आत्मविश्वासी सिरहा
आत्मविश्वासी सिरहा
शहरी लोग जो दंतेवाड़ा, पखांजूर या नारायणपुर जैसे क्षेत्रों में नहीं रहते वे बहुत सी सुनी-सुनाई और छपी बांतों पर विश्वास करते है और तरह-तरह के कयास लगाते रहते है. लेकिन बहुत से मामलों में सच्चाई कुछ अलग ही होती है. जहाँ लोग जाने की सोचते भी नही और फटी पड़ी रहती है वहाँ ताज्जुब होता है कि मिशनरी और बहुत सी संस्थायें काम कर रहे है. पखांजूर, बान्दे और बेठिया में लगभग पिछले 10-15 सालों से मिशनरी काम कर रहे है. मिशनरी कैसे, क्या और किस तरह से काम करते है मुझे नही पता लेकिन जिनकी ओर हम शहरी देखते और सोचते नही है वहाँ मिशनरी की महिलायें (नन) रहकर-जाकर काम कर रही है.
आज सुबह-सुबह महुआ बीनने की शूटिंग के लिये पास ही के जंगल गये. कुछ अच्छे दृश्य लेने के बाद पास ही एक गाँव की शूटिंग की. इस गाँव में तीन अच्छी चीजें मिली एक तो देवी पूजा और दूसरी धान रखने की बांस के कोठी और तीसरी शादी का मंडप. जब मैं एक घर के पास शूटिंग कर रहा था तभी कुछ आवाजें आई तो कैमरा चालू किये-किये वही चला आया. एक छोटे से तंग कमरे में एक व्यक्ति पूजा कर रहा था (झूप रहा था) और उसके आसपास तकरीबन 7-8 लोग बैठे हुये थे. इस परिवार ने कुछ बदा था लेकिन सिरहा के अनुसार आज देवता से बात नही हो पाई. आज वे नही आये. देवता से बात करने और नही करने की उनकी अपनी गणित है. बांस के एक पाईप में कुछ गेंहूँ के दाने रखे थे जिसे बिखराने पर सम की संख्या में आना चाहिये. गिनती में पहले दो की जोड़ी फिर चार की फिर आठ की, ऎसे करने पर यदि सम में आता है तब तो ठीक है नही तो ऎसा माना जाता है कि आज देवता बात करने नही आये. जिस दाने से गणना की जा रही थी वह बहुत पुराने दाने थे. इस बांस और दाने का प्रयोग उसके दादा भी करते थे. दानें बहुत पुराने लग रहे थे. गणना करने वाला व्यक्ति आत्मविश्वास से भरा था और बतला रहा कि उसका ईलाज और शहरी डॉक्टर के ईलाज में कोई अंतर नही है. हाँ, हम दोनों का तरिका जरूर अलग-अलग है. मैं मरीजों को जड़ी-बूटी से ठीक करता हूँ और गणना से पता भी लगाता हूँ.
सिरहा ने बलताया कि “यह बांस का है. इसमें गेहूँ के दाने रखते है इससे कीड़ा नही लगता. किसी को बुखार होता है तब इसी के माध्यम से बिमारी का पता लगाता हूँ. जोड़ी बनाकर देखता हूँ फिर डॉक्टर की तरह इलाज करता हूँ. किसी को भूत-प्रेत पकड़ा होगा तो इसी से पता करता हूँ. जोड़ी बनाते समय अगर सम में आता है तब तो भूत-प्रेत सही बोल रहा है और अगर विषम आया इसका मतलब भूत-प्रेत सामने नही आ रहा है. अन्दाजे से दाने निकालते है और मंत्र भी पड़ते है. जैसे डॉक्टर लोग इलाज करते है वैसे ही हम भी पूजा के द्वारा बिमारी का पता लगा कर इलाज करते है.
आज हम लोग कुछ पता लगाने के लिये यहाँ आये हुये है. आज हमको पता चला कि देवी दुर्गा आज नही आई क्योंकि आज इतवार है, कल सोमवार को आयेगी. आने से कुछ रोगी या बिमारी या बेईमान या दुश्मन का पता चलेगा. यह दाना लगभग 60 साल पुराना होगा. अभी तो इसमें कुछ कीड़े भी लग गये है. मैं झाड़-फूंक के अलावा जड़ी-बूटी से भी इलाज करता हूँ.”
फिर आगे एक और आदिवासी के घर गया तब मुझे उनके घर अच्छे से सजा एक नया और एक पुराना पिल्लर मिला. वह शादी का मंडप था. नया पिल्लर 2004 का था. सुन्दर नीले चटक रंग से रंगा था. घर गोंड आदिवासी का था. ये लोग ऎसा पिल्लर (खम्भा) सिर्फ लड़के की शादी में ही बनाते है. जो पुराना पिल्लर था वह उस लड़के के पिताजी का था. तकरीबन 25-30 साल पुराना.
इन्ही के घर पर बांस से बनी एक सुन्दर सी धान की कोठी देखी.
तेजेन्द्र


