अनदेखा किया जाये और कुछ ही वर्षो में सदियों पुरानी परम्परायें और मान्यतायें ही खतम हो जाये. हो सकता है कल को दंतेवाड़ा मे लोग दंतेश्वरी माता के दर्शन करने न जाकर आलीशान, संगमरमर से निर्मित टाटा, बिड़ला के मन्दिर जायें.

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