गोंड़ और बंगाली

Posted on November 6, 2008. Filed under: Hindi | Tags: , , , , , , |

गोंड और बंगाली

रोजगार गारंटी के बारे में जमीनी स्तर पर जानने का यह अच्छा अवसर था. मैं भी अभी तक इसके बहुत से पक्षों को नही समझा था सिर्फ इस बात को छोड़कर कि कुछ ही दिनों पहले कांकेर में करोड़ों के घोटाले का पता चला और उजागर होने पर कलेक्टर को हटाना पड़ा. इसी सिलसिले में संजय पराते जी गांव-गांव में बैठकें ले रहें है. मेरी ही तरह गांव के लोगों को भी रोजगार गारंटी की कोई साफ-साफ जानकारी नही है. यहाँ अधिकारी और पंचायत के लोग मिलकर लाखों रूपये का भ्रष्टाचार कर रहे है. जो बातें समझ में और सामने आई वे सभी चौकानें वाली थी और यह भी समझ में आई कि कैसे कोई योजना, भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है. निर्मल ग्राम, रोजगार गारंटी आदि योजनाओं की जमीनी हकीकतें मालूम हुई.

परलकोट क्षेत्र की अर्थ व्यवस्था पूरी तरह से बंगाली परिवारों के हाथ में है. लगभग सभी के पास अच्छी खेती या हर प्रकार का व्यवसाय और संसाधन है. यहाँ तक की मुर्गा लड़ाई भी. पखांजूर, बड़गाव, बान्दे और कापसी जैसे कस्बे और शहर पूरी तरह से बंगालियों के हाथ में है.

इसीलिये, कहीं न कहीं स्थानीय आदिवासियों और बंगाली परिवारों में तनाव तो है और मुझे तो ऎसा लगता है कि आने वाले समय में यह दूरी और बढ़ेगी. इसकी बहुत सी वजहें हैं जैसे कि यहाँ की अर्थव्यव्स्था का बंगालियों के हाथ में होना, बंगाली परिवारों का हर क्षेत्र में घुसपैठ, अधिकारियों और नेताओ के साथ मेल-जोल-तालमेल, अधिक सुविधासम्पन्न होना, खेती-किसानी में भी बंगाली परिवारों का आधिपत्य होना, वन जमीन पर भी कब्जा होना, सरकारी सुविधाओं में भी बंगालियों को प्राथमिकता जैसे उदाहरण है जिससे आदिवासी अपने को ठगे से महसूस कर रहे है जिससे गोंड़ और बंगाली परिवारों में दूरी बढ़ती जा रही है.

आदिवासी क्षेत्रों में एक बात और देखने को मिलती है. वह है गैर आदिवासियों का आदिवासी से शादी. ज्यादातर लड़के गैर आदिवासी होते है और लड़की आदिवासी. इस सम्बन्धों के बहुतायत अर्थ है और पूरा मामला जमीन का होता है या किसी जगह में अपने पैर फैलाने का. आदिवासी की जमीन को तो कोई नही खरीद सकता लेकिन इस तरह से लोग आदिवासी जमीन पर कब्जा बनाये हुये है.

रंगपंचमी (होली) के बाद से महुआ बीनने का काम शुरू होता है. अब महुआ का मौसम खत्म होने को है. चार बीनने भी काम अब लगभग खत्म होने को है. अभी भी दुर्गम स्थानों में रहने वाले आदिवासी चिरौंजी के बदले नमक का सौदा करते है लेकिन अब कम होता है और इसी चिरौंजी का दाम बाजार में शायद 400 रूपये किलो से भी ज्यादा में बिकता हो. स्थानीय व्यापारी इन आदिवासियों से कुछ रूपये देकर चिरौंजी खरीद लेते है और बड़े व्यापारियों को ऊंचे दामों में बेच देते है.

चार का बीज या फल कच्चा होने पर रंग हरा और खट्टापन लिये होता है और पकने के बाद रंग काला और मीठा होता है. इसके फल को खाने के बाद जो गुठली बचती है उसे फोड़ने से चिरौंजी मिलती है बिल्कुल बेर की तरह लेकिन छोटा.

इस बार पूरे बस्तर में आम की पैदावारी लगभग नही हुई है और उत्तर छत्तीसगढ़ की तरह यहाँ कटहल के पेड़ भी बहुत है.
तेजेन्द्र

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