दीपोत्सव् और राज्योत्सव की शुभकामनाये

Posted on August 24, 2007. Filed under: Article after shoot |

लगभग 15 साल पहले तक रायपुर के हमारे घर में गायें पाली जाती थी. हमारे यहां ही नही, पुरानी बस्ती के बहुतों के घरों में पाली जाती थी. तब ठेठवार पारा से राऊत घर आते थे और हमे अन्नकूट/गोवर्धन पूजा का विशेष इंतजार रहता था. साथ ही राऊत नाचा देखने, गायों को सोहाई बन्धवाने, गोवर्धन बनाने और छप्पन भोग के लिये भी. धीरे-धीरे शहर मे गाय पालन कम हो गया. राऊतों का आना जाना और घर मे नाचना भी धीरे-धीरे बन्द हो गया. तब मै 15-16 साल का था. बहुत दिनों बाद दीपावली गांव मे मनाया तो रायपुर के उन दिनों की राऊत नाचा और पड़की नाच (सुआ नृत्य) की याद आ गई. जैसे हमारे लिए दीपावली प्रमुख होता है, वैसे ही गांव मे अन्नकूट और मातर होता है. गांव मे त्योहार और उत्सव मनाना अपने आप में ही अलग उत्साह देता है. लेकिन अब बहुत कुछ बदल रहा है. रायपुर वापस आने पर अपने मोहल्ले के पास पड़की नाचने वालों को देखा. कुछ तो सुने और कुछ तो दरवाजा बन्द करते दिखे कि कहीं रूपये न देने पड़े. हम मिठाईयों, फटाकों, सजावटी सामानों पर तो हजारों खर्च करते है पर इनसे बचते है! राऊत नाचा के बारे मे तो बस पूछिये ही मत. राऊतों की वेशभूषा ही नहीं रही. फुल पेंट, हाफ पेंट, लुंगी, बनियान आदि पहनकर और एक मात्र आकर्षण का केन्द्र “परी” (स्त्री के भेष में पुरूष नृतक) के साथ निकलते हैं. क्या छोटे और क्या बड़े, सभी शराब पीकर उत्पात मचाने के अलावा और कुछ नहीं करते. मारपीट करना, आपसी रंजिश निकालना और सड़कों पर निकल कर दहशत फैलाना, यह है अब का राऊत नाचा. अच्छे दोहे बोलना तो भूल ही गये है. आज मुझे दो ही ऐसी जगह दिखती है जहाँ राऊत नाचा और अन्नकूट देखने लायक होती है – पहला बिलासपुर का राऊत नाचा महोत्सव और दूसरा रायपुर का दूधाधारी मठ.

मेरा गांव मन्दलोर, रायपुर से 30 कि. मी. दूर, नयी राजधानी के पास है। चूंकि मेरा गांव राजधानी क्षेत्र में नहीं है लोग निश्चिंत है. लेकिन न जाने उन लोगों ने दीपावली कैसे मनाई होगी जहाँ राजधानी बनने जा रही है. जब मैं कुर्रू और पौता (नयी राजधानी के लिये जहाँ सोनिया गांधी ने शिलान्यास किया था) गया था तब कुछ बुजुर्गों और नौजवानों से बात की थी. नौजवान तो नौकरी और भविष्य के लिये फिक्रमन्द थे, उन्हें ज्यादा तकलीफ होते नहीं दिखी क्योंकि अब पढ़ लिख गये है और शहरो में आकर बसने लगे हैं. मजदूरी करने रोज सैकड़ों की संख्या मे लोग शहर आते है. लेकिन बुजुर्ग जरूर रो पड़े थे. सोचता हूँ कब तक हम गांव वाले भी खैर मनायेंगे. सुन्दरकेरा मेरा पड़ोसी गांव है जहाँ 7 नवम्बर को महामहिम राष्ट्रपति रतनजोत देखने जायेंगे. मेरे गांव और आसपास के गांव की जमीन की कीमत 5 लाख प्रति एकड़ से ऊपर हो गई है. कुछ वर्षों बाद यहाँ भी तीज-त्योहार विकृत हो जायेगा. वर्षो बाद राऊत नाचा और पड़की को राज्योत्सव पर या पुरखौती मुक्तांगन के स्टेज पर जरूर देखेंगे.

पलायन की खबरें आने लगी है, फसल कटने के बाद अब इनके लिये कोई काम नहीं बचा. मेरे गाँव मे बहुत से देवांगन परिवार रहते है और एक बुनकर केन्द्र भी है. ज्यादातर बुनकर केन्द्रों मे देवांगन परिवारों का ही वर्चस्व है. पता नहीं क्यों अन्य समाज के लोग इस व्यवसाय मे नहीं है. क्या बुनकरी पर देवांगन समाज का ही एकाधिकार है? हमारे गांव के बुनकर केन्द्र मे काम आने के बाद से देवांगन समाज समृद्ध है, सम्पन्न है. बहुत से छोटे किसान भी है और कुछ परिवारों के पास तो खेती लायक जमीन भी नही है. ये लोग खेतिहर श्रमिक हैं. क्यों इन्हें ऐसे ही ग्रामोउद्योगों के लिये, व्यवसाय के लिये प्रशिक्षित और प्रोत्साहित नहीं किया जाता? राज्योत्सव मे ग्रामोद्योग को प्रमुख जगह दी गई है. राज्योत्सव मे छत्तीसगढ की आर्थिक उन्नति झलकेगी! भारी देशी-विदेशी निवेश की बातें होगी. जहाँ शहरी आबादी राज्योत्सव मे मदमस्त होगी वहीं मजदूर महीनों के लिये पलायन कर रहे होंगे.

पर्यटन भी इस राज्योत्सव का केन्द्र होगा. महिनों पहले मैं रायपुर के आसपास के पर्यटन स्थल देखने निकला तो मैं अव्यवस्था, जानकारी की अभाव, पहुँच मार्गो का न होने, आदि से परेशान हो गया. अगर कोई घूमने जाये तो घूमे कि ढुंढने और व्यवस्था करने में ही लगा रहे. कोई घूमेगा कब? सारी जोश और उमंग जाती रहती है. राजिम में क़ुम्भ मेला शुरू किया गया. अच्छा किया, लेकिन जाते जाते लोग नदी में भारी मात्रा में गन्दगी और जो मल मूत्र छोड़ गये उसका क्या? जांजगीर मे प्रसिद्ध जाज्जवल्य देव मन्दिर है और पास में ही एक और मन्दिर है, नकटा मन्दिर. जब मैं परिक्रमा करने गया तो हैरान रह गया. मन्दिर के पीछे के जगह का उपयोग लोग शौच के लिये करते है. सिरपुर मे नाका तो है लेकिन मूर्तियों की चोरी किसी से छिपी नहीं है. सिरपुर में रहने, खाने, बिजली, टेलिफोन जैसी जरूरी सुविधायें नहीं हैं. एक बार तो मैंने खुदाई करवा रहे एक ठेकेदार को मन्दिरो के अवशेषो के ऊपर चढ कर मोबाईल का नेटवर्क ढूंढते देखा. एक जगह नहीं मिलने पर दूसरी फिर तीसरी…..,. वर्षों पहले जब आरंग गया था तब मन्दिर की मरम्मत के लिये लोहे और बांस के छ्ड़ से बंधा देखा था, शायद आज भी वही हाल है. इनकी वजह से मन्दिरों के ऊपर के नक्काशी और मूर्तियाँ दिखाई नहीं देतीं.

हर पर्यटन मंत्री और विभागीय उच्च अधिकारी साल में कई-कई बार विदेश दौरे पर जाते है लेकिन स्थिति जस की तस. शायद विदेशों में पर्यटन और पुरातत्व स्थलों में ऐसा ही होता हो. क्या इन्हें नहीं लगता कि लोगों को शिक्षित किया जाए? संरक्षण, देखरेख और साफ सफाई के लिये स्थानीय लोगों को प्रशिक्षित किया जाये. विदेशों की तर्ज पर ये ब्रोशर, विज्ञापन, होर्डिंग पर ये लाखो-करोडों खर्च करते हैं लेकिन लोगों में पुरातात्विक, नैसर्गिक स्थलों और धरोहरों के बारे मे शिक्षित, जागरूक और सम्मान की भावना पैदा करने पर कोई पहल नहीं हो रही है. न कोई विशेष पाठ्यक्रम, न कोई ठोस कार्यक्रम. कुछ गैर सरकारी संस्थाये हैं जो विरासत और धरोहर के नाम पर काम करने का दिखावा करती है लेकिन इनकी नजर केवल देशी-विदेशी दान-अनुदान पर ही होती है. आज भी अगर स्थानीय और अन्य प्रदेश से जो पर्यटक आते वे ज्यादातर आपसी सम्पर्क द्वारा ही आते हैं न कि सरकारी विज्ञापनों की वजह से. क्या जो पैसा ये स्वयं के घूमने पर खर्च करते हैं उसे बच्चों के छुट्टी के दिनो मे घूमने (वैसे भी शीतकाल मे हर स्कूल बच्चों को लेकर आस पास घूमने जाते हैं), शिक्षकों, सरकारी, अर्ध-सरकारी, गैर-सरकारी कर्मचारियों को, वर्ष में एक बार छत्तीसगढ यात्रा न कराई जाये. इससे न केवल जानकारी और जागरूकता बढ़ेगी बल्कि नजरिया भी बदलेगा. लोगों का आना जाना बढ़ेगा तो दबाव मे व्यवस्था भी सुधरेगी.

17 अक्टूबर के दैनिक भास्कर में एक खबर छपी थी शीर्षक था ” कालापानी साबित हो रही है अन्दमान यात्रा.” औसतन प्रति माह 1200 बी एस पी कर्मचारी लांग लीव ट्रेवल कंसेशन के तहत अन्दमान घूमने जा रहे हैं वे ट्रेवल एजेंसियों द्वारा अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं और वहाँ के अव्यवस्था के शिकार हो रहे हैं. बाहर जाने के लिये लोग तैयार रहते है इसलिए यहाँ अनेकों ट्रेवल एजेंसियाँ खुल गयी है. लेकिन छत्तीसगढ़ घूमने के लिये न कोई पैसे खर्च करने को तैयार है और न ही ट्रेवल एजेंसियाँ हैं. क्यों नहीं छत्तीसगढ़ पर्यटन ट्रेवलिंग पैकेज बनाती है? क्यों नहीं रियायत या अनुदान और सहयोग की व्यवस्था है? ट्रैकिंग की बहुत सम्भावनाये हैं लेकिन कोई पहल नहीं. मुझे याद है 1992-93 मे मैं कुछ दोस्तों के साथ 10 दिन के लिए उदंति अभ्यारण्य मे ट्रैकिंग के लिये गया था, वन विभाग के सहयोग से. आज भी मुझे वो दिन याद है. मैनपुर, देवभोग के आसपास के पहाड़ों में, नदी किनारे हम रोज 10-12 किमी पैदल चलते थे. सरकार क्यों नहीं ऐसे ही छोटे छोटे आयोजनों को प्रोत्साहित करती है?

also see http://newswing.com/?p=840

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