छत्तीसगढ़ का नंगकुम्भ

Posted on August 24, 2007. Filed under: Article after shoot |

दिनांक 12-02-07

आजकल छत्तीसगढ़ में भी अर्धकुम्भ देखा-घूमा जा सकता है. संस्कृति एवं पर्यटन विभाग द्वारा सिरपुर और राजिम को अंतरराष्ट्रीय पर्यटन बनाने का अथक प्रयास चल रहा है. बना कर ही दम लेंगे चाहे जो भी हो. इसीलिए इस अर्धकुम्भ को संस्कृति एवं पर्यटन विभाग बढ़-चढ़ कर प्रोत्साहित कर रहा है. मुख्य मंत्री और  संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री के बड़े-बड़े पोस्टर फिल्मी स्टाईल मे लगे हुये है. स्वागत द्वार बने हुये है. ठेले-खोमचे, सरकारी अधिकारी और कर्मचारी, साधु-संत, भभूत लगाये शिवभक्त नंगे नागा और लम्पट ही ज्यादा दिख रहे है. श्रद्धालु तो बिचारे वही हैं जो कोसों दूर से, सरकारी दिखावा और साधु-सन्तों और नंगो से बेखबर हमेशा की तरह कुछ दिनों का राशन और परिवार के साथ बैलगाड़ी में आये हैं.
राजिम में तो नदी के बीचों बीच में ही सड़कें बना दी गई हैं. नदी के पानी को बाँध कर डबरी जैसा बना दिया गया है. कहीं किसी बच्ची को देवी बताकर, भारी कपड़े पहना कर, घंटों भूखा बैठा कर पैसा कमाया जा रहा है, तो कही पांच रूपये मे दो सिर वाला बच्चा नमूना बना हुआ है. लेकिन सरकार और प्रशासन, साधु-संत की सेवा सत्कार और नाच गान में ही मगन है.
यज्ञों का दौर पर दौर चल रहा है. अन्दरूनी तौर पर अपनी अपनी हैसियत दिखाने में साधु-सन्तों में होड़ मची हुई है. बहुत से साधु-सन्त परेशान हैं कि उन्हें समान सुख-सुविधायें नहीं मिल पा रही है. टॆन्ट मे जगह नहीं मिल रही है, गद्दे नहीं मिल रहे है. देखने को तो यहाँ यही मिल रहा है. लोग श्रद्धा के नाम से कम और मजा मस्ती के लिए ज्यादा आ रहे है.
पहली बार नागाओं को भी देख लोग भरपूर मनोरंजन कर रहे हैं. ये इतने मिडिया फैमिलियर हैं कि शौक से फोटो खिंचवाते और तरह तरह के अजीबोगरीब करतब भी दिखाते हैं और मॉडलो की तरह रैम्प करते हुए पोज़ भी देते है. महिलायें भी इन साधु-सन्तो और नंगो मे बढ़-चढ़ कर परिवार सहित दिलचस्पी ले रही हैं. क्या यह तीर्थस्थल केवल साधु-संतो के लिये ही है?
बरसों से आने वाले स्थानीय और दूर-दराज के श्रद्धालुओं से पूछे, तो वे खुश नही हैं. चमक दमक तो है लेकिन कहते है कि वो बात नहीं रही.
सरकार और उनके मंत्री लाखों रूपये इन साधु-संतों मे और अपने पोस्टर-बैनर छपवाने मे खर्च कर दिये और वह भी केवल दिखावे के नाम पर. इतने पैसे खर्च करना ही इन्हें शायद समाज सेवा लगता होगा. क्या हमारी परम्परा, संस्कृति, संस्कार और रीति रिवाज इतनी कमजोर और संकट में है? सालों से जो लोग यहाँ आते रहे हैं, क्या उन्हें यही ठेकेदार लाते रहे हैं? जो सालों से चल रहा है उसे इन सरकारों ने प्रायोजित बना लिया है. क्या बिना तथाकथित नंगे लोगों के बगैर हमारा राजिम का कुम्भ अधूरा था. उनके शानो शौकत के लिये इतना खर्च!

सिरपुर मे आप जाये तो वहाँ मन्दिर ही मन्दिर हैं. जितने पुरातात्विक मन्दिर पहले से हैं और जितने खुदाई से निकल रहे हैं उससे कहीं ज्यादा मन्दिरें तो यहाँ अलग अलग समाज के लोगों ने बना रखा है. यादव समाज, साहू समाज, केवट समाज, मरार समाज, देवांगन समाज सभी समाज के अपने मन्दिर हैं, और वह भी एक-दो नहीं, अनेकों मन्दिरें हैं. लोगों ने मन्दिरों के नाम पर बहुत सी जमीनों पर अवैध कब्जा कर रखा होगा. जहाँ भी खुदाई से एक मन्दिर निकली तो वही किसी समाज ने एक और मन्दिर बनवा ली. इन मन्दिरों की आड़ में तो असल पुरातात्विक और धार्मिक महत्व की मन्दिरें दिखाई भी ही नहीं पड़ती. जिसके लिए करोड़ों खर्च किया जा रहा है. सिरपुर आये बहुत से श्रद्धालु तो उन्हें देखते ही नही होंगे क्योंकि अब वहाँ इतनी मन्दिरें बन चुकी हैं कि लोग वहीं घूम कर रह जाते हैं. इतना पैसा खर्च आखिर किसके लिये? कुछ सालों के बाद तो असल पुरातात्विक और नये मन्दिरों का फर्क भी समझ मे नहीं आयेगा क्योंकि ऎसे बहुत से मन्दिरों का निर्माण पुराने मन्दिरों की नकल पर बन रहा है. वहाँ सरकार के लोग हैं, लेकिन ताज्जुब है कि मन्दिरों के इस निर्माण पर कोई हस्तक्षेप नहीं है. सरकार पता नहीं किसे और किसको अंतरराष्ट्रीय पर्यटन का केन्द्र बनाना चाह रही है.
क्या यही सामाजिक मन्दिरें और क्या यही साधु-सन्त और नंगे नागा ही हमारे अंतरराष्ट्रीय पर्यटक के दर्शनार्थ हैं? वे श्रद्धालु लोग जो सदियों से और दूरदराज के गाँवों से आते रहे हैं, क्या साधु-सन्त और नागाओं को दी जा रही सुविधायें, उनके मुँह में तमाचा नही है. साधु-सन्त और नागाओं के लिए तो गाडियाँ और टेंट, गद्दे हैं लेकिन उन सैकड़ो श्रद्धालुओं को क्या सुविधायें मिल रही है जो परिवार सहित बैलगाडियों मे बैठकर आये हैं. नदी के किनारे ठंड में रेत में परिवार सहित रह् रहे हैं. ताज्जुब है कि इतने खर्च, दिखावा पर कोई भी राजनैतिक दल, संस्थाये और संगठन कुछ नहीं बोलता-कहता. सरकार, नंगो की नई संस्कृति ला रही है. और अब तो नागा (नंगे) होना फैशन होता जा रहा है. इस नंगकुम्भ के डबरी (हमाम) मे सभी नंगे नजर आते है.

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